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Holi 2026: होलिका दहन 2026: जानिए जयपुर में ग्रहण का समय, राशि अनुसार करें आहुति और पाएं लक्ष्मी कृपा

Holi 2026 में 2 मार्च को होलिका दहन और 3 मार्च को रंगोत्सव मनाया जाएगा। जानें भद्रा काल, प्रदोष मुहूर्त (6:24–6:36 PM), चंद्र ग्रहण समय, राशि अनुसार आहुति, शनि-राहु-केतु दोष निवारण उपाय, और होलिका दहन की पौराणिक कथा।

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जयपुर

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Manoj Vashisth

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Anish Vyas

Mar 01, 2026

Holi 2026 Muhurat:

Holi 2026 Muhurat: : होलिका दहन पर शनि-राहु-केतु से मुक्ति के उपाय, जानें क्या करें और क्या न करें (फोटो सोर्स: Gemini AI)

Holi 2026 Muhurat : हिंदू धर्म में होली का त्योहार दो दिवसीय होता है। इसकी शुरुआत होलिका दहन से होती है। होलिका दहन फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। पुराणों में होलिका दहन और पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। माना जाता है कि होलिका दहन के दिन होली की पूजा करने से महालक्ष्मी प्रसन्न होती हैं। मान्यता है कि मां लक्ष्मी के साथ सुख-समृद्धि और खुशहाली आती है। फाल्गुन मास की पूर्णिमा को होलिका दहन किया जाता है। ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि रंगों का त्योहार होली इस बार 3 मार्च को मनेगा। इससे एक दिन पहले 2 मार्च को होली जलाई जाएगी। इस बार भद्रा दोष रहेगा। हालांकि इस बार होलिका दहन का समय 2 मार्च की शाम और अर्द्ध रात्रि में किया जाएगा, जिसमें भी 2 मार्च की शाम को सिर्फ 12 मिनट का ही समय मिलेगा, जबकि अर्द्ध रात्रि में 1 घंटे 10 मिनट का समय होलिका दहन के लिए मिल रहा है। खास बात यह भी है कि इस बार होली के दिन चंद्र ग्रहण भी रहेगा।

ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि होली के बाद से दीपावली तक तेजी का माहौल बना रहेगा। लेकिन बिजनेस करने वालों के लिए अच्छी स्थितियां बनेंगे और फायदे वाला समय रहेगा। विदेशी निवेश में भी वृद्धि होने के योग हैं। मंदी खत्म होगी। देश में बीमारियों का संक्रमण कम होने लगेगा उद्योग बढ़ेंगे। रियल एस्टेट से जुड़े लोगों को अच्छा समय शुरू होगा। महंगाई पर नियंत्रण बना रहेगा।

होलिका दहन पर भद्रा का साया

2 मार्च को शाम 5:56 बजे भद्रा काल प्रारंभ होगा, जो 3 मार्च सुबह 5:28 बजे तक रहेगा। इस वर्ष भद्रा भूलोक में और सिंह राशि में मानी जा रही है, इसलिए प्रदोष काल में होलिका पूजन और दहन शास्त्रसम्मत और श्रेष्ठ रहेगा। फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की पूर्णिमा तिथि पर होलिका पूजन का विशेष महत्व होता है। भद्रा काल में दान-पुण्य भी किया जा सकता है। इस बार होली चंद्र ग्रहण के साये में मनाई जाएगी। 3 मार्च को दोपहर 3:20 बजे चंद्र ग्रहण शुरू होगा और शाम 6:48 बजे समाप्त होगा।

जयपुर में चंद्र उदय शाम 6:29 बजे और ग्रहण का समापन 6:48 बजे होगा, जिससे ग्रहण काल मात्र 18 मिनट का रहेगा। ग्रहण का सूतक मंगलवार सुबह 6:20 बजे से लागू होगा। ग्रहण पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र और सिंह राशि में बनेगा और भारत में दिखाई देगा। चंद्र ग्रहण होने से होलिका दहन 2 मार्च को एक दिन पहले ही करना शुभ रहेगा। इस प्रकार, रंगों का त्योहार 3 मार्च को मनाया जाएगा।

होलिका दहन

फाल्गुनशुक्ल की प्रदोषव्यापिनी पूर्णिमा को भद्रा रहित में करना शास्त्रसम्मत बताया गया है। फाल्गुन पूर्णिमा तिथि 2 मार्च 2026 को शाम 5:56 बजे शुरू होकर 3 मार्च 2026 को शाम 5:07 बजे तक समाप्त होगी। प्रदोषकाल में पूर्णिमा होने से दिनांक 02 मार्च 2026 (सोमवार) को ही होलिका दहन होगा। इस दिन भद्रा सायं 05:56 से अन्तरात्रि 05:28 तक भूमिलोक (नैऋत्यकोण अशुभ) की रहेगी, जो कि सर्वथा त्याज्य है।

यथा :- भद्रायां द्वे न कर्तव्ये श्रावणी (रक्षाबंधन) फाल्गुनी ऐलिकादहन) तथा। श्रावणी नृपतिं हन्ति ग्रामं दहति फाल्गुनी ॥ - मुहूर्तचिन्तामणि

श्रेष्ठ मुहूर्त (प्रदोषकाल)

