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संस्थागत संकल्प से ही मिलेगा देश में अंगदान को बढ़ावा

जीव-दया तथा दान जिस देश की संस्कृति का अभिन्न अंग हो, तथा जहां राक्षसों के संहार के लिए महर्षि दधीचि ने अपनी हड्डियों का दान किया हो, वहां लोगों को अंगदान के लिए प्रेरित करना क्या इतना कठिन होना चाहिए?

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जयपुर

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Neeru Yadav

Feb 05, 2026

आर.के. विजय

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), नई दिल्ली के शोधकर्ताओं के नेतृत्व में सितंबर, 2025 में प्रकाशित एक अध्ययन में भारत में अंगदान की स्थिति पर कई महत्वपूर्ण खुलासे किए गए हैं। इस सर्वे में ब्रेन-डेड मरीजों की देखभाल में लगे चिकित्सक, न्यूरोसर्जन्स, एनेस्थिशिया विशेषज्ञ तथा क्रिटिकल केयर विशेषज्ञ शामिल थे। ब्रेन-डेथ व्यक्ति के मस्तिष्क का स्थायी रूप से काम बंद कर देने की वह स्थिति है, जिसे चिकित्सकीय और कानूनी रूप से मृत्यु माना जाता है। सर्वे में 62 फीसदी सहभागियों का मानना था कि जन जागरूकता का अभाव तथा परिवार की असहमति अंगदान में सबसे बड़े अवरोधक हैं। जीव-दया तथा दान जिस देश की संस्कृति का अभिन्न अंग हो, तथा जहां राक्षसों के संहार के लिए महर्षि दधीचि ने अपनी हड्डियों का दान किया हो, वहां लोगों को अंगदान के लिए प्रेरित करना क्या इतना कठिन होना चाहिए? अंगदान महादान है क्योंकि इससे अन्य लोगों को जीवन दान मिलता है। एक ब्रेन-डेड दानदाता दुनिया से रुखसत होते समय भी लिवर, किडनियों, फेफड़ों, हृदय, पेंक्रियाज तथा आंतों के दान से लगभग आठ जरूरतमंदों का जीवन बचा सकता है। क्षणभर में राख में तब्दील होने के बजाय ये अंग किसी को जीवन का अमूल्य तोहफा दे सकते हैं।
भारत में आवश्यकता के मुकाबले नाम मात्र के अंगदान के चलते प्रतिवर्ष अनुमानित 5 लाख लोगों की मृत्यु हो जाती है। यहां प्रत्येक वर्ष लगभग 2 लाख ब्रेन-डेथ होती हैं, जबकि नेशनल ऑर्गन तथा टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइजेशन की वार्षिक रिपोर्ट-2024-25 के अनुसार वर्ष 2024 में ऐसे मात्र 1128 मामलों में अंगदान हुआ था। एक सवाल यह भी है कि क्या देश में अंगदान की ऐसी सुविधाएं तथा वातावरण हैं, जो प्रत्येक मामले में आसानी से अंगदान का मार्ग प्रशस्त करते हों? प्रत्येक इच्छुक व्यक्ति यदि अंगदान नहीं कर पाता है, तो यह अत्यंत गंभीर मुद्दा है। कुछ समय पूर्व जयपुर के एक मध्यम आकार के अस्पताल में ब्रेन स्ट्रोक पीडि़त मेरे बड़े भ्राता वेंटीलेटर सपोर्ट पर थे। उनके बचने की कोई संभावना नहीं बताने पर जब मैंने ड्यूटी डॉक्टर से पूछा कि क्या ये ब्रेन-डेथ की स्थिति है, तो जवाब मिला ‘शायद हां’ यानी ब्रेन-डेथ प्रमाणित करने की योग्यता या इच्छाशक्ति नहीं दिखी। उनके सभी संभावित अंगों के दान की पेशकश पर हमें बताया गया कि यहां यह सुविधा नहीं है, आप इन्हें एसएमएस (राज्य का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल) में ले जाएं तो कुछ हो सकता है। अस्पताल से यह व्यवस्था करने के निवेदन पर जवाब ना में मिला। विचारणीय है कि क्या एक मरणासन्न मरीज के परिजनों से भावुक परिस्थिति में ऐसी भाग-दौड़ की अपेक्षा की जानी चाहिए?
‘ब्रेन-डेथ सर्टिफिकेशन’ (बीडीसी) अंगदान की प्रक्रिया का एक मूलभूत चरण है। इसके बिना नैतिक तथा कानूनी तौर पर अंग रिट्रीव (निकाले) नहीं किए जा सकते हैं। उक्त सर्वे के 10 प्रतिभागियों में से 6 को उनकी एमबीबीएस शिक्षा के दौरान ‘ब्रेन-डेथ सर्टिफिकेशन’ का प्रशिक्षण नहीं मिला था। सर्वे में 43.5त्न सहभागियों ने अंग प्रत्यारोपण की सुविधाओं की कमी को कम अंगदान का कारण माना। इसी सर्वे में ब्रेन-डेड मरीजों में बीडीसी के प्रति चिकित्सकों का उदासीन रवैया (43.5 फीसदी ) तथा ब्रेन-डेथ प्रमाणित करने में आत्मविश्वास की कमी (36.7फीसदी ) पाई गई। जाहिर है चिकित्सकों में ऐसी प्रवृत्ति तथा प्रशिक्षण की कमी के चलते दानदाताओं की उपलब्धता के बावजूद कई मामलों में अंगदान संभव नहीं हो पाता है।
अंगदान को बढ़ावा देने के लिए चार महत्वपूर्ण स्तरों पर संस्थागत संकल्प की आवश्यकता है। सामाजिक संस्थाएं जन जागरूकता बढ़ाने का संकल्प लें तो सरकार अंग रिट्रीवल तथा प्रत्यारोपण सुविधाओं का विस्तार करने का। इसके अतिरिक्त चिकित्सा शिक्षा व्यवस्था तथा चिकित्सकीय बिरादरी के स्तर पर भी अंगदान के प्रति जुनून की हद तक कार्य जरूरी है। सभी मेडिकल छात्रों को एमबीबीएस के दौरान ही बीडीसी ट्रेनिंग अनिवार्य रूप से दी जानी चाहिए। संपूर्ण मेडिकल फ्रेटरनिटी को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ब्रेनडेथ का एक भी मामला बिना सर्टिफिकेशन के नहीं रहे तथा प्रत्येक ऐसे मामले में मृतक के परिजनों के साथ अंगदान की समझाइश के ईमानदार प्रयास हों। ऐसा होने पर निश्चित ही देश में अंगदान में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होगी तथा कई लोगों को जीवनदान मिल सकेगा।