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भीड़ जुटाकर उपदेश बरसाना लोकतंत्र नहीं

काम के मुकाबले शब्दजाल से लोगों को रिझाने की उम्र छोटी होती है। शासक काम करे और शासकीय दल उसके किए गए कामों की जानकारी जन-जन तक पहुंचाए, यही श्रेष्ठ कार्य है।

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सरकारी इमारतों और नई-नई योजनाओं के उद्घाटन व शिलान्यास कार्यक्रमों में सरकारी धन व लवाजमे का खूब इस्तेमाल होता है। नेताओंं को भी यह भरोसा रहता है कि सभाओं में जितनी ज्यादा भीड़ जुटेगी उतना ही उन्हें जनसमर्थन हासिल होगा। श्रद्धेय कुलिश जी ने तीन दशक पहले एक आलेख में इस सोच को गलत बताते हुए लिखा कि भीड़ तंत्र को लोकतंत्र कदापि नहीं कहा जा सकता। जनप्रतिनिधि की पहली जिम्मेदारी मतदाताओं का विश्वास बनाए रखना है। आलेख के प्रमुख अंश:

मंत्रियों का बहुत ज्यादा समय दौरों और आम सभाओं में खर्च होता है। ये दौरे जनसम्पर्क के नाम पर किए जाते हैं। सरकारी लवाजमे और धनराशि के बल पर कार्यक्रम चलाए जाते हैं। नए-नए भवनों और योजनाओं का उद्घाटन, शिलान्यास इन कार्यक्रमों का रूप होता है। इन पर सरकारी धन खर्च करने का बहाना मिल जाता है। खर्च के अलावा प्रत्येक मंत्री के दौरे पर जितना लवाजमा और सरकारी मजमा जुड़ता है, वह धन के अपव्यय और कामकाज के लिए क्षतिकारक होता है। पं. जवाहरलाल नेहरू के जमाने से ही यह धारणा बनी हुई है कि बड़ी-बड़ी सभाओं में भाषण करने से जनसम्पर्क और समर्थन बढ़ता है। यह मानना सरासर गलत है। भीड़ तंत्र को लोकतंत्र कदापि नहीं कहा जा सकता। राजपुरुषों के नाम पर भीड़ जुटा-जुटाकर उपदेश बरसाना राजतंत्र भले ही हो, लोकतंत्र नहीं है। शासन करने का श्रेष्ठ उपाय है, लोकहितकारी काम करना। लोकहितकारी शासक लोक को नहीं भूल सकता। काम के मुकाबले शब्दजाल से लोगों को रिझाने की उम्र छोटी होती है। शासक काम करे और शासकीय दल उसके किए गए कामों की जानकारी जन-जन तक पहुंचाए, यही श्रेष्ठ कार्य है। जनसम्पर्क जैसे राजनीतिक एवं लोकप्रिय कर्म राजनीतिक दल करें। शासक जब अपना समय जनसम्पर्क एवं राजनीतिक कार्यों में खर्च करते हैं, उनके शासन की उम्र कम हो जाती हैं। मेरे कहने का यह अर्थ कदापि नहीं है कि मंत्री अपने मतदाताओं से सम्पर्क न रखे। इसके विपरीत मैं तो यह भी कहना चाहता हूं कि निर्वाचकों से सम्पर्क रखना जरूरी है। जनप्रतिनिधि की पहली जिम्मेदारी मतदाताओं का विश्वास बनाए रखने की है। उसका तरीका दूसरा होता है। अपने इलाके के मसलों पर समय- समय पर सामूहिक रूप से विचार-विमर्श करना, दल के कार्यकर्ताओं के जरिए उनके सुख-दु:ख की जानकारी रखना, शादी-गमी के मौकों पर आना-जाना, पत्र-व्यवहार करना और दौरे का नियत कार्यक्रम बनाए रखना। किन्तु भीड़ भरी सभाओं में ज्यादातर सरकारी अफसर, मंत्री की आंखों में आकर अपना उल्लू सीधा करने में लगे रहते हैं।

भागदौड़ करते फिरना शासक का काम नहीं

शासक के काम का तरीका है, शासन करना। शासक का श्रेष्ठ रूप है केन्द्रस्थ होना। शासक केन्द्र होता है। केन्द्रस्थ होकर ही श्रेष्ठ शासन किया जा सकता है। भागदौड़ करते फिरना शासक का काम नहीं हैं। शासक यदि केन्द्रस्थ होकर अच्छे काम करता है तो उससे जनता बेहद खुश होती है। ध्यान रखने की बात यह है कि अच्छे कामों के पीछे खोट न हो। यदि मंत्री उद्घाटन शिलान्यास जैसे काम अपनी विषय सूची में न रखकर निर्माण कार्य समय पर पूरा करने का भी संकल्प कर लें तो वह जनसम्पर्क से भी ज्यादा कारगर होगा। जनसम्पर्क का पूरा जिम्मा अपने दल पर छोड़कर मंत्री यदि सरकारी काम भी पूरी निष्ठा, मर्यादा और कल्याण भावना से करे तो वह अवश्य आम जनता का आशीर्वाद प्राप्त करेगा। करने को इतना है कि उस पर ध्यान दे और काम को सुचारु रीति से करे तो वह अवश्य ही यश का भागी होगा।

वक्त गुजार

राजा भी भाग्या फिरै,
परजा राजा लार।
हार्या-थाक्या कर रह्या,
दोन्यूँ वक्त गुजार।।

('सात सैकड़ा' से)

कुर्सी बचाने के लिए छल-प्रपंच दुराचार

रा जनीति का अर्थ देखें तो यह बहुत श्रेष्ठ किस्म की नीति है। राज्य व्यवस्था को बनाए रखना, समाज को बुराइयों से बचाना, अच्छाइयों का विकास करना ही राजनीति है। लेकिन वर्तमान परिवेश में राजनीति को देखें तो हर प्रकार का छल-प्रपंच ही राजनीति रह गई है। ऐसा नहीं है कि राजनीति में छल-प्रपंच का कोई स्थान ही नहीं है। व्यवस्था निर्माण के लिए व देशहित के लिए कभी-कभी छल का प्रयोग करना पड़ जाता है। हमारे यहां साम..दाम..दण्ड ..भेद का विधान रखा गया था लेकिन कुर्सी बचाने के लिए किया गया छल-प्रपंच लोकतंत्र में दुराचार है।