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राजस्थान पत्रिका के टॉक शो में आमजन बोले, नशे से मुक्ति के लिए बचाना होगा टूटते संयुक्त परिवार

युवा वर्ग आज नशे के माया जाल में झकड़ता जा रहा है। इससे कई परिवार बर्बाद भी हुए है। जरूरत बच्चों को संभालने एवं युवाओं को मार्ग दर्शन देने एवं संयुक्त परिवार की परिपाटी को मजबूत करने की है। राजस्थान पत्रिका के नशा मुक्ति अभियान के तहत सोमवार को पथिक नगर में आयोजित टॉक शो में समाज सेवी, शिक्षक, चिकित्सक, योग गुरु एवं अभिभावकों ने यह बात कही।

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भीलवाड़ा। टूटते संयुक्त परिवार एवं बढ़ते एकाकीपन और कानून की विसंगतियों ने जिन्दगी को बिखर कर रख दिया है। ऐसे में नशे ने संधे मारते हुए जीवन को ही डसना शुरू कर दिया है। खास कर युवा वर्ग आज नशे के माया जाल में झकड़ता जा रहा है। इससे कई परिवार बर्बाद भी हुए है। जरूरत बच्चों को संभालने एवं युवाओं को मार्ग दर्शन देने एवं संयुक्त परिवार की परिपाटी को मजबूत करने की है। राजस्थान पत्रिका के नशा मुक्ति अभियान के तहत सोमवार को पथिक नगर में आयोजित टॉक शो में समाज सेवी, शिक्षक, चिकित्सक, योग गुरु एवं अभिभावकों ने यह बात कही। उन्होंने राजस्थान पत्रिका के सामाजिक सरोकार की सराहना करते हुए कहा कि पत्रिका ने जो भी बीड़ा उठाया है, उससे समाज को नई दिशा मिली है तो सामाजिक कुरीतियों व विसंगतियों के खिलाफ आवाज भी बुलंद हुई है। टॉक शो में समाज सेविका सुशीला बाहेती, संगीता पोखरा, लीला पंचोली, घनश्याम माली, श्वेता,प्रहलाद व भावना एवं अभिषेक पंचोली ने भी युवाओं को नशे से दूर रहने व समाज एवं परिवार को जागरूक रहने की सलाह दी। 

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नौकरी पेश में माता-पिता के होने से बच्चों के बीच एकाकीपन बढ़ा है। संयुक्त परिवार की प्रवृत्ति कम होने से भी बच्चों के रहन सहन व मानसिक सोच में भी बदलाव आया है। ऐसे में यह नशा गरीब व अमीर परिवार नहीं देख रहा है और युवाओं को निगलनें की कोशिश कर रहा है। अभिभावकों व शिक्षकों को भी बच्चों की प्रवृत्ति पर नजर रखने व उन्हें संभालने की जरूरत है।

उर्मिला जोशी, प्रिंसिपल, राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय सुभाषनगर

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बेरोजगारी, दिखावा, मानसिक तनाव व एकाकी परिवार की शैली से नशे की प्रवृत्ति बढ़ी है। जरूरत बच्चों को अकेला नहीं छोड़ते हुए उन पर नजर रखने की है। संयुक्त परिवार को भी मजबूत बनाए रखना चाहिए। राजस्थान पत्रिका के नशे के खिलाफ मुहिम सराहनीय हे। इसमें समाज व परिवार को भी भूमिका निभाने के लिए आगे आना चाहिए।

मदन खटोड़, अध्यक्ष, वरिष्ठ नागरिक मंच

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नशा जिन्दगी को खोखला कर रहा है, समाज में ऐसे भी है जो कि नशे के आदि है, लेकिन वह अब इसके दलदल से बाहर आना चाहते है और बर्बादी से बचना चाहते है, लेकिन उन्हें कोई रास्ता नहीं सुझ रहा है। इस दलदल से बाहर निकलने के लिए योग सशक्त माध्यम है। इससे वह मानसिक रूप से भी मजबूत हो सकता है। हम भी योग से पीडि़तों की मदद का प्रयास कर रहे है।

प्रेम शंकर जोशी, मुख्य योग गुरु

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राजस्थान पत्रिका समाज में व्याप्त कुरीतियों के खिलाफ समय समय पर अभियान चलाता रहता है, इस बार एएमडी ड्रग्स के खिलाफ आवाज उठाई है, पत्रिका बधाई के पात्र है। भीलवाड़ा में पनप रहे एमडी नशे को समय रहते तोड़ना जरूरी है। इसी के लिए सभी को जागरूक होना होगा।

कैलाश सोमाणी, वरिष्ठ नागरिक

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निराशा एवं हताशा को जीवन में हावी नहीं होना देना चाहिए, सदैव सफलता का मंत्र याद रखना चाहिए। असफलता मिलती है तो मन को मजबूत रखते हुए कुछ नया करने की सोचना चाहिए, मानिए फिर सफलता का नशा आपकी जिंदगी को बदल देगा।

अनुराधा शर्मा, साॅफ्टवेयर इंजीनियर

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नशे के प्रकार कई है, लेकिन एमडी का नशा युवाओं के लिए खतरनाक है। नशे से मुक्ति के लिए परिवार व समाज को भी मददगार बनना होगा। बदलती जीवन शैली में लोग कई प्रकार का नशा कर रहे है, इनका इलाज दवा से भी संभव है, लेकिन संयुक्त परिवार के बीच रह कर सब नशे से भी छुटकाया पाया सकता है।

डॉ. पीएम परिहार, वरिष्ठ पैथोलोजिस्ट 

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संयुक्त परिवार को लोग भूलने लगे है, एकल परिवार में रमे होने से उनका पूरा ध्यान नौकरी व पैसे में ही लगा हुआ है, इससे बच्चे उनसे दूर होते जा रहे और ड्रग्स का शिकार हो रहे है। बच्चों को कम्पीटिशन की भावना नहीं थोंपे, वरन उनका विश्वास मजबूत करे। संयुक्त परिवार की आज जरूरत महसूस करनी होगी।

राजाराम पंचोली, रिटायर्ड रोडवेज अधिकारी

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पहला प्रयास तो यह है कि बच्चा नशे का शिकार ही नहीं हो, उसकी विशेष देखभाल की जानी चाहिए, यदि को एडिक्ट हो चुका है तो उसका भी भावनात्मक रूप से सपोर्ट करना होगा। हेय दृष्टि से देखने पर उसमें भी हीन भावना आएगी।

प्रकाश गोस्वामी, रिटायर्ड राजकीय कर्मी

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नशे से मुक्ति की राह भी आसान है, जरूरी है कि इसके लिए वह ठान ले कि उसे नई जिन्दगी जीना है, हां-परिवार को भी हीन भावना छोड़ कर उसकी मदद करनी चाहिए, समाज को भी उसे प्यार देना चाहिए। दवा स

भावना, गृहिणी

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नशे का मुख्य कारण परिवार का बच्चे के प्रति लापरवाही बरतना है, कई अभिभावक तो गैर जिम्मेदार बने हुए है। नौकरी पेशा के चक्कर में वह अपने बच्चे व परिवार को भूल रहे, उन्हें चाहिए कि वह बच्चों को संभाले और उन्हें समय देंवे।

गजेन्द्र पोखरा, राजकीय कर्मचारी

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