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सिंगूर में मोदी: सेक्रेटरी को आए एक फोन और ममता की ‘बेइज्जती’ से बदली थी सिंगूर के संग्राम की दिशा

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में एक बार फिर सिंगूर मुद्दा बनने जा रहा है। जानिए 2011 में कैसे ममता बनर्जी इसके दम पर सरकार में आ गई थीं। एक फायदा नरेंद्र मोदी को भी हुआ था।

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Modi in Singur: सिंगूर मुद्दे का एक फायदा तो नरेंद्र मोदी 2008 में उठा चुके हैं, लेकिन इस बार निशाना ममता सरकार है। (फोटो डिज़ाइन: पत्रिका)

Modi in Singur: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 18 जनवरी को सिंगूर में जनसभा कर रहे हैं। इससे पहले, 17 जनवरी को टीएमसी भी वहां बैठक कर रही है। बीजेपी का कहना है कि टाटा को सिंगूर वापस लाएंगे। सिंगूर ही वह मुद्दा है, जिसके दम पर ममता ने पश्चिम बंगाल में वामपंथियों का किला ध्वस्त किया था।

वह साल 2006 था। दुर्गा पूजा का त्योहार करीब था। पश्चिम बंगाल का सिंगूर सुलगने लगा था। ममता बनर्जी के सेक्रेटरी रतन मुखर्जी अपनी बेटी की शादी की तैयारियों में व्यस्त थे। दिल्ली के ओखला में एक शोरूम में वह पत्नी के साथ फर्नीचर देख रहे थे। तभी उनके फोन की घंटी बजी। दूसरी ओर जो व्यक्ति थे वह रेल मंत्रालय में ममता बनर्जी के साथ काम कर चुके पश्चिम बंगाल काडर के पूर्व आईएएस थे। उस समय वह पुणे की किसी एमएनसी में काम कर रहे थे। उनके फोन करने का मकसद एक खास मैसेज देना था। मैसेज टाटा ग्रुप और ममता बनर्जी के बीच समझौते से जुड़ा था। उन्होंने रतन मुखर्जी से साफ कहा, 'वामपंथी सरकार को जितना कोसना है, कोस लीजिए। भूमि अधिग्रहण कानून की आलोचना कर लीजिए, लेकिन रतन टाटा को बुरा-भला कहने से बचिए।' यही नहीं, उन्होंने यह तक कहा कि मैनेजिंग डायरेक्टर रवि कान्त वर्मा सहित टाटा समूह के प्रतिनिधि इस बारे में कोई रास्ता निकालने के लिए ममता बनर्जी से मिलने भी आ सकते हैं।

सेक्रेटरी पर भड़क गईं ममता, पर संदेश पर किया अमल

जिस दिन फोन आया, उसके अगले ही दिन ममता बनर्जी सिंगूर में रैली करने वाली थीं। इसलिए रतन मुखर्जी ने फौरन ममता बनर्जी तक वह संदेश पहुंचा दिया। पेंगुइन से प्रकाशित शुतापा पॉल की किताब ‘दीदी: द अनटोल्ड ममता बनर्जी’ के मुताबिक, संदेश सुन कर ममता भड़क गईं। बोलीं, 'अब आप हमें बताएंगे कि रैलियों में क्या बोलना है और क्या नहीं?' रतन बोले, 'मैं तो आप तक सिर्फ संदेश पहुंचा रहा हूं।'

अगले दिन ममता बनर्जी ने सिंगूर में जबरदस्त जनसभा की और जोरदार भाषण दिया। हालांकि, उन्होंने रतन टाटा या टाटा समूह का कहीं नाम नहीं लिया। ममता ने टाटा समूह के प्रतिनिधियों से मिलने का मन बना लिया था। उन्होंने दुर्गा पूजा के बीच ही षष्ठी की शाम अपने काली घाट स्थित घर पर उन्हें आने के लिए कहलवाया। उन्हें छह बजे का वक्त दिया गया था। लेकिन चार बजे ममता के स्टाफ को खबर मिली कि वे नहीं आ रहे। मालूम हुआ कि मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य ने उन्हें व्यक्तिगत तौर पर मामला सुलझा लेने का आश्वासन दिया है और कहा है कि अभी ममता से मिलने की जरूरत नहीं है।

