
गंगू कुंड पर लगी शिव-पार्वती के विवाह की प्रतिमाएं।
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- 11वीं शताब्दी की दुर्लभ शिल्पकला में अग्नि फेरे लेते शिव-पार्वती, आहुति देते ब्रह्मा
उदयपुर. पुरातन वैभव और सांस्कृतिक गरिमा के लिए विख्यात मेवाड़ की धरती एक बार फिर अपने इतिहास की अनमोल स्मृतियों के कारण चर्चा में है। यहां लगभग एक हजार वर्ष पुरानी ऐसी दुर्लभ प्रतिमाएं विद्यमान हैं, इनमें भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह का सजीव दृश्य उकेरा गया है। 11वीं शताब्दी की मानी जा रही इन शिल्पाकृतियों में शिव-पार्वती अग्नि के फेरे लेते दिखाई देते हैं, जबकि ब्रह्माजी अग्निकुंड में आहुतियां अर्पित करते दर्शाए गए हैं।
गंगू कुंड पर सजी विवाह की शिल्पगाथाआहाड़ स्थित गंगू कुंड परिसर में ये प्रतिमाएं आज भी इतिहास की मौन साक्षी बनी हुई हैं। उत्तर कुंड के समीप दीवार पर स्थापित एक प्रतिमा में शिव-पार्वती के पाणिग्रहण संस्कार का अत्यंत मनोहारी अंकन है। दक्षिण कुंड के समीप लगी दूसरी प्रतिमा यद्यपि खंडित अवस्था में है, फिर भी उसमें मंडप और विवाह संस्कार की स्पष्ट झलक मिलती है। दोनों प्रतिमाओं में चंवरियाें की सजीव रचना शिल्पकला की उत्कृष्टता को दर्शाती है।
शिलालेखों में दर्ज हजार वर्षों की स्मृतियां
इतिहासकार श्रीकृष्ण जुगनू के अनुसार, जनश्रुतियों से इतर यहां उपलब्ध शिलालेख प्रमाणित करते हैं कि ये कुंड लगभग एक हजार वर्ष पुराने हैं। यहां गुहिल शैली की प्रतिमाएं विद्यमान हैं। देश के क्रांतिकारी यति-सन्यासियों को आहाड़ के रुद्र कुंड (दक्षिण) की जानकारी थी, जिसे तारक तीर्थ माना जाता था। 11वीं शताब्दी में अच्यंत ध्वज जोगी अपने सहस्त्र शिष्यों के साथ यहां आए थे और उनके हस्ताक्षर भी यहां अंकित हैं। परिसर में लगभग दस अभिलेखों सहित शिल्पकारों की आत्म-मूर्तियां भी विद्यमान हैं।
भारत के स्वरूप जैसा अद्भुत मंदिर
यहां स्थित भगवान शिव का मंदिर भारत के मानचित्र की संरचना जैसा प्रतीत होता है। उत्तर और दक्षिण में स्थित कुंडों को भारतीय दिशाओं के समुद्र के प्रतीक रूप में विकसित कर मंदिर को कैलाश का स्वरूप प्रदान किया गया है। मंदिर में 16 स्तंभों वाला सुंदर आलिंद (सभा मंडप) निर्मित है। प्रत्येक स्तंभ विशिष्ट शिल्पांकन लिए हुए है, इनके शीर्ष पर कीचक पान भारवाहक आकृतियां उकेरी गई हैं।
शिव के विविध स्वरूपों की अनुपम छटा
परिसर में भगवान शिव के अनेक रूपों की प्रतिमाएं स्थापित हैं। इनमें लकुलीश स्वरूप में बीजपूरक और दंड धारण किए हुए आकृति, वृषभ पर विराजित महादेव, नंदीश्वर सहित अन्य रूपों का अंकन शामिल है। इन प्रतिमाओं की कलात्मक सुंदरता देखते ही बनती है। इतिहासकारों के अनुसार 10वीं और 11वीं शताब्दी के दौरान जब आहाड़ अपने स्थापत्य और सांस्कृतिक वैभव के लिए देशभर में प्रसिद्ध था, उसी कालखंड में शिल्पों का निर्माण किया गया होगा।-------
गंगू कुंड की तर्ज पर बना गंगई कोंड
चोलमइतिहास में उल्लेख मिलता है कि चोल राज्य के व्यापारियों का आहाड़ से घनिष्ठ संबंध था। वे व्यापार के सिलसिले में यहां आते और गंगू कुंड की भव्यता का वर्णन अपने राज्य में करते थे। जब यह चर्चा चोल सम्राट राज राजेंद्र चोल तक पहुंची, तो उन्होंने अपने राज्य में भी इसी तर्ज पर एक कुंड का निर्माण करवाया, इसे गंगई कोंड चोलम नाम दिया गया।
Published on:
15 Feb 2026 06:16 pm
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