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श्री गंगानगर, Jun 06, 2026

मूसलाधार बरसात का नाम लेते ही ‘तौबा-तौबा’, अब तक नहीं भूले जलभराव का दर्द

- श्रीगंगानगर में मानसून सिर पर: गड्ढा क्षेत्रों में रहने वाले परिवार आज भी सहमे, मुआवजे की आस अधूरी; लोगों ने खुद ऊंचे किए मकान, जिम्मेदारों की अनदेखी से बढ़ा संकट

श्रीगंगानगर के पुरानी आबादी गडढा क्षेत्र में काबिज मकान और बरसात से लबालब होने का बना हुआ है खतरा

Sriganganagar: Encroached Houses in the Old Abadi Gaddha Area Face Growing Threat as Monsoon Waterlogging Concerns Mount.

श्रीगंगानगर। शहर में मानसून की आहट के साथ ही गुरुनानक बस्ती और पुरानी आबादी गड्ढा क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की चिंता बढ़ने लगी है। मूसलाधार बरसात का नाम लेते ही इन इलाकों के अधिकांश परिवारों के चेहरे पर भय और अनिश्चितता साफ दिखाई देने लगती है। इसकी वजह भी कम नहीं है। करीब तीन वर्ष पहले हुई भारी बारिश ने इन क्षेत्रों में ऐसा कहर बरपाया था कि सैकड़ों परिवारों के मकान क्षतिग्रस्त हो गए थे और लोगों को लंबे समय तक परेशानी झेलनी पड़ी थी। आज भी उस त्रासदी की यादें लोगों के जेहन में ताजा हैं। शहर के गंदा पानी संग्रहण क्षेत्र और प्राकृतिक रूप से निचले हिस्सों में स्थित इलाकों में बारिश के दौरान हालात सबसे ज्यादा बिगड़ते हैं। गड्ढा क्षेत्र पानी से लबालब भर जाता है और ओवरफ्लो होने के बाद बरसाती और गंदा पानी आसपास की बस्तियों में फैलने लगता है। कई बार स्थिति इतनी गंभीर हो जाती है कि पानी लोगों के घरों में घुस जाता है। इससे घरेलू सामान, फर्नीचर और मकानों की नींव तक प्रभावित हो जाती है। तीन वर्ष पहले हुई मूसलाधार बारिश ने गुरुनानक बस्ती और पुरानी आबादी के गड्ढा क्षेत्र के आसपास बसे परिवारों को भारी नुकसान पहुंचाया था। पानी कई दिनों तक जमा रहा और अनेक मकानों की दीवारों तथा नींव में दरारें आ गईं। कुछ परिवारों को तो अस्थायी रूप से अपने घर छोड़कर रिश्तेदारों या अन्य सुरक्षित स्थानों पर शरण लेनी पड़ी थी।

तीन-तीन सर्वे हुए, लेकिन राहत राशि अब तक नहीं

दिहाड़ी मजदूरी कर परिवार का पालन-पोषण करने वाले इन परिवारों के लिए मकान की मरम्मत कराना आसान नहीं था। प्राकृतिक आपदा से हुए नुकसान के बाद लोगों को उम्मीद थी कि राज्य सरकार उनकी मदद करेगी। जनप्रतिनिधियों ने भी मौके का दौरा किया और प्रभावित परिवारों को राहत दिलाने का भरोसा दिया। नुकसान का आकलन करने के लिए प्रशासनिक स्तर पर सर्वे भी कराए गए। नुकसान का आंकलन करने के लिए एक-दो नहीं बल्कि करीब तीन बार सर्वे करवाए गए। सर्वे टीमों ने घर-घर जाकर स्थिति का जायजा लिया, प्रभावित मकानों की सूची तैयार की और रिपोर्ट भी बनाई। इसके बावजूद आज तक अधिकांश प्रभावित परिवारों को किसी प्रकार की राहत राशि नहीं मिल सकी है। इधर, नगर परिषद प्रशासन का कहना था कि मुआवजे के लिए भूखंड का मालिकाना हक होना चाहिए लेकिन नब्बे फीसदी से ज्यादा प्रभावित कब्जेधारक होने की वजह से मुआवजा संबंधित राहत नहीं मिल पाई। लोगों का आरोप है कि सर्वे के बाद भी मामला फाइलों में दबकर रह गया। समय बीतता गया और राहत की उम्मीद धीरे-धीरे खत्म होती गई। जिन परिवारों ने मुआवजे की उम्मीद में मकानों की मरम्मत टाल रखी थी, उन्हें आखिरकार अपनी जेब से खर्च कर घरों को ठीक करवाना पड़ा।

