
हाईकोर्ट की एकल पीठ ने दंदरौआ धाम को दी 56 हेक्टेयर भूमि के पट्टे को लेकर 341 दिन देर से दायर अपील की देर को माफ कर दिया। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यह मामला दर्शाता है कि जब न्यायालय गंभीर रुख अपनाता है, तब राज्य शासन भले ही अनिच्छा से सही, लेकिन अपने घर को सुधारने के लिए कदम उठाता है। कोर्ट ने कहा कि राज्य शासन खुद अपने अधिकारियों की गलतियों का शिकार बन जाता है। कई बार राज्य शासन को अपने ही अधिकारियों की करतूतों का खामियाजा भुगतना पड़ता है। माना कि देरी भले ही अत्यधिक हो, लेकिन चूंकि सरकारी संपत्ति अत्यंत मूल्यवान है। दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई की गई है। इसलिए कोर्ट संतुष्ट है। 2 लाख रुपए के जुर्माने के साथ देरी माफ कर दी और राशि रेड क्रॉस सोसायटी में जमा करनी होगी। शासन चाहे तो राशि अधिकारियों से वसूल कर सकते हैं। भिंड कलेक्टर को दी चेतावनी,सेवा पुस्तिका में दर्ज करने का आदेश दिया।
अभिलेखों में तत्कालीन तहसीलदार ने फर्जी एंट्री की
शासन ने कोर्ट को बताया गया कि जिस तत्कालीन तहसीलदार ने राजस्व अभिलेखों में कथित रूप से फर्जी प्रविष्टि कर 55.43 हेक्टेयर बहुमूल्य सरकारी जमीन का नाम ट्रस्ट के पक्ष में दर्ज किया, उसे निलंबित कर दिया गया है और उसके खिलाफ विभागीय जांच शुरू कर चार्जशीट जारी की जा चुकी है। यह कार्रवाई कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद की गई।
-इतना ही नहीं, वर्तमान कलेक्टर भिंड केएल मीणा के आचरण पर भी मुख्य सचिव ने नाराजगी जताई है। कोर्ट के समक्ष यह तथ्य रखा गया कि कलेक्टर द्वारा न्यायालय को गुमराह करने के प्रयास पर उन्हें प्रशासनिक चेतावनी दी गई है, जिसे उनकी सेवा पुस्तिका में दर्ज किया गया है। साथ ही हाईकोर्ट द्वारा 19 जनवरी 2026 को पारित आदेश की प्रति भी उनकी सेवा पुस्तिका में संलग्न की गई है, ताकि भविष्य में एसीआर लिखते समय इसे नजरअंदाज न किया जा सके।
मामला क्या है
आदेश के अनुसार वर्ष 2007 में तहसीलदार भिंड द्वारा दंदरौआ सरकार पब्लिक ट्रस्ट को 46 खसरा नंबरों की कुल 55.43 हेक्टेयर सरकारी भूमि पौधरोपण (प्लांटेशन) के उद्देश्य से पट्टे पर दी गई थी। इस आवंटन के खिलाफ अपील हुई, जिसके बाद कलेक्टर भिंड ने 25 अप्रैल 2011 को लीज निरस्त कर दी। आयुक्त चंबल संभाग ने भी कलेक्टर के फैसले को बरकरार रखा, लेकिन 15 जनवरी 2015 को राजस्व मंडल ने कलेक्टर और आयुक्त के आदेश पलटते हुए ट्रस्ट के पक्ष में फैसला दे दिया। राजस्व मंडल के आदेश के खिलाफ शासन ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। जिम्मेदारों पर क्या कार्रवाई की। इसकी जानकारी मांगी, लेकिन प्रशासन ने कार्रवाई नहीं की तो याचिका खारिज हो गई। याचिका को फिर से सुनवार्ई में लाने के लिए आवेदन लगाया। भिंड कलेक्टर केएल मीणा ने गलत जानकारी दी।
कोर्ट ने अंत में यह भी स्पष्ट किया कि सरकारी जमीन जनहित से जुड़ी संपत्ति है और अधिकारियों की लापरवाही या फर्जी प्रविष्टियों के कारण राज्य को उसकी कीमत नहीं चुकानी चाहिए। इसी आधार पर यह आदेश पारित करते हुए प्रकरण का निराकरण कर दिया गया।
Published on:
24 Jan 2026 11:21 am

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