जयपुर, Jun 02, 2026

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नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह द्वारा नेपाली संसद में भारत-नेपाल सीमा विवाद पर दिया गया बयान कूटनीतिक असावधानी का परिचायक है। उनका यह दावा कि नेपाल ने भी भारतीय भूमि पर अतिक्रमण किया है, नेपाल के भीतर ही तीव्र विरोध का कारण बन गया है। ऐतिहासिक तथ्यों और आधिकारिक रेकॉर्ड के अभाव में देश के शीर्ष पद से ऐसा अपरिपक्व बयान आना काठमांडू की कूटनीतिक साख को ठेस पहुंचाता है, जिसका खामियाजा अंतत: द्विपक्षीय वार्ताओं को भुगतना पड़ सकता है। सबसे चिंताजनक पहलू सीमा विवाद के समाधान के लिए तीसरे पक्ष को घसीटने का अव्यावहारिक सुझाव है। सुगौली संधि के संदर्भों का हवाला देकर ब्रिटेन को शामिल करने की मांग तो अतार्किक है ही, परंतु इस कूटनीतिक विमर्श में चीन को पक्षकार बनाने की कोशिश क्षेत्रीय भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ाने की आशंकाएं पैदा करती है।
लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा पूरी तरह से भारत और नेपाल के बीच का द्विपक्षीय मामला है। इस संवेदनशील त्रिकोणीय जंक्शन पर चीन की मौजूदगी को आमंत्रित करने या उसे महत्त्व देने की कोशिश कर प्रधानमंत्री बालेन ने परोक्ष रूप से भारत के ऐतिहासिक सहयोग और सुरक्षा चिंताओं को कमतर आंकने का प्रयास किया है। भारत अपनी सीमाओं से जुड़े मामलों में किसी भी तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप को पूरी तरह खारिज करता आया है। सामरिक दृष्टि से संवेदनशील इस हिमालयी क्षेत्र में भारत विरोधी तत्वों या विस्तारवादी शक्तियों को परोक्ष बढ़ावा देना स्वयं नेपाल के दीर्घकालिक हितों के प्रतिकूल हो सकता है।
भारत ने हमेशा नेपाल की संप्रभुता का सम्मान करते हुए एक बड़े भाई और विश्वसनीय सहयोगी की भूमिका निभाई है, चाहे वह बुनियादी ढांचे का विकास हो या आपदा के समय दी गई मदद। ऐसे में किसी तीसरे देश के भू-राजनीतिक कार्ड के मोहरे के रूप में कूटनीति का संचालन करना न केवल दोनों देशों के बीच आपसी विश्वास को कमजोर करता है, बल्कि दक्षिण एशिया की क्षेत्रीय स्थिरता को भी खतरे में डालता है। भारत-नेपाल के संबंध केवल राजनीतिक संधियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये 'रोटी-बेटी' के गहरे सांस्कृतिक और आर्थिक ताने-बाने से जुड़े हैं। ऐसे में अतीत के औपनिवेशिक शासकों या अन्य क्षेत्रीय ताकतों को मेज पर बुलाना जमीनी हकीकत से परे है।
नेपाल के विदेश मंत्रालय द्वारा दी गई सफाई और वहां के विशेषज्ञों, पूर्व राजदूतों तथा विपक्ष द्वारा जताई गई आपत्ति यह स्पष्ट करती है कि सीमा प्रबंधन जैसी जटिल समस्याओं का समाधान सार्वजनिक मंचों पर अनावश्यक बयानबाजी से नहीं, बल्कि कूटनीतिक माध्यमों से ही संभव है। आपसी विश्वास और निरंतर द्विपक्षीय संवाद से ही सीमा के लंबित मुद्दों को सुलझाया जा सकता है। भारत ने दोनों राष्ट्रों के साझा विकास के लिए यह मंशा पहले ही प्रकट कर दी है।
Published on: 02 Jun 2026 03:06 pm

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