
-विनय कौड़ा, अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार
डॉनल्ड ट्रंप की ओर से प्रस्तावित 'बोर्ड ऑफ पीस' वैश्विक राजनीति में एक विवादास्पद और दूरगामी पहल के रूप में उभरा है। गाजा युद्ध के बाद की स्थिति संभालने और संघर्ष समाधान के लिए इसे प्रस्तुत किया गया है, किंतु इसके निहितार्थ केवल शांति-स्थापना तक सीमित नहीं हैं। प्रथम दृष्टया यह पहल शांति, पुनर्निर्माण और स्थिरता की आकांक्षा से जुड़ी प्रतीत होती है परंतु गहन विश्लेषण में यह अमरीका के रणनीतिक हितों, शक्ति-राजनीति और वैश्विक नेतृत्व को नए सिरे से परिभाषित करने का प्रयास अधिक जान पड़ता है। ट्रंप का यह मंच संयुक्त राष्ट्र जैसी बहुपक्षीय संस्थाओं के विकल्प के रूप में उभरने का संकेत देता है। इसी कारण अंतरराष्ट्रीय समुदाय में यह प्रश्न उठ रहा है कि क्या भविष्य में शांति और सुरक्षा केवल आर्थिक और सामरिक शक्ति के आधार पर निर्धारित होगी।
फ्रांस, ब्रिटेन, नॉर्वे, स्वीडन और स्लोवेनिया जैसे कई यूरोपीय देशों ने इस पहल से दूरी बनाई है, क्योंकि उनका मानना है कि यह बोर्ड संयुक्त राष्ट्र की वैधता और उसकी केंद्रीय भूमिका को कमजोर कर सकता है। रूस और चीन अभी इस प्रस्ताव पर विचार कर रहे हैं, क्योंकि वे इसे पश्चिमी नेतृत्व वाली वैश्विक व्यवस्था पर दबाव बनाने या संभावित विकल्प के रूप में देख रहे हैं। इस प्रकार 'बोर्ड ऑफ पीस' वैश्विक धु्रवीकरण का नया केंद्र बनता दिखाई देता है। इस पहल की संरचना और कार्यप्रणाली इसके विवादास्पद पक्ष हैं। बोर्ड में शामिल होने के लिए देशों से आर्थिक योगदान की अपेक्षा की गई है, जिससे यह संकेत मिलता है कि शांति अब केवल नैतिक दायित्व नहीं, बल्कि भुगतान-आधारित सदस्यता में परिवर्तित हो रही है। ट्रंप की सोच में शांति का अर्थ आदर्श वैश्विक व्यवस्था की स्थापना नहीं, बल्कि ऐसे संघर्षों का प्रबंधन है जो अमरीकी हितों को प्रभावित न करें। 'बोर्ड ऑफ पीस' इसी सोच का विस्तार प्रतीत होता है, जिसमें त्वरित और कथित रूप से व्यावहारिक निर्णयों को प्राथमिकता दी जा रही है।
ट्रंप ने भारत को शामिल होने का निमंत्रण दिया है, किंतु नई दिल्ली ने अभी तक कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया है। भारत की पारंपरिक विदेश नीति गुटनिरपेक्षता, रणनीतिक स्वायत्तता और संयुक्त राष्ट्र आधारित बहुपक्षीय व्यवस्था के समर्थन पर आधारित रही है। ऐसे में अमरीकी प्रभाव वाले इस बोर्ड में शामिल होना भारत की दीर्घकालिक कूटनीतिक सोच के साथ टकराव पैदा कर सकता है। स्थिति तब और जटिल होती है जब इसमें पाकिस्तान को भी शामिल किया गया है। यह पहल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की भूमिका पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्थापित संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था भले ही कमियों से ग्रस्त रही हो, किंतु उसकी वैधता व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहमति पर आधारित रही है। ट्रंप का बोर्ड इस वैधता को चुनौती देता प्रतीत होता है और अमरीका को शांति व संघर्ष समाधान का अनिवार्य मध्यस्थ बनाने का प्रयास करता है। इससे वैश्विक शासन और अधिक असंतुलित हो सकता है।
आज दुनिया केवल अमरीका-केंद्रित नहीं है। चीन, रूस, भारत और यूरोपीय संघ जैसी शक्तियां भी प्रभावशाली भूमिका निभा रही हैं। यदि शांति और सुरक्षा के नए मंच अमरीका के नेतृत्व में उभरते हैं, तो अन्य शक्तियां उनसे दूरी बनाएंगी या वैकल्पिक संस्थागत ढांचे विकसित करेंगी। 'बोर्ड ऑफ पीस' यह मूल प्रश्न उठाता है कि शांति की परिभाषा और उसका संचालन किसके हाथ में होगा? क्या शांति सार्वभौमिक मूल्य के रूप में कायम रह पाएगी या केवल शक्ति और संसाधनों का उपोत्पाद बनकर रह जाएगी? ट्रंप की पहल संकेत देती है कि वैश्विक सहमति, संस्थागत संतुलन और न्यायपूर्ण शांति की राह पहले से कहीं अधिक कठिन और विवादग्रस्त होगी।
Published on:
24 Jan 2026 12:58 pm
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