12 जनवरी 2026,

सोमवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

एआइ के कमाल के पीछे शोषण आखिर किसका?

एक तरफ ऐसे अनगिनत क्रिएटर और छोटे संस्थान हैं, जिन्हें पता भी नहीं कि उनकी किस रचना का इस्तेमाल एआइ को ट्रेनिंग देने के लिए किया गया है। वहीं दूसरी ओर, डिज्नी जैसी कंपनियां हैं, जिन्होंने एआइ के साथ अपनी क्रिएटिविटी को साझा करके अरबों डालर कमा लिए हैं।

4 min read
Google source verification

जयपुर

image

Opinion Desk

Jan 12, 2026

-बालेन्दु शर्मा दाधीच, लेखक वरिष्ठ सूचना प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ हैं

वैसे तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की क्रिएटिविटी के कई पहलू काबिले गौर हैं, लेकिन एक बड़ा मामला बौद्धिक संपदा का भी है। जो लोग एआइ का इस्तेमाल करके प्रफुल्लित हैं उन्हें शायद ही इस बात की खबर हो कि इन हैरतअंगेज शक्तियों के पीछे किसी इंसान या संस्थान की क्रिएटिविटी और बौद्धिक संपदा का इस्तेमाल हुआ है। एक तरफ डिज्नी जैसी कंपनियां हैं, जिन्होंने एआइ के साथ अपनी क्रिएटिविटी को साझा करके अरबों डालर कमा लिए हैं, वहीं दूसरी तरफ ऐसे अनगिनत क्रिएटर और छोटे संस्थान हैं, जिन्हें पता भी नहीं कि उनकी किस रचना का इस्तेमाल एआइ को ट्रेनिंग देने के लिए किया गया है। जिन्हें इसकी भनक भी है वे नहीं जानते कि इसका मतलब क्या है और उन्हें इससे क्या फर्क पड़ता है। क्या उनके किसी अधिकार का उल्लंघन हो रहा है या फिर क्या इसके कोई आर्थिक मायने भी हैं जो उनके लिए फायदेमंद हो सकते हैं।

आज एआइ मोजार्ट जैसा संगीत, डिज्नी जैसे कार्टून चरित्र और पिकासो जैसे चित्र बना सकता है। एकदम वैसे नहीं तो उनकी शैली में। जहां न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे बड़े मीडिया संस्थानों ने ओपन एआइ, परप्लेक्सिटी आदि एआइ कंपनियों के खिलाफ मुकदमे किए हैं वहीं छोटी कंपनियों, फर्मों और क्रिएटर्स को समझ नहीं आ रहा कि करें तो क्या करें। उनकी सामग्री के बदले न तो पैसे मिल रहे हैं और न ही उनसे इजाजत ही ली जा रही है। जब आप चैट जीपीटी, जेमिनी या मिडजर्नी जैसे एआइ टूल का इस्तेमाल करते हैं तो ये आपको तुरंत कहानियां, तस्वीरें या गाने बनाकर दे देते हैं। लेकिन एआइ सिस्टमों में यह काबिलियत सीखने (ट्रेनिंग) के जरिए आती है और उन्हें सिखाने के लिए लाखों-करोड़ों किताबों, गानों, तस्वीरों, समाचारों, साहित्य, वीडियो और लेखों आदि का इस्तेमाल किया जाता है। यह सामग्री असली लेखकों, चित्रकारों, संगीतकारों आदि ने बनाई होती है जिसे एआइ कंपनियों ने यहां-वहां से जुटाकर इस्तेमाल किया। कुछ सामग्री बाकायदा आपसी एग्रीमेंट के जरिए मिलती है लेकिन बहुत सारी ऐसे ही इधर-उधर से, खासकर इंटरनेट से बटोर ली जाती है। उनके मूल निर्माताओं से पूछा तक नहीं जाता।

