
Ghaziabad Three Daughters Suicide
Ghaziabad Three Daughters Suicide: बुधवार की तड़के एक ऐसी खबर आई जिसने देश के पैरेंट्स को भीतर तक हिला दिया। गाजियाबाद में रहने वाले एक परिवार की तीन नाबालिग बेटियों ने छत से कूदकर आत्महत्या कर ली। जिस किसी ने भी ये खबर सुनी उसका कलेजा फट गया। क्या कोई सोच सकता है कि 12, 14 ओर 16 साल की मासूम ऐसा भयावह कदम उठा सकती है। इस मुद्दे पर पत्रिका डॉट कॉम ने कुछ यूं टटोलने की कोशिश की है।
लाइफ कोच डॉ. अनिल सेठी इस मसले को कुछ यूं देखते हैं। वे कहते हैं कि आप ऐंड रिजल्ट पर बात करने से पहले समझिए कि स्थिति यहां तक पहुंची कैसी, इस घटना की शुरुआत तो बहुत पहले ही उन मासूमों ने मन में हो गई थी। मूल मुद्दा है कि समाज में और परिवार में जिस तरह संस्कारों का अवमूलन हो रहा है, उससे इस तरह की परिस्थितियां उत्पन्न होती है।
आज समाज ने आर्थिक तौर पर तो तरक्की कर ली है, पर परिवारों में आपसी बॉन्डिंग खत्म हो गई है। वे कहते हैं कि ऐसे बच्चे या शख्स जो मेंटल स्ट्रेस से गुजर रहे होते हैं, उनकी पहचान होती है कि वो अकेले रहने लगते हैं, उनको नींद या तो बहुत आती है या कम आती है, वो या तो ज्यादा खाना शुरू कर देते हैं या फिर उन्हें भूख बहुत कम लगती है।
वैसे इसे न्यूक्लियर फैमिली कल्चर का भी कुप्रभाव मान सकते है। पति-पत्नी दोनों नौकरी करते हैं, ऐसे में वे अब बच्चों को क्वांटिटी ऑफ टाइम तो नहीं दे पाते हैं इसलिए उनको क्वॉलिटि ऑफ टाइम पर बहुत फोकस देना चाहिए।
ऐसे में पैरेंटिंग आज के मां-बापों के लिए सबसे महत्वपूर्ण इश्यू है। अब कई परिवारो में प्री मैरिटिटल काउंसलिंग भी शादी का अहम हिस्सा हो गई है। ऐसे में कई बार मैरिज काउंससर या रिलेशनशिप काउंसलर होने वाले पति-पत्नी से कई बार ऐसी बातें पूछते है जो उनकी शादी के बाद आने वाली समस्याओं को कैसे डील करेंगे, पर ही आधारित होते हैं। मेरा तो ये मानना है कि देश में पैरेंटिंग का क्रैश कोर्स जरूरी है ताकि आने वाली पीढ़ी का हम सही तरह से पालन-पोषण कर पाएं।
शादी के लिए कुंडलियां मिलानी जितनी जरूरी मानी जाती है, उतना ही जरूरी पति-पत्नी के मेडिकल टेस्ट भी होने चाहिए। पंडित के साथ-साथ रिलेशनशिप काउंसलर को भी इस अहम समारोह का हिस्सा बनाना चाहिए। आज आईक्यू पर तो हम सब फोकस करते हैं, पर इमोशनल कोशंट यानी ईक्यू बहुत कम हो रहा है।
साइकोलोजिस्ट डॉ.भावना बर्मी इस अहम मुद्दे पर कहती हैं कि सबसे पहले हमें ये समझना होगा कि अगर किसी के मन में आत्महत्या की बात चल रही है तो हम उसे कैसें पहचानें। ऐसा व्यक्ति बार बार मरने की बातें करने लगता है। वो कहता है कि मैं अब इस दुनिया में रहना नहीं चाहता हूं। जिंदगी का कोई मतलब नहीं बचा है। अब जीवन बोझ लगता है। वो दोस्तों से मिलने से कतराने लगता है। मूड स्विंग या एंग्जाइटी लगातार उसमें पाई जाने लगती है।
