
-ले. जनरल (रिटा.) अरुण साहनी
हर वर्ष 15 जनवरी को पूरा देश अपने सैनिकों के साहस, समर्पण व राष्ट्रसेवा को नमन करता है। यह राष्ट्रीय गौरव का वह अवसर है, जब भारतीय सेना के जवानों के अदम्य साहस, निष्ठा और बलिदान को याद किया जाता है, लेकिन इस दिन का ऐतिहासिक महत्व केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि ठोस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से भी जुड़ा है। वर्ष 1949 में इसी दिन भारत के पहले सेनाध्यक्ष जनरल के.एम. करियप्पा ने अंतिम ब्रिटिश सेनापति जनरल सर फ्रांसिस रॉय बुचर से भारतीय सेना की पूरी कमान अपने हाथों में ली थी। इसी क्षण से भारतीय सेना पूर्ण रूप से भारत की संप्रभु सत्ता और राष्ट्रीय हितों की संरक्षक बनी। सेना दिवस पर परंपरागत रूप से वीरता और शौर्य के लिए सैनिकों को सम्मानित किया जाता है। आम जनता से संवाद और संपर्क बढ़ाने के लिए सेना देशभर में अनेक कार्यक्रम भी आयोजित करती है। इसी क्रम में कुछ वर्ष पहले यह निर्णय लिया गया कि सेना दिवस परेड हर वर्ष देश के किसी नए हिस्से में आयोजित की जाएगी, ताकि यह आयोजन केवल दिल्ली तक सीमित न रहे।
इस वर्ष भारतीय सेना अपना 78वां सेना दिवस मना रही है और यह परेड जयपुर में आयोजित हो रही है। यह उस वीर भूमि और राजपूत परंपरा को उपयुक्त सम्मान है, जिसने सदियों से साहस और शौर्य की मिसालें कायम की हैं। स्वतंत्रता के बाद से ही भारतीय सेना अपने ध्येय वाक्य 'स्वयं से पहले सेवा' पर खरी उतरी है। उसने लैटिन उक्ति 'नॉन सिबी सेड पात्रिए' अर्थात 'अपने लिए नहीं, बल्कि देश के लिए'- की भावना को व्यवहार में उतारा है। स्वातंत्र्योपरांत, समय के साथ बदलते आंतरिक और बाहरी खतरों तथा युद्ध के बदलते स्वरूप के अनुसार सेना ने स्वयं को लगातार ढाला है। 1965 का भारत-पाक युद्ध, बांग्लादेश का उद्भव कराने वाला 1971 का युद्ध, 1999 के कारगिल संघर्ष में भारतीय सेना का मुंहतोड़ जवाब और हालिया 'ऑपरेशन सिंदूर'- जैसे अलग-अलग समय पर उपस्थित हुए उदाहरण भारतीय सैनिक की इस दृढ़ता और संकल्प को दर्शाते हैं। इन संघर्षों ने यह भी स्पष्ट किया है कि भारतीय सेना केवल युद्धभूमि में ही नहीं, बल्कि रणनीतिक धैर्य, तकनीकी दक्षता व राजनीतिक संयम के साथ राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने में भी सक्षम है।
आधुनिक समय के ये संघर्ष अब केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहे, बल्कि तकनीक आधारित, बिना प्रत्यक्ष संपर्क वाले टकरावों में बदल गए हैं, जिनमें साइबर और अंतरिक्ष जैसे नए क्षेत्रों का सैन्यीकरण भी सामने आया है। प्रधानमंत्री के 'विकसित भारत-2047' के आह्वान के साथ देश जब आत्मनिर्भरता और आर्थिक प्रगति के पथ पर अग्रसर है, तब सेना भी अतिरिक्त सुरक्षा चुनौतियों और राष्ट्रीय दायित्वों के लिए स्वयं को तैयार कर रही है। देश को एक ओर आंतरिक सामाजिक, जातीय और धार्मिक तनावों से निपटना है, तो दूसरी ओर उत्तर और पश्चिमी सीमाओं पर चीन व पाकिस्तान से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना है। शत्रु देश हमारी आंतरिक कमजोरियों का प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों तरीकों से फायदा उठाने की फिराक में हैं। जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित छद्म युद्ध इसका स्पष्ट उदाहरण है, जबकि चीन पूर्वोत्तर भारत में उग्रवादी समूहों को गुप्त समर्थन देता रहा है। इसके साथ ही कट्टरवाद, उग्रवाद और अतिवाद जैसी चुनौतियां भी हैं, जिन्हें बाहरी और आंतरिक दोनों तत्व बढ़ावा देते हैं। ऐसे परिदृश्य में सेना को पारंपरिक युद्ध के साथ-साथ 'हाइब्रिड' खतरों से निपटने की क्षमता भी विकसित करनी होती है।
वैश्विक व्यवस्था इस समय अनिश्चितता और बदलाव के दौर से गुजर रही है। भू-राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं, जिससे दक्षिण एशिया और भारत के विस्तृत पड़ोस में नई चुनौतियां उभर रही हैं। तकनीकी क्रांतियां, जलवायु परिवर्तन, वैश्विक तापवृद्धि और मानव प्रवासन जैसे मुद्दे भविष्य में सेना के लिए नई जिम्मेदारियां लेकर आएंगे। ऐसे में संगठन ही नहीं, बल्कि भविष्य के सैनिक को भी निरंतर सीखने और स्वयं को उन्नत करने की क्षमता विकसित करनी होगी। अंत में, मैं भारतीय सैन्य अकादमी के प्रसिद्ध 'चैटवुड संकल्प' को याद करना चाहूंगा- 'सबसे पहले और हर समय देश की सुरक्षा, सम्मान और कल्याण। उसके बाद आपके अधीन सैनिकों का सम्मान, कल्याण और सुविधा और अंत में, हमेशा और हर समय, आपकी अपनी सुविधा और सुरक्षा।' मेरे विचार में यही उस भारतीय सेना की आत्मा है, जो जैतूनी वर्दी पहनकर राष्ट्र की सेवा में सदैव तत्पर रहती है। जय हिंद।
Published on:
15 Jan 2026 03:18 pm
बड़ी खबरें
View Allओपिनियन
ट्रेंडिंग
