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प्रसंगवश: आखिर किसने किया रिश्तों का कत्ल..? जानवर बनते हम..!

आधुनिकता के चक्कर में बढ़ती अपसंस्कृति से लिजलिजापन व सड़ांध

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Chhattisgarh

पिछले दिनों कोरबा जिले में एक हत्या हुई। एक युवती ने अपने पिता की हत्या कर दी। सुर्खियां बनी। स्वाभाविक बात है कि हत्या की घटना हुई है, तो खबर तो बनेगी ही। हत्या के संबंध में कुछ जानकारी पुलिस ने दी, तो कुछ बातें आरोपी युवती ने कही।

अब खबरें बनी। पारिवारिक विवाद में हत्या। रिश्तों का कत्ल। रिश्ते का कत्ल तो हुआ ही था, आखिर एक बेटी ने अपने पिता की जान जो ली थी। पर, इन सबके बीच एक बात जो सोचने को मजबूर कर रही थी कि एक बेटी ने अपने पिता की हत्या क्यों कर दी। क्योंकि, सामान्यत: ऐसा पढ़ने-देखने में नहीं आता। और, ऐसा माना जाता है कि पिता-पुत्री के बीच बहुत ही गहरी बॉन्डिंग होती है। ये माना ही नहीं जाता, बल्कि देखा-सुना भी जाता है। तो फिर ऐसा क्या हुआ कि एक बेटी ने इतना बड़ा कदम उठा लिया और अपने पिता को मार डाला। ढके-छुपे तरीके से जो बातें सामने आ रही हैं, वह सिहरन पैदा करती हैं। बैड टच।

पाश्चात्य संस्कृति, इंटरनेट व ओटीटी प्लेटफॉर्म पर ऐसी चीजों की भरमार है, जहां कोई भी रिश्ता मायने नहीं रखता..। वहां बस दो शरीर ही हैं, एक स्त्री और एक पुरुष। जब इस तरह का 'जहर' धीरे-धीरे हमारे दिलो-दिमाग में जा रहा है, तो वहां परिवार और रिश्तों की कोई अहमियत ही नहीं रह जाती।

ऐसे लिजलिजेपन और सड़ांध को बहुत ही शातिराना तरीकों से हमारे-आपके बीच लाया जाता है कि हम समझकर भी कई बार समझ नहीं पाते कि क्या हो रहा है? जैसे कुछ साल पहले एक कैम्पेन चला था- मी टू। इसमें तथाकथित सेलिब्रिटीज उनके साथ परिवारजनों द्वारा किए गए यौन-शोषण की घटना को सोशल मीडिया पर बता रही थी। सोशल मीडिया पर ट्रेंड चल निकला था- मी टू। अगर किसी के साथ गलत हुआ है तो आप उसके खिलाफ लड़ेंगे, पुलिस-कोर्ट में जाएंगे या सोशल मीडिया पर।

ऐसी बहुत सी चीजें हैं, जो तथाकथित आधुनिकता की दौड़ में हमें पशुवत बनाती जा रही हैं। परिवार और समाज को इस पर गंभीरता से मनन करना होगा कि कैसे रिश्तों और परिवार-समाज के मूल्यों को बनाए रखा जाए। -अनुपम राजीव राजवैद्य anupam.rajiv@in.patrika.com