
प्रो. हेमंत पारीक - महासचिव, आइएसएलएस,
भारत में पिछले कुछ वर्षों में महिला उद्यमिता एक महत्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन के रूप में उभरकर सामने आई है। पहले जहां महिलाओं की भूमिका मुख्यत: परिवार और घरेलू जिम्मेदारियों तक सीमित मानी जाती थी, वहीं आज महिलाएं शिक्षा, प्रौद्योगिकी, व्यापार और स्टार्टअप के क्षेत्र में अपनी पहचान बना रही हैं। यह परिवर्तन केवल आर्थिक सशक्तीकरण का संकेत नहीं है, बल्कि सामाजिक सोच में आए सकारात्मक बदलाव का भी प्रतीक है।
आज की भारतीय महिला केवल नौकरी तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि वह अपने विचारों और नवाचारों को उद्यम के रूप में स्थापित करना चाहती है। छोटे-छोटे घरेलू व्यवसायों से लेकर बड़े स्टार्टअप तक महिलाएं हर स्तर पर अपनी क्षमता का प्रदर्शन कर रही हैं। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, डिजिटल भुगतान और ई-कॉमर्स ने महिलाओं को घर बैठे व्यापार शुरू करने का अवसर प्रदान किया है। इसके कारण ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में महिला उद्यमिता तेजी से बढ़ रही है। भारत सरकार ने भी महिला उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए अनेक योजनाएं शुरू की हैं। स्टार्टअप इंडिया, स्टैंड-अप इंडिया, मुद्रा योजना, महिला ई-हाट और राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन जैसी योजनाएं महिलाओं को वित्तीय सहायता, प्रशिक्षण और बाजार उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। इन योजनाओं के माध्यम से लाखों महिलाएं स्वयं सहायता समूहों के जरिये छोटे-छोटे उद्योग स्थापित कर रही हैं और अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत बना रही हैं। महिला उद्यमिता का प्रभाव केवल आर्थिक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका व्यापक सामाजिक प्रभाव भी दिखाई देता है। जब एक महिला उद्यमी बनती है, तो वह केवल अपने लिए रोजगार नहीं बनाती, बल्कि अन्य लोगों के लिए भी रोजगार के अवसर उत्पन्न करती है। इससे स्थानीय स्तर पर आर्थिक गतिविधियां बढ़ती हैं और समाज में आत्मनिर्भरता की भावना मजबूत होती है।
महिला उद्यमिता के सामने कुछ चुनौतियां भी हैं। सामाजिक रूढिय़ां, वित्तीय संसाधनों तक सीमित पहुंच, परिवार और व्यवसाय के बीच संतुलन तथा नेटवर्किंग के अवसरों की कमी जैसी समस्याएं कई महिलाओं के लिए बाधा बनती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा और डिजिटल जानकारी की कमी भी एक बड़ी चुनौती है। इसलिए आवश्यक है कि समाज, परिवार और संस्थाएं मिलकर महिलाओं को प्रोत्साहन दें और उन्हें संसाधन उपलब्ध कराएं। समय की मांग है कि महिला उद्यमिता को केवल आर्थिक गतिविधि के रूप में न देखें, बल्कि इसे सामाजिक परिवर्तन के शक्तिशाली माध्यम के रूप में समझें। स्कूल-कॉलेजों में उद्यमिता शिक्षा, कौशल विकास प्रशिक्षण डिजिटल साक्षरता कार्यक्रमों से लड़कियों को आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।
महिला उद्यमिता भारत के समावेशी विकास की कुंजी है। जब महिलाएं अपने सपनों को साकार करने के लिए आगे बढ़ती हैं, तो वे न केवल अपने परिवार, बल्कि पूरे समाज के विकास में योगदान देती हैं। इसलिए हमें ऐसी सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था का निर्माण करना चाहिए जहां हर महिला को अपने सपनों को उद्यम में बदलने का अवसर मिल सके। महिला उद्यमिता केवल व्यवसाय की कहानी नहीं है, बल्कि यह आत्मविश्वास, साहस और परिवर्तन की कहानी है- जहां आकांक्षा धीरे-धीरे एक सशक्त उद्यम का रूप ले लेती है। यही वह मार्ग है जो भारत को एक अधिक आत्मनिर्भर, समावेशी और समृद्ध राष्ट्र की ओर अग्रसर करता है।
Published on:
11 Mar 2026 01:54 pm
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