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सुपरपॉवर होने के बावजूद भी ईरान से अब तक क्यों युद्ध नहीं जीत पाया अमेरिका, जानिए पांच बड़े कारण

ट्रंप की सबसे बड़ी चुनौती: ईरान के साथ युद्ध अब अमेरिका के लिए गले का फांस बन गया है। जिस युद्ध को यूएस 3 से 5 दिन का समझ रहा था, उसे आज लड़ाई करते 15 दिन बीत चुके हैं। ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि आखिर क्यों ईरान के खिलाफ अमेरिका अब तक जंग नहीं जीत पाया?

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भारत

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Saurabh Mall

Mar 14, 2026

TRUMP

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और ईरान की फोर्स। एक प्रतीकात्मक फोटो AI जनरेटेड।

Iran US Tensions: दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य ताकत कहे जाने वाले यूएस के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि आखिर वह ईरान के खिलाफ जंग में जीत क्यों नहीं हासिल कर पा रहा? अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दावे और डिफेंस एक्सपर्ट ने तो यह लड़ाई दो से पांच दिन चलने वाली थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। हालात अब इसके उलट दिख रहे हैं। दोनों देशों के बीच संघर्ष दो हफ्तों से ज्यादा खींच चुका है और लगातार तनाव बढ़ता जा रहा है।

ईरान की जवाबी रणनीति, क्षेत्रीय राजनीति और वैश्विक आर्थिक दबावों ने इस लड़ाई को और पेचीदा बना दिया है। खासकर होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) जैसे अहम समुद्री रास्ते पर तनाव बढ़ने से पूरी दुनिया की नजर इस संघर्ष पर टिक गई है। ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि क्या अमेरिका ने इस युद्ध को आसान समझने की गलती कर दी? आइए जानते हैं वे पांच बड़े कारण, जिनकी वजह से यह टकराव उम्मीद से ज्यादा लंबा खींचता जा रहा है।

पहला बड़ा कारण: लीडरशिप खात्मे की नीति फेल

पिछले कई सैन्य अभियानों में यूएस का अटैकिंग पैटर्न डिकोड हो गया। कई बार देखा गया कि अमेरिका ने दुश्मन नेताओं को मारने के बजाय पकड़ने की रणनीति अपनाई है। उदाहरण के तौर पर निकोलस मादुरो के खिलाफ कार्रवाई में उन्हें खत्म नहीं किया गया, और सद्दाम हुसैन को भी 2003 के इराक युद्ध के दौरान पकड़कर मुकदमा चलाया गया। लेकिन ईरान के सुप्रीम लीडर खामनेई के लिए ऐसा नहीं किया गया। इस मामले में रणनीति अलग दिखी। माना जाता है कि इजरायल की लीडरशिप खत्म करने वाली नीति का असर यहां ज्यादा दिखा। इजरायल पहले भी हमास और हिजबुल्ला के लीडरशिप को निशाना बनाया और कामयाबी भी मिली। लेकिन फर्क यह है कि ईरान कोई आतंकवादी संगठन नहीं, बल्कि एक पूरा देश है, इसलिए नेतृत्व पर हमला होने के बाद भी वह टूटने के बजाय और संगठित होकर सामने आया।

दूसरा बड़ा कारण: ईरान को कम आंकना

1979 की ईरानी क्रांति के बाद से ही तेहरान और अमेरिका के बीच तनाव शुरू हो गया था। तभी से ईरान ने एक लंबी और कठिन लड़ाई के लिए खुद को तैयार करना शुरू कर दिया था। उसने धीरे-धीरे अपने हथियार, मिसाइल सिस्टम और क्षेत्र में अपने प्रॉक्सी समूहों को मजबूत किया। देश के सर्वोच्च नेता अली खामनेई के नेतृत्व में सेना की ताकत बढ़ाई गई। जब पिछले साल इजरायलl, अमेरिका और ईरान के बीच 12 दिन का सैन्य टकराव हुआ, तब ईरान को समझ आया कि सीधे अमेरिकी हवाई ताकत का मुकाबला करना मुश्किल है। इसके बाद ईरान ने अंडरग्राउंड मिसाइल ठिकानों से सस्ते लेकिन खतरनाक ड्रोन्स का बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू कर दिया, जो आज हजारों की संख्या में मौजूद हैं और अमेरिकी सेना के लिए बड़ी चुनौती बन गए हैं।

तीसरा बड़ा कारण: होर्मुज स्ट्रेट का संकट

होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक है, और इसी रास्ते को लेकर मौजूदा संकट खड़ा हुआ। जब तनाव बढ़ने से पहले United States ने दबाव बनाकर इंडिया को रूस से तेल खरीद कम करने के लिए राजी किया था। लेकिन जैसे ही Iran के साथ टकराव बढ़ा और वैश्विक ऊर्जा संकट गहराने लगा, अमेरिका को अपना रुख बदलना पड़ा। कुछ ही दिनों में भारत को फिर से रूसी तेल खरीदने की छूट दे दी गई।

इससे साफ संकेत मिलता है कि ईरान पर हमले के बाद होर्मुज बंद होने की संभावना का शायद सही अंदाजा नहीं लगाया गया था। अब इस समुद्री रास्ते को सुरक्षित रखना भी अमेरिका के लिए आसान नहीं है, क्योंकि सस्ते ड्रोन और मिसाइलें तेल जहाजों की सुरक्षा को बेहद महंगा और जोखिम भरा बना सकती हैं

चौथा बड़ा कारण: युद्ध के लिए ट्रंप का विरोधाभासी स्टेटमेंट

शुरुआत में ट्रंप ने कहा था कि इस युद्ध का मकसद ईरान में सत्ता परिवर्तन कराना… वहां के लोगों की आजादी और उसके परमाणु कार्यक्रम को रोकना है। लेकिन समय बीतने के साथ यह लक्ष्य साफ नजर नहीं आ रहा। हाल के बयानों में ट्रंप अब खुलकर सत्ता बदलने की बात भी नहीं करते। उनकी टीम के अलग-अलग बयान भी इस मामले में थोड़े विरोधाभासी लगते हैं।

पांचवा बड़ा कारण ट्रंप को ईरान की जनता ने दिया धोखा

हमले से पहले ईरान में सरकार और सुप्रीम लीडर खामनेई के खिलाफ कई जगह विरोध प्रदर्शन हो रहे थे। इसी वजह से ट्रंप और नेतन्याहू को उम्मीद थी कि जैसे ही हमला होगा, ईरान की जनता सड़कों पर उतरकर सरकार को चुनौती देगी। लेकिन ऐसा बड़ा जन आंदोलन देखने को नहीं मिला। लोग सड़कों पर उतरने के बजाय ईरान के सपोर्ट में उतरा आए। उन्हें अपने सर्वोच्च नेता को खोने का दुख पहुंचा।