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कोर्ट में दीपक, चादर…जैसे मसलों पर तेजी से निर्णय, गलत फैसले से कातिल बने शख्स को छूटने में लगे 38 साल

दरगाह के पास चोटी पर हिंदुओं को दीपक जलाने की इजाजत होगी- एक महीने में कोर्ट ने अपील पर दे दिया फैसला। सुप्रीम कोर्ट ने कहा- सुनवाई में देरी आरोपी के संवैधानिक गारंटी का हनन, फिर भी बिना ट्रायल जेलों में सड़ रहे कैदी। अदालतों में 5 करोड़ से ज्यादा मुकदमों का अंबार।

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Undertrials in Indian Jails

ये आंकड़े लोगों के संवैधानिक अधिकार के हनन की तस्वीर भी बयान करते हैं।

जनवरी के पहले हफ्ते में लगातार दो दिन अदालतों से ऐसी खबरें आईं, जो काफी कुछ सोचने पर मजबूर करती हैं। एक खबर प्रधानमंत्री को अजमेर शरीफ में चादर चढ़ाने से रोकने की मांग करने वाली याचिका खारिज होने की है। दूसरी, हिंदुओं को एक दरगाह के पास पहाड़ी की चोटी पर प्राचीन स्तम्भ पर दीपक जलाने की इजाजत देने से संबंधित है।

इसी बीच, मनी लाउंड्रिंग के केस में एक आरोपी को जमानत देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आरोपियों को इसकी गारंटी मिली हुई है कि मुकदमे की सुनवाई में अनावश्यक देरी ना हो। अपराध की गंभीरता किस हद की है, उसका इससे कोई लेना-देना नहीं है। सुनवाई शुरू हुए बिना या इसमें अनावश्यक देरी के बीच आरोपी को जेल में रखना एक तरह की सजा है।

सच यह है कि देश में हर 4 में से 3 कैदी ऐसे हैं, जिनके मुकदमे की सुनवाई या तो शुरू नहीं हुई है या चल रही है। मतलब, ये दोषी करार दिए बिना जेलों में कैद हैं। इनकी संख्या 3.8 लाख से 4.5 लाख के बीच है। इनमें से 25-30 फीसदी ऐसे हैं, जिनके मामले में आरोप तक तय नहीं हुए हैं। मतलब उनके मुकदमे की सुनवाई शुरू होना बाकी है और ये जेल में हैं।

• 1 से 3 साल: लगभग 25% विचाराधीन कैदी 1 से 3 साल से जेल में हैं।
• 3 से 5 साल: लगभग 5-8% कैदी 3 से 5 साल से बिना सजा के बंद हैं।
• 5 साल से अधिक: 2-3% कैदी ऐसे हैं जो 5 साल से अधिक समय से जेल में हैं और उनके मुकदमे का फैसला नहीं हुआ है।

इस स्थिति की क्या है वजह?

मुकदमे की सुनवाई शुरू और खत्म होने में देरी के कई कारण हैं। वकीलों की कमी, जजों की कमी, अदालतों की कम संख्या, पुलिस में जांच अधिकारियों सहित अन्य बुनियादी सुविधाओं की कमी आदि। लेकिन एक बड़ा कारण है कोर्ट में ज्यादा मामलों का दर्ज होना। इनमें से कई मामले ऐसे भी होते हैं जो कम महत्व के होते हैं। इनकी वजह से अदालतों में लंबित मामलों की संख्या बढ़ती जाती है।

5.1 करोड़ से भी ज्यादा केस लंबित

नेशनल ज्यूडिशियल डाटा ग्रिड के आंकड़ों के मुताबिक दिसंबर 2025 तक देश की अदलतों में 5.1 करोड़ से भी ज्यादा केस लंबित थे। इनमें से 4.69 करोड़ जिला अदालतों में हैं। सुप्रीम कोर्ट में भी अगस्त 2025 में लंबित मामलों की संख्या 88000 से अधिक थी। नतीजा होता है कि अनेक मामलों की सुनवाई शुरू होने में ही वर्षों लग जाते हैं। इस बीच आरोपी जेल में बंद होता है।

ऐसे-ऐसे मामले पहुंचते हैं अदालत!

