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स्मृति शेष: भारत को पर्यावरणीय विवेक देने वाले वैज्ञानिक थे माधव गाडगिल

संस्थागत निर्माण उनके विरासत का एक और महत्वपूर्ण पहलू था। भारतीय विज्ञान संस्थान में सेंटर फॉर इकोलॉजिकल साइंसेज की स्थापना में उन्होंने अहम भूमिका निभाई।

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जयपुर

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Opinion Desk

Jan 12, 2026

-चंद्र भूषण, सीईओ, आइफॉरेस्‍ट

भारत के लंबे ऐतिहासिक प्रवाह में बहुत कम ऐसे वैज्ञानिक हुए हैं जिन्होंने जनमानस पर गहरी छाप छोड़ी हो। माधव गाडगिल उनमें से एक थे। 2010 के दशक में, उनके नेतृत्व में तैयार की गई वेस्टर्न घाट्स इकोलॉजी एक्सपर्ट पैनल (WGEEP) की रिपोर्ट जिसे गाडगिल रिपोर्ट के नाम से जाना जाता है, ने देश भर में तीखी बहस छेड़ दी। यह रिपोर्ट अखबारों के पहले पन्नों से लेकर प्राइम टाइम टीवी चर्चाओं, जनसभाओं और राजनीतिक मंचों तक चर्चा का विषय बनी। किसी वैज्ञानिक आकलन को लेकर शायद ही पहले कभी इतना तीव्र विरोध हुआ हो, और उसी तीव्रता से गाडगिल की बौद्धिक कठोरता और स्पष्टवादिता का समर्थन भी किया गया हो।

डॉ. गाडगिल से मेरी व्यक्तिगत मुलाकातें सीमित रहीं—एक आमने-सामने की भेंट और एक संक्षिप्त फोन बातचीत। इसके बावजूद, मुझे हमेशा ऐसा लगा कि मैं उन्हें अच्छी तरह जानता हूं। इसका कारण वे विचार थे, जो उनके लेखन में झलकते थे, और वे संस्थान थे, जिन्हें उन्होंने गढ़ा और पोषित किया। मेरे आसपास के कई पर्यावरणवादियों में वे एक अत्यंत प्रभावशाली व्यक्तित्व के रूप में उपस्थित थे। वेस्टर्न घाट्स रिपोर्ट के प्रकाशन के कुछ समय बाद, सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) में उनसे मेरी मुलाकात हुई। हमने रिपोर्ट के कुछ पहलुओं की आलोचना की थी, और उसी पर चर्चा करने के लिए वे आए थे। उस बातचीत में मुझे न केवल उनकी तीक्ष्ण बुद्धि का अनुभव हुआ, बल्कि यह भी स्पष्ट हुआ कि यह विषय उनके लिए कितना व्यक्तिगत था। वेस्टर्न घाट्स उनके लिए मात्र एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं था; वह एक जीवित पारिस्थितिक इकाई थी, जिसके क्षरण को रोकना वे अपनी नैतिक जिम्मेदारी मानते थे।

मेरी दूसरी बातचीत 2021 में हुई दस मिनट से भी कम समय का एक फोन कॉल। मैं भारत के वनों के लिए एक इकोलॉजिकल इंडेक्स विकसित करने पर काम कर रहा था, जिसमें जंगलों के स्वास्थ्य का आकलन केवल वृक्षावरण (कैनोपी कवर) के आधार पर नहीं, बल्कि जैव विविधता, पारिस्थितिक कार्यों और स्थानीय समुदायों की आजीविका पर निर्भरता जैसे मानकों पर किया जाना था। डॉ. गाडगिल न केवल एक अग्रणी पर्यावरण वैज्ञानिक थे, बल्कि गणितज्ञ भी थे, इसलिए मैं चाहता था कि वे इस पद्धति की समीक्षा करें। उन्होंने ध्यान से सुना, विचार में रुचि दिखाई, और फिर अत्यंत विनम्रता से मना कर दिया। क्योंकि वे उस समय अपनी आत्मकथा लिखने में पूरी तरह व्यस्त थे। उस संक्षिप्त संवाद से भी उनकी बौद्धिक उदारता और जिज्ञासा स्पष्ट झलकती थी। हालांकि, गाडगिल की विरासत व्यक्तिगत स्मृतियों से कहीं आगे जाती है; वह उनके कार्यों में स्थायी रूप से अंकित है।