गुस्सा और अपमान का घूंट पी कर रह गईं ममता

ममता को बड़ा गुस्सा आया। उन्हें यह अपना अपमान लगा और उन्होंने मन ही मन तय कर लिया कि अब समझौते की कोई बात नहीं करनी और सारी ताकत सिंगूर पर ही लगानी है।

ममता के हाथ सिंगूर का मुद्दा ऐसे वक्त लगा जब उन्हें किसी ऐसे मुद्दे की सख्त जरूरत थी। वह राजनीति में काफी कमजोर और अकेली पड़ गई थीं। इतनी कमजोर कि उनके साथ के सांसद उनसे मुंह फेरने लगे थे।

…उस दिन बहुत याद आए राजीव गांधी

2004 लोकसभा चुनाव के नतीजे ममता बनर्जी के लिए बड़ा झटका लेकर आए थे। अपनी पार्टी से वह अकेली थीं, जो लोकसभा पहुंची थीं। इससे पहले की लोकसभा में उनका अलग रुतबा था। आते-जाते सांसद उनका हाल-चाल पूछते रहते थे। वह भी हर पार्टी के सांसद से बातचीत करती थीं। लेकिन, अब हाल-चाल पूछना तो दूर, कई सांसद उन्हें देख कर मुंह तक फेर लेते थे।
सदन में ममता को बड़ा अकेलापन महसूस हुआ। उन्हें राजीव गांधी याद आ रहे थे। राजीव ने तब उनका खूब हौंसला बढ़ाया था जब पहली बार सांसद बनने के बाद अपनी पीएचडी डिग्री विवाद को लेकर विपक्षी सांसदों ने ममता को जमकर घेरा था।

सेक्रेटरी को सेंट्रल हॉल के गेट तक लाती थीं ममता

अकेलेपन और सांसदों की बेरुखी से ममता आहत थीं। अगले दिन उन्होंने अपने सेक्रेटरी को सेंट्रल हाल के गेट तक साथ चलने के लिए कहा। अब वह रोज उन्हें वहां तक साथ ले जातीं और शाम को निकलते वक्त भी वहां बुला लेती थीं।
एक शाम ममता सदन से घर लौटीं और नहा कर कमरे में बैठीं। तभी उन्हें पता चला कि फोन खराब है। कल तक जिसका काफी रुतबा था, आज उसका यह हाल! एक बार फिर उनके दिमाग में यह बात कौंधी। तभी उन्होंने खुद से वादा किया कि वह अपना रुतबा हासिल करके रहेंगी।

सिंगूर मुद्दे की ऐसे पड़ी बुनियाद

बुद्धदेव भट्टाचार्य जब पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बने तो राज्य की आर्थिक हालत सही नहीं थी। गरीबी, बेरोजगारी काफी थी। देश के कई हिस्से वैश्वीकरण और उदारीकरण के असर से चमकने लगे थे। बुद्धदेव के दूसरे कार्यकाल में बंगाल की स्थिति और कमजोर हो गई। तब उन्होंने भी तय किया कि राज्य में उद्योग लाना होगा। इसके बाद वह कोई भी जोखिम लेने के लिए तैयार थे। उन्होंने अपनी पार्टी की भी नहीं सुनी।

खतरे की घंटी भी नहीं सुनी

बुद्धदेव के लिए खतरे की घंटी 2005 में ही बज गई थी और 2006 के चुनाव में भी उन्हें संकेत मिल गए थे। लेकिन वह समझ नहीं पाए या उन्होंने समझना नहीं चाहा। 2005 में बुद्धदेव सरकार ने दक्षिण 24 परगना जिले के भानगर में एक्सप्रेससवे के लिए जमीन का अधिग्रहण करने को मंजूरी दी थी। तब ममता बनर्जी ने नंदीग्राम में विशाल रैली की थी और खेती योग्य जमीन लेने का विरोध किया था। अगले साल हुए चुनाव में ममता ने भले ही कम मार्जिन से, लेकिन नंदीग्राम में वामपंथियों का किला ढहा दिया था। इस संकेत से बुद्धदेव ने कोई सबक नहीं लिया।