सबक लिया, अब अपने दम पर ऊंचे किए मकान
तीन साल पहले हुए नुकसान से सबक लेते हुए प्रभावित परिवारों ने अब अपनी सुरक्षा के लिए स्वयं कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। गुरुनानक बस्ती और पुरानी आबादी के गड्ढा क्षेत्र के आसपास बड़ी संख्या में लोगों ने अपने मकानों का पुनर्निर्माण कराया है। पहले अधिकांश मकानों का लेवल गड्ढा क्षेत्र और सड़क के लगभग बराबर था। बारिश के दौरान पानी सीधे मकानों में प्रवेश कर जाता था और नींव कमजोर होने लगती थी। इसी कारण कई मकानों में बड़ी दरारें आ गई थीं। अब लोगों ने अपने मकानों का स्तर सड़क से करीब डेढ़ से दो फीट तक ऊंचा कर लिया है। कई परिवारों ने घरों के सामने ऊंचे रैम्प भी बना लिए हैं ताकि सड़क पर बहने वाला पानी सीधे मकान में प्रवेश न कर सके। गड्ढा क्षेत्र के आसपास इन दिनों मकानों को ऊंचा करने की मानो होड़ सी लगी हुई है। हालांकि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए यह काम आसान नहीं रहा। कई लोगों ने कर्ज लेकर या अपनी वर्षों की बचत खर्च कर मकानों को ऊंचा कराया है। वहीं कुछ परिवार आज भी संसाधनों के अभाव में ऐसा नहीं कर पाए हैं और भविष्य की बारिश को लेकर चिंतित हैं।

अतिक्रमण ने बढ़ाई समस्या, सिकुड़ता गया गड्ढा क्षेत्र

शहर के जानकारों और स्थानीय लोगों का मानना है कि जलभराव की समस्या केवल प्राकृतिक नहीं है, बल्कि इसके पीछे वर्षों से जारी अतिक्रमण भी एक बड़ा कारण है। पुरानी आबादी और गुरुनानक बस्ती के आसपास स्थित सरकारी गड्ढा भूमि पर पिछले करीब दो दशकों से कब्जों का सिलसिला जारी है। कुछ प्रभावशाली लोगों ने पहले यहां कचरा और निर्माण मलबा डालकर भूमि का स्तर ऊंचा किया। इसके बाद धीरे-धीरे उस भूमि पर कब्जा कर लिया गया। समय के साथ वहां पक्के मकान और अन्य निर्माण खड़े हो गए। बाद में इन भूखंडों को जरूरतमंद लोगों को बेच दिया गया। इस पूरी प्रक्रिया के चलते गड्ढा क्षेत्र का दायरा लगातार कम होता गया। पहले जहां बरसाती और गंदा पानी एक बड़े क्षेत्र में फैलकर रुक जाता था, वहीं अब पानी के लिए उपलब्ध जगह कम हो गई है। परिणामस्वरूप बारिश के दौरान पानी तेजी से आबादी वाले क्षेत्रों की ओर बढ़ता है।

बापूनगर में पूरी तरह बदल गया भूगोल
इंदिरा कॉलोनी से सटे बापूनगर क्षेत्र को इसका बड़ा उदाहरण माना जा रहा है। यहां का गड्ढा क्षेत्र अब लगभग पूरी तरह कब्जे में आ चुका है। वर्षों पहले जो स्थान पानी संग्रहण के लिए जाना जाता था, वहां आज पक्के निर्माण और घनी आबादी वाली बस्ती विकसित हो चुकी है। इधर, नगर परिषद में अतिक्रमण को लेकर कई बार शिकायतें भी सामने आती रही हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर स्थिति लगभग जस की तस बनी हुई है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि नगर परिषद के जिम्मेदार अधिकारियों ने वर्षों से इस समस्या को गंभीरता से नहीं लिया।

विधायक की घुड़की बेअसर

पिछले वर्ष पुरानी आबादी के गड्ढा क्षेत्र में सरकंडों में आग लगने की घटना के बाद विधायक जयदीप बिहाणी ने मौके का निरीक्षण किया था। निरीक्षण के दौरान उन्होंने सरकारी भूमि पर हुए कब्जों को देखकर नाराजगी जताई थी और नगर परिषद अधिकारियों को अतिक्रमण हटाने के निर्देश भी दिए थे। इसके बावजूद अब तक बड़े स्तर पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। इधर, पूर्व पार्षदों का कहना है कि यदि समय रहते अतिक्रमण नहीं हटाए गए और गड्ढा क्षेत्रों को मूल स्वरूप में बहाल नहीं किया गया तो भविष्य में बारिश के दौरान हालात और भयावह हो सकते हैं।

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