
सीएम ममता बनर्जी। (Photo-IANS)
पश्चिम बंगाल में इसी साल विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इससे पहले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सरकार को बड़ा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार के खिलाफ फैसला सुनाया है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक, पश्चिम बंगाल सरकार को राज्य सरकार के कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को 2008 से 2019 के बीच की अवधि का महंगाई भत्ता (डीए) बकाया देना होगा।
कोर्ट ने आगे कहा- इस साल 31 मार्च तक उस रकम का 25 प्रतिशत भी देना होगा। इससे राज्य के खजाने पर तुरंत 10,000 करोड़ रुपये से थोड़ा ज्यादा और लंबे समय में 42,000 करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा।
राज्य वित्त विभाग के एक अधिकारी ने शुक्रवार को कहा- ये आंकड़े अस्थायी हैं। इस मद पर होने वाले असल खर्च का पता लगाने के लिए एक प्रक्रिया शुरू की गई है और अंतिम आंकड़ा उस प्रक्रिया के पूरा होने के बाद ही सामने आएगा।
वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए अंतरिम (वोट-ऑन-अकाउंट) बजट प्रस्ताव पेश करते समय पश्चिम बंगाल में सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए महंगाई भत्ते में चार प्रतिशत की बढ़ोतरी की घोषणा की गई थी। हालांकि, बढ़ोतरी के बाद भी राज्य सरकार और केंद्र सरकार के कर्मचारियों के बीच डीए का अंतर 36 प्रतिशत बना हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को राज्य सरकार के कर्मचारियों की इस दलील को भी सही ठहराया कि केंद्रीय कर्मचारियों के बराबर डीए पाना उनका अधिकार है, जबकि राज्य सरकार ने तर्क दिया था, यह 'दया का तोहफा' है।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के पीछे मुख्य कारण राज्य सरकार के कर्मचारियों के लिए DA की गणना के लिए सरकार की ओर से दिए गए आर्थिक रूप से गलत तर्क थे, जिसमें डेटा-आधारित चर्चा की भी कमी थी।
उन्होंने कहा- पहली कमी यह रही कि पश्चिम बंगाल सरकार अपने राज्य के कर्मचारियों के महंगाई भत्ते (DA) की गणना और तय करने के लिए अखिल भारतीय उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (AICPI) को आधार के रूप में स्वीकार नहीं कर रही थी।
गौरतलब है कि AICPI राज्य सरकार के कर्मचारियों के लिए DA की गणना और निर्धारण के लिए राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत बेंचमार्क और फॉर्मूला है।
अब, जबकि राज्य सरकार DA कैलकुलेशन के लिए ACPI को बेंचमार्क के तौर पर न मानने की अपनी बात पर अड़ी हुई थी, वह इसके लिए कोई वैकल्पिक बेंचमार्क या फॉर्मूला पेश करने में भी नाकाम रही।
इस पर सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि पश्चिम बंगाल ने 2009 के नियमों में DA को AICPI से जोड़ दिया था। अब सरकार बाद में जारी किए गए किसी भी सरकारी आदेश या मेमो से इस गणना के तरीके को बदल नहीं सकती।
अर्थशास्त्रियों के अनुसार, दूसरी कमी आर्थिक और कानूनी दोनों तरह से तार्किक सिद्धांत के खिलाफ थी। यह कमी एक ही राज्य सरकार के कर्मचारियों की दो कैटेगरी के लिए दो अलग-अलग DA दरों के अस्तित्व को लेकर थी।
पहली कैटेगरी में वे पश्चिम बंगाल सरकार के कर्मचारी शामिल थे जो राज्य सरकार की ओर से दूसरे राज्यों में तैनात थे। इस कैटेगरी को केंद्र सरकार में अपने समकक्षों के बराबर DA मिलता है।
दूसरी कैटेगरी में वे पश्चिम बंगाल सरकार के कर्मचारी हैं जो सिर्फ अपने गृह राज्य में तैनात हैं और उन्हें केंद्र सरकार व कई अन्य राज्य सरकारों के बराबर महंगाई भत्ता नहीं दिया जाता है।
अर्थशास्त्रियों और कानूनी विशेषज्ञों दोनों का मानना है कि राज्य सरकार के कर्मचारियों के दो समूहों के लिए महंगाई भत्ते की ये अलग-अलग दरें काफी असामान्य हैं और राज्य सरकार के लिए सुप्रीम कोर्ट में तर्कसंगत रूप से अपनी बात रखने में एक बड़ी बाधा हैं।
Published on:
06 Feb 2026 03:15 pm
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