
Maha shivratri stotram lyrics|फोटो सोर्स- Freepik
Shiv Tandav Stotram: महाशिवरात्रि(Maha Shivaratri 2026)का पावन पर्व भगवान शिव की आराधना के लिए सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। इस दिन भक्त व्रत, रुद्राभिषेक और मंत्र-जाप के माध्यम से भोलेनाथ को प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं। मान्यता है कि रावण द्वारा रचित शिव तांडव स्तोत्र का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से विशेष आध्यात्मिक ऊर्जा और महादेव की कृपा प्राप्त होती है। कहा जाता है कि इस स्तोत्र का नियमित जाप न केवल भय और बाधाओं को दूर करता है, बल्कि आत्मबल, सकारात्मकता और सफलता का मार्ग भी प्रशस्त करता है।
शिव तांडव स्तोत्र को अत्यंत शक्तिशाली माना गया है। नियमित रूप से और पूरी श्रद्धा के साथ इसका पाठ करने से आसपास की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। यह मन और वातावरण दोनों को शुद्ध करता है। घर में सकारात्मकता और शांति बनी रहती है।
ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार, जो लोग कालसर्प दोष से पीड़ित हैं, उन्हें प्रतिदिन भगवान शिव की प्रतिमा या शिवलिंग के सामने बैठकर इस स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। ऐसा करने से दोष के प्रभाव में कमी आती है और जीवन में आ रही बाधाएं धीरे-धीरे दूर होने लगती हैं।
यदि जीवन में लगातार समस्याएं आ रही हैं या मन अशांत रहता है, तो शिव तांडव स्तोत्र का पाठ कर भगवान शिव से क्षमा याचना करनी चाहिए। सच्चे मन से की गई प्रार्थना भगवान तक अवश्य पहुंचती है और राह आसान होती है।
भगवान शिव को मृत्यु का स्वामी भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस स्तोत्र का जाप करने से असमय मृत्यु का भय दूर होता है और व्यक्ति को लंबी आयु व उत्तम स्वास्थ्य का आशीर्वाद मिलता है।
भगवान शिव के मस्तक पर चंद्रमा विराजमान है। जिन लोगों को मानसिक तनाव, चिंता, नकारात्मक विचार या चंद्रमा से जुड़े दोष परेशान कर रहे हों, उन्हें शिव तांडव स्तोत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए। इससे मन को शांति मिलती है और मानसिक संतुलन बेहतर होता है।
जटाटवीगलज्जल प्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्।
डमड्डमड्डमड्डमनिनादवड्डमर्वयं
चकार चंडतांडवं तनोतु नः शिवः शिवम ॥1॥
जटा कटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी ।
विलोलवी चिवल्लरी विराजमानमूर्धनि ।
धगद्धगद्ध गज्ज्वलल्ललाट पट्टपावके
किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं ममं ॥2॥
धरा धरेंद्र नंदिनी विलास बंधुवंधुर-
स्फुरदृगंत संतति प्रमोद मानमानसे ।
कृपाकटा क्षधारणी निरुद्धदुर्धरापदि
कवचिद्विगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥3॥
जटा भुजं गपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा-
कदंबकुंकुम द्रवप्रलिप्त दिग्वधूमुखे ।
मदांध सिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदद्भुतं बिंभर्तु भूतभर्तरि ॥4॥
सहस्र लोचन प्रभृत्य शेषलेखशेखर-
प्रसून धूलिधोरणी विधूसरांघ्रिपीठभूः ।
भुजंगराज मालया निबद्धजाटजूटकः
श्रिये चिराय जायतां चकोर बंधुशेखरः ॥5॥
ललाट चत्वरज्वलद्धनंजयस्फुरिगभा-
निपीतपंचसायकं निमन्निलिंपनायम् ।
सुधा मयुख लेखया विराजमानशेखरं
महा कपालि संपदे शिरोजयालमस्तू नः ॥6॥
कराल भाल पट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-
द्धनंजया धरीकृतप्रचंडपंचसायके ।
धराधरेंद्र नंदिनी कुचाग्रचित्रपत्रक-
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने मतिर्मम ॥7॥
नवीन मेघ मंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर-
त्कुहु निशीथिनीतमः प्रबंधबंधुकंधरः ।
निलिम्पनिर्झरि धरस्तनोतु कृत्ति सिंधुरः
कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥8॥
प्रफुल्ल नील पंकज प्रपंचकालिमच्छटा-
विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्
स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥9॥
अगर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी-
रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम् ।
स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं
गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥10॥
जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंगमस्फुर-
द्धगद्धगद्वि निर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्-
धिमिद्धिमिद्धिमि नन्मृदंगतुंगमंगल-
ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥11॥
दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंग मौक्तिकमस्रजो-
र्गरिष्ठरत्नलोष्टयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।
तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥12॥
कदा निलिंपनिर्झरी निकुजकोटरे वसन्
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मंत्रमुच्चरन्कदा सुखी भवाम्यहम्॥13॥
निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-
निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः ।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं
परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥14॥
प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी
महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना ।
विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः
शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम् ॥15॥
इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं
पठन्स्मरन् ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नांयथा गतिं
विमोहनं हि देहना तु शंकरस्य चिंतनम ॥16॥
पूजाऽवसानसमये दशवक्रत्रगीतं
यः शम्भूपूजनमिदं पठति प्रदोषे ।
तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां
लक्ष्मी सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥17॥
Published on:
11 Feb 2026 05:00 pm
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