2006 के चुनावी नतीजों ने बढ़ाया बुद्धदेब का हौंसला

2006 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में वामपंथी पार्टियों को 294 में से 233 सीटें मिली थीं और टीएमसी 30 पर सिमट गई थी। बुद्धदेव को लगा कि अब नहीं तो कब? उन्होंने बड़ी-बड़ी कंपनियों को बंगाल में जमीनें देना शुरू किया और उनके प्लांट लगने लगे। इसी क्रम में टाटा मोटर्स को नैनो कार बनाने के लिए सिंगूर में प्लांट लगाने के लिए जमीन दी। टाटा समूह को करीब 1000 एकड़ जमीन की जरूरत थी। सरकार को लगा कि किसान उसकी मंशा को समझेंगे और वे लंबे समय से माकपा के समर्थक भी रहे हैं तो जमीन अधिग्रहण में दिक्कत नहीं आएगी। लेकिन यह उनकी बड़ी भूल साबित हुई।

माकपा ने किसानों को हल्के में लिया। उनकी जमीन लेने से पहले उन्हें विश्वास में लेने की कोई कवायद नहीं की गई। सरकार ने सीधा आदेश निकाल दिया और सोचा कि लोग चुपचाप इसे मान लेंगे। यहीं वह गलत साबित हो गई। गठबंधन सरकार में शामिल माकपा के साथी दलों को भी सरकार का यह तरीका सही नहीं लग रहा था। बुद्धदेव कह रहे थे कि जो जमीन ली जा रही है, वह ज्यादा उपजाऊ नहीं है। दूसरी ओर, विरोधियों, मीडिया आदि ने जमीन को काफी उपजाऊ बताया। यह नैरेटिव किसानों में सरकार के खिलाफ गुस्सा भड़काने में काफी मददगार रहा।

शपथ लेते ही सीएम ने रतन टाटा के साथ कर दिया ऐलान

18 मई 2006 को शपथ लेने के कुछ ही देर बाद बुद्धदेव भट्टाचार्य राइटर्स बिल्डिंग में रतन टाटा के साथ आए और ऐलान कर दिया कि देश की सबसे सस्ती कार नैनो सिंगूर में बनेगी। इसके तुरंत बाद जुलाई से जमीन का अधिग्रहण शुरू हो गया। उपजाऊ जमीन के लिए 8.9 लाख प्रति एकड़ और बंजर जमीन के लिए 6 लाख रुपये प्रति एकड़ का मुआवजा तय किया गया। जमीन देने वालों के पुनर्वास की कोई ठोस योजना उन्हें नहीं बताई गई। असल में इसकी कोई ठोस योजना थी भी नहीं। न ही राज्य में इस तरह जमीन अधिग्रहण किए जाने का पहले कोई उदाहरण था, जहां लोगों ने केवल नौकरी की उम्मीद में एकमुश्त पैसे लेकर अपनी जमीन छोड़ दी हो।जैसे-

जैसे सरकार ने अपना काम तेज किया, वैसे-वैसे विरोधी भी मुखर होने लगे। ममता बनर्जी ने भी अपनी पूरी ताकत लगा दी थी। लगातार विरोध, प्रदर्शन, हिंसा की आग में सिंगूर जलने लगा। अंततः 2008 में टाटा ने घोषणा कर दी कि उसने सिंगूर में अपना प्लांट नहीं लगाने का फैसला किया है।

इसके बाद टाटा को मोदी का एक मैसेज

नरेंद्र मोदी तब गुजरात के मुख्यमंत्री थे। उन्होंने रत्न टाटा को मैसेज भेजा- स्वागत है। उन्होंने साणंद में टाटा को जमीन दी और देश की सबसे सस्ती कार नैनो वहीं से बन कर निकली।

…फिर ममता की ताजपोशी

इन सारी घटनाओं के बाद 2011 में जब पश्चिम बंगाल में चुनाव हुए तो वामपंथियों का तीन दशक से भी ज्यादा पुराना शासन खत्म हो गया। ममता बनर्जी की बतौर सीएम ताजपोशी हुई। तब से वह सीएम बनी हुई हैं और चौथी बार सरकार बनाने के लिए कमर कस चुकी हैं।

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