गाजियाबाद का ये केस काफी ट्रेजिक है। ये गेम के एडिक्शन के खतरनाक होने को हाईलाइट करता है। कोरियन लवर गेम की आदत कैसे एस्ट्रीम स्टेप तक पहुंचती है, ये समझना बहुत ही जरूरी है। कोरोना के दौरान जब लॉकडाउन लगा तो इन बहनों ने अकेलेपन से बचने के लिए बंद कमरे में साथ ये गेम खेलना शुरू किया, जो उनका बॉन्डिंग टूल बन गया।
हर टास्क पूरा होने पर रिवार्ड मिलने लगा और इसने दिमाग को इसका एडिक्ट बना दिया, ये ठीक वैसा ही एडिक्शन हो गया जैसा कि ड्रग्स का होता है। गेछोटम मे 50 टास्क थे, छोटे-छोटे टास्क शुरू होकर बाद में इतने ज्यादा आपके दिमाग में घुस गए कि आप देर रात भी उसी में एंगेज रहने लगते हैं। ये आपको घर-परिवार से काट देते हैं। और परिणामस्वरूप उन्होंने सुसाइड जैसा कदम उठा लिया
ये आइडेंटिटी फ्यूजन भी करता है और आपको रिएलटी से दूर ले जाता है। बहनों ने अपने को कोरियन प्रिंसेज समझना शुरू कर दिया, गेम को लाइफ मान लिया । अत्याधिक गेम में घुसे रहने के कारण पेरेंट्स से भी बहस हुई होगी। ऐसे में जब सब कुछ आपके हिसाब से नहीं होता तो काल्पनिक दुनिया आप पर हावी होती है और फिर ग्रुप सुसाइड का फैसला किया गया होगा।
एडिक्शन के चलते स्लीप साइकिल से लेकर पढ़ाई-लिखाई और सोशल लाइफ सब पर नेगिटिव इंपैक्ट पड़ा और एंग्जायटी, डिप्रेशन के जाल में फंसने पर उन लोगों को सुसाइड की आसान सॉल्यूशन लगा होगा। चूंकि तीनों पूरे गेम में एकसाथ ही जुड़ी रहीं, इसलिए उन्होंने आपसी सहमति से साथ ही में ये काम करने का फैसाल किया।
ये घटना बताती है कि पैरेंटिंग कितना अहम विषय है, पर पूरा दोष पैरेंट्स को देना सही नहीं, कोरानो और लॉकडाउन ने भी मानसिक विकार उत्पन्न किए हैं। मां-बाप ने आपत्ति को जताई पर वो सार्थक संवाद करने में असफल रहे। आज के दौर में परेंट्स को बच्चों के मोबाइल और उसमें इंस्टॉल ऐप्स पर नजर रखनी चाहिए। गेम हिस्ट्री चेक करें पर ध्यान रखें कि बच्चे को ये न लगे कि उनकी प्राइवेसी में जबरदस्ती दखलअंदाजी की जा रही है।
फैमिली में मां-बाप को भी अपना स्क्रीनटाइम तय करना चाहिेए ताकि बच्चों को भी समझा सके कि मोबाइल-टीवी कितना देखना है। बच्चों को पार्क में लेकर जरूर जाएं और आउटडोर स्पोर्स्ट्स के प्रति उनमें रुचि पैदा करनी चाहिए। समय-समय पर बेहतर परफॉर्म करने पर रिवार्ड देने की परंपरा भी बनानी चाहिए।
Updated on:
04 Feb 2026 08:18 pm
Published on:
04 Feb 2026 06:09 pm
बड़ी खबरें
View Allराष्ट्रीय
ट्रेंडिंग
