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नीतीश के निशांत: सत्ता के सुखांत की नई सियासी पटकथा

नीतीश ने न सिर्फ ईबीसी का अपना नया जनाधार तैयार किया, बल्कि लालू-तेजस्वी के अल्पसंख्यक वोट बैंक में भी सेंध लगाई। परिणामस्वरूप लालू की राजनीति 'एम-वाई' समीकरण तक सिमट गई। बेशक उप मुख्यमंत्री बनकर निशांत कुमार भी भाजपा के साथ ही राजनीति करेंगे।

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जयपुर

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Opinion Desk

Mar 11, 2026

राज कुमार सिंह - वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक,

दो दशक से बिहार में सत्ता का पर्याय बने नीतीश कुमार राज्यसभा जा रहे हैं तो उनके पुत्र निशांत अपनी राजनीतिक पारी शुरू कर रहे हैं। पिछले साल बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम का स्पष्ट संदेश यह भी था कि दसवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले नीतीश कुमार इस बार कार्यकाल पूरा नहीं कर पाएंगे, लेकिन ऐसी नाटकीय विदाई की उम्मीद शायद ही किसी की हो। बिहार सरीखे राज्य का मन मुताबिक मुख्यमंत्री रहने के बाद राज्यसभा की राह से उनकी छवि निखरती तो हरगिज नहीं। इसी एक मार्च को 75 साल पूरे करने पर सक्रिय राजनीति से संन्यास की घोषणा नीतीश के राजनीतिक कद के ज्यादा अनुरूप होती। तब वह एक नैतिक उदाहरण पेश करते हुए अपनी लंबी सफल पारी को विराम देते, लेकिन उन्होंने राज्यसभा की राह चुनी। चुनावी राजनीति में संतुलन की चाबी के बल पर राजग या महागठबंधन को नचाते रहे नीतीश कुमार से वह ट्रंप कार्ड इस बार मतदाताओं ने ही छीन लिया।

पिछली बार की 43 सीटों के मुकाबले इस बार 85 सीटें जीतने के बावजूद नीतीश ट्रंप कार्ड इसलिए गवां बैठे, क्योंकि राजद-कांग्रेस समेत महागठबंधन के खराब चुनावी प्रदर्शन ने वैकल्पिक समीकरण बिगाड़ दिया। जद यू से चार सीटें ही ज्यादा जीत कर भी लोजपा- हम- रालोमो जैसे अन्य मित्र दलों के साथ भाजपा बहुमत के इतना नजदीक पहुंच गई कि मामूली जुगाड़ से भी सरकार बना लेती। फिर भी नीतीश को मुख्यमंत्री बनाया, क्योंकि जद यू के जनाधार को भाजपा नाराज नहीं करना चाहती थी। पुत्र निशांत के राजनीतिक वारिस बनने की चर्चाएं भी पिछले साल से ही चल रही थीं, जब उन्होंने पहली बार मुख्यमंत्री आवास में जद यू नेताओं संग होली खेली थी। इसलिए न तो मुख्यमंत्री पद से 16 मार्च को संभावित नीतीश का इस्तीफा अप्रत्याशित है और न ही बिहार की राजनीति में एक और पुत्रोदय।

बिहार के जटिल जातीय चुनावी समीकरण को साधते हुए अपने पहले मुख्यमंत्री का चयन भाजपा के लिए आसान तो हरगिज नहीं होगा। भाजपा की राजनीति मुख्यत: अगड़ी जातियों के समर्थन पर टिकी रही है, जबकि मंडलीकरण के बाद से बिहार की राजनीति में ओबीसी का वर्चस्व रहा है, जिसके साथ अल्पसंख्यक वर्ग भी गोलबंद होता रहा है। अगड़ी जातियां अपेक्षा रखती हैं कि विपक्ष की राजनीति करते हुए भी दशकों से समर्थन का पुरस्कार उन्हें मिले, लेकिन ओबीसी को नकारात्मक संदेश देने का जोखिम भाजपा नहीं उठा सकती। अब तक ओबीसी के एक वर्ग को नीतीश कुमार भी साधे रहे। नीतीश ने न सिर्फ ईबीसी का अपना नया जनाधार तैयार किया, बल्कि लालू-तेजस्वी के अल्पसंख्यक वोट बैंक में भी सेंध लगाई। परिणामस्वरूप लालू की राजनीति 'एम-वाई' समीकरण तक सिमट गई। बेशक उप मुख्यमंत्री बनकर निशांत कुमार भी भाजपा के साथ ही राजनीति करेंगे, लेकिन जद यू के जनाधार को बचाए रखने की बड़ी चुनौती उनके सामने होगी।

पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में भी जद यू को 19 प्रतिशत वोट मिले थे। बहुकोणीय चुनावी राजनीति में यह बहुत बड़ा आंकड़ा है। इसी के बल पर नीतीश दो दशक तक बिहार पर राज करते रहे। जाहिर है, निशांत का राजनीतिक भविष्य इस बात पर ज्यादा निर्भर करेगा कि वह इस जनाधार को कितना साथ रख पाते हैं। अगर जद यू और भाजपा, नीतीश के इस परंपरागत वोट बैंक को नहीं साध पाए तो बिखराव की प्रक्रिया में उसका एक हिस्सा उस राजद के पास भी लौट सकता है, जिसके भविष्य पर पिछले विधानसभा चुनाव परिणाम सवालिया निशान लगाते नजर आ रहे हैं।

मुख्यमंत्री पद भाजपा में जिसे भी मिले, वह उसके लिए चुनौतियों का ताज साबित होने के ही आसार हैं। नए मुख्यमंत्री के लिए एक और बिहार की जटिल जातीय राजनीति को साधना होगा तो दूसरी ओर उसकी सरकार को नीतीश राज की कसौटी पर भी कसा जाएगा। अवसरवादी राजनीति के अलावा नीतीश अपनी कुछ टिप्पणियों के लिए भी विवादित रहे, लेकिन बिहार को विकास की पटरी पर लाने की कोशिश का श्रेय उनसे कोई नहीं छीन सकता। इसीलिए उन्हें 'सुशासन बाबू' भी कहा गया। हां, यह बहस का विषय हो सकता है कि अपने पहले दशक की दिशा और रफ्तार नीतीश दूसरे दशक में क्यों कायम नहीं रख पाए।