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सागर-कबरई फोरलेन में मुआवजे का रोडा: 203 करोड़ में से 45 करोड़ का भुगतान अटका, 20 प्रतिशत किसानों ने कई जगह रोका काम

45 करोड़ रुपए के भुगतान के इंतजार में बैठे 20 फीसदी किसानों ने प्रोजेक्ट के फेज-3 और फेज-4 का काम कई जगहों पर पूरी तरह रुकवा दिया है।

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सागर-कबरई फोरलेन

ग्रामीणों का आरोप ठेका कंपनी ने बिना एनओसी सरकारी जमीन पर खड़ा कर दिया प्लांट, तालाब के पास भी खुदाई

बुंदेलखंड की लाइफलाइन माने जाने वाले सागर-कबरई फोरलेन प्रोजेक्ट पर मुआवजे का ग्रहण लग गया है। जिले के किसानों का सब्र अब जवाब दे रहा है। कुल 203 करोड़ रुपए के मुआवजे में से प्रशासन अब तक केवल 158 करोड़ ही बांट सका है। नतीजा यह है कि लगभग 45 करोड़ रुपए के भुगतान के इंतजार में बैठे 20 फीसदी किसानों ने प्रोजेक्ट के फेज-3 और फेज-4 का काम कई जगहों पर पूरी तरह रुकवा दिया है।

तहसीलवार आंकड़ों ने खोली पोल: छतरपुर और नौगांव में सबसे बुरा हाल

एनएचएआई और राजस्व विभाग की सुस्ती का आलम यह है कि करोड़ों के बजट के बावजूद धरातल पर भुगतान की रफ्तार कछुआ चाल से भी धीमी है।

फेज-3 (साठिया घाटी से चौका)- यहां बिजावर में 88 प्रतिशत और बड़ामलहरा में 81 प्रतिशत वितरण हुआ है, लेकिन छतरपुर तहसील में आंकड़ा महज 68 प्रतिशत पर अटका है।

फेज-4 (चौका से कैमाहा)- यहां नौगांव तहसील के किसानों की स्थिति सबसे दयनीय है, जहंा केवल 67 प्रतिशत भुगतान ही हो पाया है।

ग्राउंड जीरो का हाल- जमीन ले ली, अब दफ्तरों के चक्कर लगवा रहे

निवारी और ढड़ारी जैसी पंचायतों में किसान आक्रोशित हैं। निवारी निवासी रामकृपाल रैकवार की कहानी व्यवस्था की पोल खोलती है। उनकी 3 एकड़ जमीन का 26 लाख मुआवजा तय हुआ, लेकिन खाते में सिर्फ 12 लाख आए। रामकृपाल का कहना है, अधिकारी दस्तावेज देखते हैं और चले जाते हैं, शेष 14 लाख कब आएंगे कोई नहीं बताता। हमने काम रुकवा दिया है, जब तक पूरा पैसा नहीं, तब तक मशीनें नहीं चलेंगी। वहीं, वृंदावन कुशवाहा जैसे कई किसानों का आरोप है कि निर्माण कंपनी एमसी इंफ्रास्ट्रक्चर के कारिंदे मुआवजे की बात करने पर धमकियां देते हैं। कई जगहों पर तो बिना भुगतान किए ही सडक का निर्माण लगभग पूरा कर लिया गया है, जिससे किसानों के पास विरोध का रास्ता भी सीमित होता जा रहा है।

कंपनी की मनमानी- पर्यावरण और नियमों की धज्जियां उड़ीं

ग्रामीणों ने केवल मुआवजे ही नहीं, बल्कि कंपनी की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं।

अवैध खुदाई- कछियापुरवा और मोरवा में बिना अनुमति तालाबों के पास से मिट्टी निकाली गई।

अवैध प्लांट- मोरवा पंचायत में बिना एनओसी के 3.30 एकड़ सरकारी भूमि पर कंपनी ने अपना प्लांट खड़ा कर लिया है।

जल संकट- निवारी में निर्माण के दौरान गांव का मुख्य ट्यूबवेल क्षतिग्रस्त कर दिया गया, जिससे ग्रामीण बूंद-बूंद पानी को तरस रहे हैं।

समय सीमा- अगर मुआवजे का यह विवाद जल्द नहीं सुलझा, तो 1400 करोड़ रुपए की लागत वाला यह प्रोजेक्ट अपने निर्धारित समय (दिसंबर 2026) तक पूरा नहीं हो पाएगा। निर्माण रुकने से न केवल लागत बढ़ेगी, बल्कि बुंदेलखंड के विकास की रफ्तार भी धीमी होगी।

प्रशासन का रटा-रटाया जवाब

इस पूरे विवाद पर एनएचएआई के पीडी देवेंद्र चापेकर का कहना है कि राशि एसडीएम कार्यालयों को भेज दी गई है। किसानों के बैंक खातों की जानकारी अधूरी होने के कारण आरटीजीएस में देरी हो रही है।