मेरे सहित अनेक लोगों की पर्यावरणीय चेतना उनके लेखन के माध्यम से विकसित हुई। रामचंद्र गुहा के साथ सह-लेखन की गई पुस्तकें This Fissured Land और Ecology and Equity भारत के पर्यावरणीय इतिहास को समझने के लिए आधारभूत ग्रंथ मानी जाती हैं। इन पुस्तकों ने ऐसी अवधारणाएं सामने रखीं जो एक साथ क्रांतिकारी भी थीं और सहज भी। प्राकृतिक संसाधनों का टिकाऊ उपयोग, जन-आधारित संरक्षण, और पर्यावरणीय विस्थापितों की अवधारणा आज भी ये विचार वैश्विक पर्यावरणीय विमर्श को प्रभावित कर रहे हैं। इन पुस्तकों ने अहिंसा, शाकाहार और मिश्रित खेती जैसी भारतीय परंपराओं को पर्यावरणीय दृष्टि से समझने का दृष्टिकोण दिया। इस लेखन ने मेरे भीतर यह विश्वास गहराया कि यदि संरक्षण लोगों से कटकर किया जाए, तो वह न नैतिक होता है और न ही प्रभावी।

सार्वजनिक नीति में उनका योगदान भी उतना ही महत्त्वपूर्ण रहा। जैव विविधता अधिनियम और WGEEP रिपोर्ट इसके प्रमुख उदाहरण हैं। स्थानीय समुदायों को जैविक संसाधनों के प्रबंधन और लाभ का अधिकार देने के उद्देश्य से बनाया गया जैव विविधता अधिनियम आज भी कमजोर क्रियान्वयन के कारण सीमित प्रभाव ही डाल पा रहा है। वहीं, WGEEP रिपोर्ट—जो पूरे वेस्टर्न घाट्स को पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने और एक नए राष्ट्रीय प्राधिकरण पर आधारित शासन संरचना की सिफारिश करती थी—को ‘अव्यवहारिक’ कहकर किनारे कर दिया गया। वेस्टर्न घाट्स रिपोर्ट पर मेरी मुख्य आलोचना उसकी कमांड-एंड-कंट्रोल शैली की शासन व्यवस्था को लेकर थी, जिसमें आर्थिक और बाजार-आधारित उपकरणों की कमी थी। पर्यावरण प्रबंधन में बाजार तंत्र पर अविश्वास डॉ. गाडगिल के दृष्टिकोण का हिस्सा था, और इसलिए उनके प्रस्तावों में ये तत्व अनुपस्थित रहे। साथ ही, समुदाय-आधारित प्रबंधन पर उनका भरोसा आज एक ऐसे यथार्थ से टकराता है, जहां समुदाय स्वयं अधिक औद्योगिक और उपभोगवादी होते जा रहे हैं। फिर भी, ये तनाव उसी व्यापक और आवश्यक बहस का हिस्सा हैं, जिसका सामना करने के लिए डॉ. गाडगिल ने भारत को विवश किया।

संस्थागत निर्माण उनके विरासत का एक और महत्वपूर्ण पहलू था। भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) में सेंटर फॉर इकोलॉजिकल साइंसेज की स्थापना में उन्होंने अहम भूमिका निभाई। आज यह केंद्र देश के सबसे प्रतिष्ठित पर्यावरणीय अनुसंधान संस्थानों में गिना जाता है। यहां से प्रशिक्षित अनेक पर्यावरण वैज्ञानिक आज भारत भर में संरक्षण विज्ञान, नीति निर्माण और जमीनी क्रियान्वयन में प्रभावशाली भूमिका निभा रहे हैं। गाडगिल भारत की कुछ सबसे निर्णायक पर्यावरणीय आंदोलनों से भी जुड़े रहे। केरल की साइलेंट वैली में बांध निर्माण के पर्यावरणीय औचित्य पर सवाल उठाने वाले वैज्ञानिक अध्ययन में उनकी भूमिका अहम थी। इस हस्तक्षेप ने भारत के एक अत्यंत समृद्ध उष्णकटिबंधीय वन को बचाया और भारतीय पर्यावरणवाद के इतिहास में एक मील का पत्थर स्थापित किया।

माधव गाडगिल अपने क्षेत्र की एक महान विभूति थे। जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता के क्षरण और बढ़ती सामाजिक असमानता जैसे गहराते पर्यावरणीय संकटों के इस दौर में, भारत को और अधिक गाडगिलों की आवश्यकता है—ऐसे विचारकों की, जिनमें बौद्धिक साहस हो, नैतिक स्पष्टता हो, और भिन्न मतों से संवाद करने की तत्परता हो। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि विज्ञान अपने सर्वोत्तम रूप में केवल दुनिया को समझने तक सीमित नहीं रहता; वह दुनिया की रक्षा करने और उसे बेहतर बनाने का माध्यम भी होता है।


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