
High Court प्रतिकात्मक फोटो (Photo Source- freepik)
भारत में ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई जा रही मौत की सजाओं पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। हैदराबाद की नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ से जुड़े आपराधिक कानून शोध ग्रुप स्क्वायर सर्कल क्लिनिक की 10 वर्षों की एक रिपोर्ट बताती है कि मौत की सजा के मामलों में ट्रायल कोर्ट के स्तर पर अनुचित दोषसिद्धि एक पैटर्न बन चुकी है। पिछले 10 वर्षों में देशभर की सत्र अदालतों ने 1,310 लोगों को मौत की सजा सुनाई। लेकिन इनमें से केवल 70 मामलों को ही हाईकोर्ट ने पुष्टि की। इन 70 मामलों में से सुप्रीम कोर्ट ने अब तक 38 पर फैसला सुनाया और एक भी मौत की सजा को बरकरार नहीं रखा।
31 दिसंबर तक देश में 574 लोग मौत की सजा का इंतजार कर रहे थे। रिपोर्ट के अनुसार, यह 2016 के बाद किसी भी कैलेंडर वर्ष के अंत में मौत की सजा पाए लोगों की सबसे बड़ी संख्या है।
पिछले कुछ वर्षों में सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा के मामलों में प्रक्रियात्मक सुरक्षा पर खास जोर दिया है। 2022 में कोर्ट ने निर्देश दिया था कि मौत की सजा देने से पहले ट्रायल कोर्ट को अभियुक्त के मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन, प्रोबेशन अधिकारी की रिपोर्ट, जेल में आचरण से जुड़े रिकॉर्ड पर ध्यान देना चाहिए। अगस्त 2025 में वसंत संपत दुपारे बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मौत की सजा से पहले सजा पर अलग से सुनवाई निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का अनिवार्य हिस्सा है।
इस तरह की समयसीमा मानसिक स्वास्थ्य, जेल आचरण और व्यक्तिगत पृष्ठभूमि से जुड़ी रिपोर्ट्स जुटाने में राज्य को और बचाव पक्ष को सामग्री पेश करने में गंभीर बाधा बनती है।
रिपोर्ट यह भी चेतावनी देती है कि मौत की सजा के विकल्प के रूप में आजीवन कारावस के मामले बढ़ रहे हैं। दशकों तक बिना रिहाई की सजा गंभीर चिंता का विषय है। ऐसी सजा के लिए कोई स्पष्ट और नियमित ढांचा नहीं है, जिससे मनमानी का खतरा बना रहता है।
Published on:
05 Feb 2026 09:20 am
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