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संपादकीय: जल संकट पर नहीं चेते तो प्यासी रह जाएंगी पीढ़ियां

भारत में सरकारों, संस्थाओं और एजेंसियों ने जल समस्या पर कई कदम उठाए हैं लेकिन भ्रष्टाचार ने संकट से भी बड़े पैर पसार लिए हैं। जल जीवन मिशन, अटल भूजल योजना और प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना जैसे कार्यक्रमों से जल संरक्षण को बढ़ावा मिला है।

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देश-दुनिया में जल संकट के हालात विकराल हो चुके हैं। गौर करें तो, विश्व स्तर पर 25 देश अत्यधिक जल तनाव से जूझ रहे हैं, जहां चार अरब लोग साल में कम से कम एक माह पानी की गंभीर कमी का सामना करते हैं। मध्य पूर्व, उत्तरी अफ्रीका और दक्षिण एशिया सबसे ज्यादा प्रभावित हैं, जहां जल आपूर्ति असुरक्षित स्तर पर पहुंच चुकी है। भारत में भी स्थिति भयावह है। यहां 600 मिलियन से अधिक लोग उच्च जल तनाव वाले क्षेत्रों में रहते हैं। राजस्थान, महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा और तमिलनाडु जैसे राज्य सबसे प्रभावित हैं, जबकि चेन्नई, बेंगलूरुऔर दिल्ली जैसे शहरों में पानी की कमी रोजमर्रा की समस्या बन गई है।

दरअसल, जल संकट अब 'वाटर स्ट्रेस' से आगे 'ग्लोबल वाटर बैंक्रेप्सी' की ओर बढ़ रहा है, जहां स्रोतों का दोहन इतना तेज है कि भरपाई असंभव लगती है। इस संकट का अर्थव्यवस्था और आमजन पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है। कृषि, उद्योग और ऊर्जा क्षेत्र ठप हो रहे हैं, जिससे जीडीपी में 6 प्रतिशत तक की कमी का खतरा मंडरा रहा है। आमजन के लिए तो यह जीवन-मरण का प्रश्न है। मुद्दे की बात यह है कि जहां पानी पर्याप्त है, वहां बर्बादी हो रही है और जहां कमी है, वहां लोग तरस रहे हैं। भारत में सरकारों, संस्थाओं और एजेंसियों ने जल समस्या पर कई कदम उठाए हैं लेकिन भ्रष्टाचार ने संकट से भी बड़े पैर पसार लिए हैं। जल जीवन मिशन, अटल भूजल योजना और प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना जैसे कार्यक्रमों से जल संरक्षण को बढ़ावा मिला है। जल शक्ति अभियान के तहत वर्षा जल संचयन पर जोर दिया गया। पाबंदियां भी लगाई गईं, मीटर लगे और उद्योगों पर जुर्माना भी किया गया लेकिन संरक्षण फिर भी नहीं हो पा रहा है। वजह साफ है कि विनियमन की कमी, अतिदोहन, जलवायु परिवर्तन और खराब प्रबंधन सबसे बड़ी बाधा हैं। खास बात है कि वाटर रिचार्ज के नए मॉडल आशा की किरण हैं, जैसे आर्टिफिशियल रिचार्ज संरचनाएं और रेनवाटर हार्वेस्टिंग।

दुनिया के अन्य देशों में भूजल संरक्षण के तरीके सीखने लायक हैं। इजराइल में ड्रिप इरिगेशन और डिसेलिनेशन से 90 प्रतिशत पानी का पुनर्चक्रण होता है। ऑस्ट्रेलिया में वाटर ट्रेडिंग से संसाधन वितरण सुनिश्चित होता है, लेकिन हम सिर्फ योजनाएं बनाते हैं जिनमें पैसा खर्च होता है लेकिन पानी नहीं मिलता। आमजन को जागरूक कर वर्षा जल संचयन, ड्रिप सिंचाई और अपशिष्ट जल पुन: उपयोग से संकट को कम किया जा सकता है। राजस्थान जैसे राज्यों में जोहड़ और खादिन जैसे पारंपरिक मॉडल बेहतर साबित हो सकते हैं। अमरीका में अपशिष्ट जल रिसाइक्लिंग और यूरोप में स्मार्ट वाटर मैनेजमेंट सिस्टम अपनाए जा रहे हैं। चूंकि समय कम है, सख्त नीतियां और सामूहिक प्रयास ही हमें इस वाटर बैक्रेप्सी (जल के दिवालियेपन) से बचा सकते हैं। अन्यथा आने वाली पीढ़ियां प्यासी रह जाएंगी।