दीपक जलाएं या नहीं: तमिलनाडु में एक दरगाह के पास स्थित तिरुपरनकुंदरम पहाड़ी की चोटी पर प्राचीन पत्थर के स्तंभ पर दीपक जलाने की मनाही नहीं होगी। यह फैसला मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै पीठ ने दिया है। फैसला कोई नया नहीं है। एक जज की पीठ ने पहले ही यह फैसला दिया था। इसके खिलाफ अपील हुई तो छह जनवरी को दो जजों की पीठ ने भी फैसले को बरकरार रखा।

हिंदू समुदाय स्तंभ पर दीपक जलाना चाहता है। इस स्तंभ तक पहुंचने के लिए हजरत सुल्तान सिकंदर दरगाह के पास स्थित सीढ़ियों से जाना होता है। इसी वजह से इस मामले पर विवाद था और स्थानीय प्रशासन ने कानून-व्यवस्था की समस्या खड़ी होने की दलील दी थी।

कोर्ट ने कहा- यह बड़ा अजीब और अविश्वसनीय लगता है कि शक्तिमान सरकार को मंदिर के प्रतिनिधियों को साल में एक दिन स्तंभ पर दीपक जलाने की अनुमति देने से अशांति पैदा होने का डर सता रहा है। प्रशासन को इसे दो समुदायों के बीच दूरी कम करने के अवसर के रूप में देखना चाहिए था।

एकल जज का फैसला 1 दिसंबर को आया था। इसके खिलाफ अपील पर डिवीजन बेंच ने 18 दिसंबर को ही फैसला तय कर लिया था। उस दिन सुरक्षित रखा गया फैसला छह जनवरी को सुनाया गया।

पीएम अजमेर शरीफ की दरगाह पर चादर चढ़ाएं या नहीं: दीपक जलाने पर मद्रास हाईकोर्ट के आए फैसले से एक दिन पहले (5 जनवरी) सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की ओर से अजमेर शरीफ दरगाह पर चादर चढ़ाए जाने की परंपरा के खिलाफ दायर की गई एक याचिका को खारिज किया। याचिका में प्रधानमंत्री को ऐसा नहीं करने का आदेश देने की भी मांग की गई थी। कोर्ट ने यह मांग भी नहीं मानी। याचिकाकर्ता ने 22 दिसंबर को इस पर तत्काल सुनवाई की मांग की थी। कोर्ट ने यह मांग नहीं मानी थी।

कोर्ट में व्यापक जनहित से इतर मामले आने और अपेक्षाकृत त्वरित गति से निपटाए जाने के ये दो ताजा मामले हैं। और पीछे जाने पर कई उदाहरण मिलेंगे। उन पर जाने के बजाय इन मामलों पर नजर डालते हैं।

न्यायपालिका को 38 साल लग गए अपनी गलती सुधारने में

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में कत्ल के तीन दोषियों को बरी किया। यह कहते हुए कि हत्या किसी और ने की थी। लेकिन हाईकोर्ट का फैसला आने से पहले ये कत्ल के आरोप और दोष में 38 साल जेल में रह चुके थे।

छत्तीसगढ़ के एक शख्स को सौ रुपये की रिश्वत लेने के दोष में सालों जेल में रखा गया। 1986 में घूस लेने के आरोप में उन्हें 2004 में दोषी ठहराया गया और 2025 में बरी किया गया। तब तक उनकी उम्र 86 साल हो चुकी थी।

इन अहम मुद्दों पर है फैसलों का इंतजार

  1. पूजा स्थल अधिनियम, 1991 (Places of Worship Act): यह कानून 15 अगस्त 1947 के समय के धार्मिक स्थलों के स्वरूप को बदलने पर रोक लगाता है। इसकी संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। इस पर आने वाला फैसला मथुरा (शाही ईदगाह) और काशी (ज्ञानवापी) जैसे कई बड़े विवादों का भविष्य तय करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 2024 में इस अधिनियम के तहत नए मुकदमों पर रोक लगा दी थी और अभी इसकी सुनवाई जारी है।
  2. वैवाहिक बलात्कार (Marital Rape): सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच को तय करना है कि क्या पति द्वारा बिना सहमति के यौन संबंध बनाना बलात्कार (Rape) माना जाना चाहिए? वर्तमान कानून (BNS/IPC) में पति को इसमें छूट मिली हुई है।
  3. नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) की वैधता: क्या धर्म के आधार पर नागरिकता देना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है? कोर्ट को इसका जवाब देना है। इस जवाब से ही तय होगा कि सरकार द्वारा लागू किए जा चुके सीएए की संवैधानिक वैधता पर कोर्ट की ओर से अंतिम मुहर लगेगी या नहीं।