धर्मसिन्धु के प्रमाणानुसार दिनांक 02 मार्च 2026 सोमवार को सायं 06:24 से सायं 06:36 के मध्य प्रदोषकाल में होलिका दहन श्रेष्ठ होगा।
अन्य मुहूर्त :- भद्रा पुच्छ मध्यरात्रि 01:23 से 02:34 तक रहेगी, जिसमें परम्परा के अनुसार होलिका दहन किया जा सकता है, परन्तु भद्रा समाप्ति के बाद कदापि नहीं करें।
यदि भद्रा निशीथकाल से आगे तक रहे तो (भद्रा मुख को छोड़कर) होलिका दहन भद्रकाल (भद्रा पुच्छ या प्रदोष) में किया जाना चाहिए। 2 मार्च 2026 को, भद्रा और भद्रा पुच्छ ही निशीथकाल से आगे तक व्याप्त हैं। प्रदोष काल ही होलिका दहन हेतु श्रेष्ठ हैं।

कैसे करें होलिका दहन

भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि होलिका दहन के बाद जल से अर्घ्य दें। शुभ मुहूर्त में होलिका में स्वयं या परिवार के किसी वरिष्ठ सदस्य से अग्नि प्रज्जवलित कराएं। आग में किसी भी फसल को सेंक लें और अगले दिन इसे सपरिवार ग्रहण करें। मान्यता है कि ऐसा करने से परिवार के सदस्यों को रोगों से मुक्ति मिलती है।

होलिका दहन के दिन क्या नहीं करना चाहिए

होलिका दहन के दिन सफेद खाद्य पदार्थ ग्रहण नहीं करना चाहिए। होलिका दहन के समय सिर ढंककर ही पूजा करनी चाहिए। नवविवाहित महिलाओं को होलिका दहन नहीं देखना चाहिए। सास-बहू को एक साथ मिलकर होलिका दहन नहीं देखना चाहिए। इस दिन को भी शुभ या मांगलिक कार्य नहीं करना चाहिए।

होलिका दहन की रात भी महारात्रि की श्रेणी में शामिल

होलिका दहन की रात को भी दीपावली और शिवरात्रि की भांति ही महारात्रि की श्रेणी में शामिल किया गया है। होलिका की राख को मस्तक पर लगाने का भी विधान है। ऐसा करने से शारीरिक कष्ट दूर होते हैं। इस रात मंत्र जाप करने से वे मंत्र सिद्धि प्राप्त होती है। जीवन सुखमय बनता है, जीवन में आने वाली सभी परेशानियों का अपने आप निराकरण हो जाता है।

राशि अनुसार करें होलिका की पूजा

क्रमांकराशिहोलिका दहन में आहुति
1मेषगुड़
2वृषभचीनी
3मिथुनकपूर
4कर्कलोबान
5सिंहगुड़
6कन्याकपूर
7तुलाकपूर
8वृश्चिकगुड़
9धनुजौ और चना
10मकरतिल
11कुंभतिल
12मीनजौ और चना

शनि-राहु-केतु और नजर दोष से मुक्ति के उपाय

कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि होलिकादहन करने या फिर उसके दर्शन मात्र से भी व्यक्ति को शनि-राहु-केतु के साथ नजर दोष से मुक्ति मिलती है। माना जाता है कि होली की भस्म का टीका लगाने से नजर दोष तथा प्रेतबाधा से मुक्ति मिलती है। किसी मनोकामना को पूरा करना चाहते हैं तो जलती होली में 3 गोमती चक्र हाथ में लेकर अपनी इच्छा को 21 बार मन में बोलकर तीनों गोमती चक्र को अग्नि में डालकर अग्नि को प्रणाम करके वापस आ जाएं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यदि कोई व्यक्ति घर में भस्म चांदी की डिब्बी में रखता है तो उसकी कई बाधाएं अपने आप ही दूर हो जाती हैं। अपने कार्यों में आने वाली बाधा को दूर करने के लिए आटे का चौमुखा दीपक सरसों के तेल से भरकर उसमें कुछ दाने काले तिल,एक बताशा, सिन्दूर और एक तांबे का सिक्का डालकर उसे होली की अग्नि से जलाएं। अब इस दीपक को घर के पीड़ित व्यक्ति के सिर से उतारकर किसी सुनसान चौराहे पर रखकर बगैर पीछे मुड़े वापस आकर अपने हाथ-पैर धोकर घर में प्रवेश कर लें।

होलिका दहन कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रह्लाद भगवान के अनन्य भक्त थे। उनकी इस भक्ति से पिता हिरण्यकश्यप नाखुश थे। इसी बात को लेकर उन्होंने अपने पुत्र को भगवान की भक्ति से हटाने के लिए कई प्रयास किए, लेकिन भक्त प्रह्लाद प्रभु की भक्ति को नहीं छोड़ पाए। अंत में हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र को मारने के लिए योजना बनाई। अपनी बहन होलिका की गोद में प्रह्लाद को बैठाकर अग्नि के हवाले कर दिया। लेकिन भगवान की ऐसी कृपा हुई कि होलिका जलकर भस्म हो गई और भक्त प्रह्लाद आग से सुरक्षित बाहर निकल आए, तभी से होली पर्व को मनाने की प्रथा शुरू हुई।

एक अन्य कथा के अनुसार, हिमालय पुत्री पार्वती चाहती थीं कि उनका विवाह भगवान शिव से हो जाये पर शिवजी अपनी तपस्या में लीन थे। कामदेव पार्वती की सहायता को आये। उन्होंने प्रेम बाण चलाया और भगवान शिव की तपस्या भंग हो गयी। शिवजी को बड़ा क्रोध आया और उन्होंने अपनी तीसरी आंख खोल दी। उनके क्रोध की ज्वाला में कामदेव का शरीर भस्म हो गया। फिर शिवजी ने पार्वती को देखा। पार्वती की आराधना सफल हुई और शिवजी ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया। होली की आग में वासनात्मक आकर्षण को प्रतीकत्मक रूप से जला कर सच्चे प्रेम की विजय का उत्सव मनाया जाता है।