रचनाकारों को बहुत सारी शिकायतें हैं। पहली यह कि उनसे पूछे बिना उनकी सामग्री इस्तेमाल हो जाती है। दूसरी, यह पता लगाना नामुमकिन है कि एआइ ने किस लेखक या कलाकार की कितनी सामग्री का इस्तेमाल किया। तीसरी शिकायत यह कि छोटे रचनाकारों को बड़ी कंपनियों जैसे अनुपात में फायदा नहीं मिलता। एक सर्वे में 40 फीसदी संगीतकारों ने कहा कि वे काम छोडऩे की सोच रहे हैं क्योंकि उन्हें डर है कि उनकी मेहनत बेकार चली जाएगी। इस बीच, ब्रिटेन ने इस समस्या के हल का रास्ता सुझाया है। ब्रिटिश सरकार ने एक ऐसे प्रस्ताव पर विचार शुरू किया है, जो एआइ कंपनियों को कॉपीराइट वाली सामग्री का उपयोग करने की अनुमति देगा, बशर्ते वे इसके बदले रॉयल्टी का भुगतान करें। प्रस्ताव के मुताबिक, अगर कोई रचनाकार मना करे, तो उनकी सामग्री इस्तेमाल नहीं की जा सकती। लेकिन यह रास्ता भी फुलप्रूफ नहीं है। एआइ मॉडलों की ट्रेनिंग में तो लाखों स्रोतों का इस्तेमाल होता है। इनमें से किसकी सामग्री का कितना इस्तेमाल हुआ और उन्हें कितनी रॉयल्टी दी जाएगी, कैसे पता चलेगा? आशंका यही है कि दी जाने वाली रकम का मोटा हिस्सा बड़ी तथा असरदार कंपनियां ले जाएंगी और छोटे रचनाकार पीछे रह जाएंगे।

अलग-अलग देशों ने इस मुद्दे को अलग-अलग तरीके से देखा है। अमरीका में इस बारे में कोई खास कानून नहीं है। वहां 'फेयर यूज' का नियम है, जिसका मतलब है कि कुछ 'उचित' मामलों में सामग्री को बिना पूछे इस्तेमाल किया जा सकता है। अगर रचनाकारों को ऐतराज है, तो उन्हें अदालत जाना पड़ता है। यह रास्ता रचनाकारों के लिए कठिन और एआइ कंपनियों के लिए आसान है। जापान ने 2018 में ही तय कर दिया था कि एआइ के लिए किसी भी सामग्री का इस्तेमाल किया जा सकता है। चीन में सब सरकार के नियंत्रण में है। वहां एआइ कंपनियां सरकार के कहने पर चलती हैं और रचनाकारों की आवाज बहुत कम सुनी जाती है। ऑस्ट्रेलिया में व्यवस्था है कि अगर एआइ प्लेटफार्म खबरों का इस्तेमाल करते हैं तो उन्हें अखबारों और समाचार वेबसाइटों को पैसे देने होंगे। कनाडा भी यूरोपीय संघ जैसे नियम बनाने की तैयारी कर रहा है, जिनके तहत रचनाकारों को आजादी है कि वे अपनी सामग्री के इस्तेमाल से मना कर दें। अगर वे इजाजत देते हैं तो उन्हें पैसे मिलेंगे।

भारत में अभी तक कोई साफ कानून नहीं है। हमारे यहां 50 करोड़ लोग यूट्यूब और स्पॉटिफाई जैसे प्लेटफॉर्मों पर अपनी सामग्री डालते हैं। दिसंबर 2025 में सरकार ने एक नया मसौदा बनाया है जो यूरोपीय संघ जैसा है। रचनाकार चाहें तो अपनी सामग्री के इस्तेमाल से इनकार कर सकते हैं और अगर इस्तेमाल होता है तो उन्हें पैसे मिलेंगे। हालांकि इसके लिए जो व्यवस्था सुझाई जा रही है वह बहुत जटिल दिखती है। तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। एआइ कंपनियों को लगता है कि इससे उनका काम मुश्किल हो जाएगा। अगर रचनाकारों से हर बार पूछना पड़ा, तो उनकी लागत 90 फीसदी बढ़ जाएगी। कंपनियों का तर्क है कि एआइ तो सभी के लिए फायदेमंद है। अब एक छोटा रचनाकार भी कुछ सेकंड में गाने या कहानियां बना सकता है। उनका कहना है कि अगर सख्त नियम लागू किए गए तो सिर्फ अमरीका और चीन ही एआइ के क्षेत्र में आगे बढ़ेंगे जबकि बाकी देश पीछे रह जाएंगे। सवाल टेढ़ा है। यह तय करना मुश्किल है कि इधर जाएं या उधर जाएं। लेकिन इतना तो है कि इस प्रक्रिया में एक पक्ष के साथ नाइंसाफी जरूर हो रही है जिसे शायद इसकी पूरी खबर भी नहीं।


मकर संक्रांति