
सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)
Court Order जमानत मिलने के बावजूद किसी आरोपी को हिरासत में बनाए रखने के लिए एक के बाद एक नई एफआईआर दर्ज करना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है। ऐसे मामलों में संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सीधे हस्तक्षेप किया जा सकता है। यह अहम टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने की है। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की खंडपीठ ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का प्रथम दृष्टया उल्लंघन होता है, तो यह कहना उचित नहीं कि केवल जमानत का वैकल्पिक उपाय उपलब्ध होने के कारण अनुच्छेद 32 के तहत याचिका सुनवाई योग्य नहीं है।
मामले की शुरुआत 20 मई 2025 को रांची एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) द्वारा आईपीसी और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत दर्ज एक एफआईआर से हुई थी। इसी जांच के दौरान हजारीबाग एसीबी ने वर्ष 2010 में कथित वन भूमि म्यूटेशन से जुड़े एक प्रकरण में नई एफआईआर दर्ज कर दी, यानी घटना के करीब 15 साल बाद। इसके बाद 2025 में दो और एफआईआर दर्ज की गईं। याचिकाकर्ता की ओर से आरोप लगाया गया कि यह पूरी कार्रवाई जमानत आदेशों को निष्प्रभावी करने और आरोपी को लगातार जेल में बनाए रखने की सुनियोजित कोशिश है।
सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि चूंकि जमानत का वैकल्पिक उपाय मौजूद है, इसलिए अनुच्छेद 32 के तहत याचिका पर सुनवाई नहीं होनी चाहिए। हालांकि, कोर्ट ने यह तर्क खारिज कर दिया। अदालत ने संविधान निर्माता डॉ. बी.आर. आंबेडकर के उस कथन का उल्लेख किया, जिसमें उन्होंने अनुच्छेद 32 को संविधान का “हृदय और आत्मा” बताया था।
कोर्ट ने रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा कि 17 दिसंबर 2025 को जमानत मिलने के बाद 19 और 20 दिसंबर को अलग-अलग एफआईआर में पुनः पुलिस रिमांड लिया गया। इससे स्पष्ट होता है कि अभियोजन पक्ष का उद्देश्य आरोपी को किसी भी हालत में हिरासत में बनाए रखना था।
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए आरोपी को जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया। साथ ही यह भी कहा कि वह ट्रायल कोर्ट द्वारा तय सभी शर्तों का पालन करेगा, प्रत्येक सुनवाई में उपस्थित रहेगा और जांच में पूरा सहयोग करेगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि जमानत के बाद लगातार एफआईआर दर्ज कर हिरासत बढ़ाना संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है और ऐसे मामलों में शीर्ष अदालत हस्तक्षेप करने से पीछे नहीं हटेगी।
Published on:
13 Feb 2026 10:23 pm
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