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धड़ल्ले से ट्रायल कोर्ट में दी जा रही मौत की सजा, फैसले रद्द कर रहा हाईकोर्ट, रिपोर्ट में बड़ा खुलासा

हैदराबाद की नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ की शोधकर्त्ताओं की रिपोर्ट के मुताबिक बीते दस सालों में सत्र अदालतों ने 1,310 लोगों को मौत की सजा सुनाई, करीब 90 फीसदी से अधिक फैसलों को पलट दिया। पढ़ें पूरी खबर...

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High Court

High Court प्रतिकात्मक फोटो (Photo Source- freepik)

भारत में ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई जा रही मौत की सजाओं पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। हैदराबाद की नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ से जुड़े आपराधिक कानून शोध ग्रुप स्क्वायर सर्कल क्लिनिक की 10 वर्षों की एक रिपोर्ट बताती है कि मौत की सजा के मामलों में ट्रायल कोर्ट के स्तर पर अनुचित दोषसिद्धि एक पैटर्न बन चुकी है। पिछले 10 वर्षों में देशभर की सत्र अदालतों ने 1,310 लोगों को मौत की सजा सुनाई। लेकिन इनमें से केवल 70 मामलों को ही हाईकोर्ट ने पुष्टि की। इन 70 मामलों में से सुप्रीम कोर्ट ने अब तक 38 पर फैसला सुनाया और एक भी मौत की सजा को बरकरार नहीं रखा।

मौत की सजा का इतंजार कर रहे कैदी

31 दिसंबर तक देश में 574 लोग मौत की सजा का इंतजार कर रहे थे। रिपोर्ट के अनुसार, यह 2016 के बाद किसी भी कैलेंडर वर्ष के अंत में मौत की सजा पाए लोगों की सबसे बड़ी संख्या है।

  • 10 साल में 364 लोग ऐसे थे जिन्हें ट्रायल कोर्ट ने मौत की सजा दी, लेकिन अपीलीय अदालतों ने बरी किया।
  • 2025 में सत्र अदालतों ने 94 मामलों में 128 लोगों को मौत की सजा दी ।
  • 2025 में हाईकोर्ट ने 25% से अधिक में मौत की सजा को सीधे बरी में बदला गया।
  • 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने जिन 19 मामलों पर निर्णय दिया, उनमें से 10 मामलों (50% से अधिक) में अभियुक्तों को बरी किया
  • लगातार तीसरे साल (2023–2025) सुप्रीम कोर्ट ने एक भी मौत की सजा नहीं दी।

सुप्रीम कोर्ट का बदलता रुख

पिछले कुछ वर्षों में सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा के मामलों में प्रक्रियात्मक सुरक्षा पर खास जोर दिया है। 2022 में कोर्ट ने निर्देश दिया था कि मौत की सजा देने से पहले ट्रायल कोर्ट को अभियुक्त के मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन, प्रोबेशन अधिकारी की रिपोर्ट, जेल में आचरण से जुड़े रिकॉर्ड पर ध्यान देना चाहिए। अगस्त 2025 में वसंत संपत दुपारे बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मौत की सजा से पहले सजा पर अलग से सुनवाई निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का अनिवार्य हिस्सा है।

हाई कोर्ट का रुख भी अलग

  • 2016 से 2025 के बीच हाई कोर्ट ने मौत की सजा की पुष्टि करने की तुलना में करीब चार गुना अधिक लोगों को बरी किया।
  • 2025 में हाई कोर्ट ने 131 लोगों से जुड़े मामलों का निपटारा किया, जिनमें लगभग 90% मामलों में मौत की सजा को या तो रद्द किया गया, कम किया गया या दोबारा सुनवाई के लिए वापस भेजा गया।

ट्रायल कोर्ट में दिशा-निर्देशों की अनदेखी

  • जहां उच्च अदालतें सतर्क हो रही हैं, वहीं सत्र अदालतों में सुधार नहीं दिख रहा।
  • 2025 में 83 मामलों में से 79 मामलों में ट्रायल कोर्ट ने 2022 के सुप्रीम कोर्ट दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया। यानी 95.18% मामलों में पालना नहीं हुई।
  • रिपोर्ट इसका कारण सजा सुनाने की जल्दबाजी को बताती है।
  • 18 मामलों में दोषसिद्धि और सजा एक ही दिन सुनाई गई।
  • दो-तिहाई से अधिक मामलों में सजा की सुनवाई पांच दिनों के भीतर पूरी कर दी गई।

इस तरह की समयसीमा मानसिक स्वास्थ्य, जेल आचरण और व्यक्तिगत पृष्ठभूमि से जुड़ी रिपोर्ट्स जुटाने में राज्य को और बचाव पक्ष को सामग्री पेश करने में गंभीर बाधा बनती है।

आजीवन कारावास बिना रिहाई: नई चिंता

रिपोर्ट यह भी चेतावनी देती है कि मौत की सजा के विकल्प के रूप में आजीवन कारावस के मामले बढ़ रहे हैं। दशकों तक बिना रिहाई की सजा गंभीर चिंता का विषय है। ऐसी सजा के लिए कोई स्पष्ट और नियमित ढांचा नहीं है, जिससे मनमानी का खतरा बना रहता है।

राज्यों का कैसा हाल?

  • उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक कैदियों को मौत की सजा
  • इसके बाद गुजरात, हरियाणा, महाराष्ट्र, केरल और कर्नाटक का स्थान
  • 2025 में महिलाओं को मौत की संजा 4.18% रही।