श्री गंगानगर, Jun 06, 2026

Sri Ganganagar. View of the farm of farmer Pappuram Bhati in Hunpura Dhani village of Padampur area
श्रीगंगानगर.देश की अन्न भंडार मानी जाने वाली श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़ की नहरी पट्टी ने हरित क्रांति को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया, लेकिन अधिक उत्पादन की इस दौड़ ने अब मिट्टी की सेहत पर सवाल खड़े कर दिए हैं। वर्षों से यूरिया और डीएपी जैसे रासायनिक उर्वरकों के बढ़ते उपयोग, फसल चक्र में असंतुलन और जैविक पदार्थों की कमी के कारण भूमि की उर्वरा शक्ति प्रभावित हो रही है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में उत्पादन क्षमता और मिट्टी की गुणवत्ता दोनों प्रभावित हो सकती हैं। इसी चुनौती से निपटने के लिए कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के निर्देश पर 1 जून से 30 जून तक खेत बचाओ अभियान चलाया जा रहा है। अभियान का मूल उद्देश्य किसानों को यह समझाना है कि केवल अधिक खाद डालने से उत्पादन नहीं बढ़ता,बल्कि मिट्टी की जरूरत के अनुसार संतुलित पोषण प्रबंधन ही टिकाऊ खेती की आधारशिला है।
श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ में बड़ी संख्या में किसान गेहूं, कपास, ग्वार, सरसों और धान जैसी फसलों की खेती करते हैं। लगातार एक जैसी फसलें लेने और रासायनिक उर्वरकों पर बढ़ती निर्भरता से मिट्टी में जिंक, सल्फर, आयरन तथा अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी सामने आ रही है। ऐसे में अभियान के तहत किसानों को मृदा परीक्षण,मृदा स्वास्थ्य कार्ड, जैविक खाद, वर्मी कम्पोस्ट, हरी खाद, जीवामृत, बीजामृत, घनजीवामृत और पंचगव्य जैसी तकनीकों को अपनाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। अभियान केवल खाद और उर्वरकों तक सीमित नहीं है। इसमें जल संरक्षण, खेतों की मेड़बंदी, वर्षा जल संचयन, डिग्गी और फार्म पॉण्ड निर्माण, ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई, फसल अवशेष प्रबंधन, मिश्रित खेती, दलहनी-तिलहनी फसलों को फसल चक्र में शामिल करना तथा एकीकृत कीट प्रबंधन (आईपीएम) जैसे उपायों को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।
मिट्टी परीक्षण और मृदा स्वास्थ्य कार्ड को बढ़ावा, यूरिया और डीएपी पर निर्भरता कम करना, एनपीके, एसएसपी, टीएसपी और जैव उर्वरकों के उपयोग को प्रोत्साहन, जैविक एवं प्राकृतिक खेती को बढ़ावा, जीवामृत, बीजामृत, घनजीवामृत और पंचगव्य का उपयोग,हरी खाद (ढैंचा, ग्वार, चवला) के माध्यम से मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ाना, जल संरक्षण, मेड़बंदी और वर्षा जल संचयन को प्रोत्साहन,ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई का विस्तार, फसल अवशेष प्रबंधन और पराली जलाने पर रोक, मिश्रित खेती और फसल चक्र को बढ़ावा व एकीकृत कीट प्रबंधन एवं जैव कीटनाशकों का उपयोग व किसानों की लागत घटाकर आय बढ़ाना शामिल है।
अधिक उत्पादन की चाह में किसान अक्सर आवश्यकता से अधिक रासायनिक उर्वरकों का उपयोग कर लेते हैं, जिससे मिट्टी का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता है। नियमित मृदा परीक्षण, मृदा स्वास्थ्य कार्ड की अनुशंसाओं का पालन तथा जैविक खादों के उपयोग से भूमि की उर्वरा शक्ति लंबे समय तक सुरक्षित रखी जा सकती है।
-सत्यप्रकाश साईंच, प्रभारी, मृदा परीक्षण प्रयोगशाला, कृषि अनुसंधान केंद्र, श्रीगंगानगर।
श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ का नहरी क्षेत्र देश के सबसे उत्पादक कृषि क्षेत्रों में शामिल है। लेकिन उत्पादन के साथ मिट्टी की सेहत को बचाना भी उतना ही जरूरी है। मृदा परीक्षण,संतुलित पोषण प्रबंधन,जैविक खाद और प्राकृतिक खेती के माध्यम से ही खेती को दीर्घकालीन रूप से लाभकारी बनाया जा सकता है।
-डॉ.सतीश कुमार शर्मा, संयुक्त निदेशक कृषि (विस्तार), श्रीगंगानगर।
Published on: 06 Jun 2026 12:05 pm


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