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Mahashivratri पर हिंदुओं की बड़ी जीत! कलबुर्गी दरगाह के अंदर होगी शिव पूजा, कोर्ट ने सुनाया ऐतिहासिक फैसला

दरगाह 14वीं शताब्दी के सूफी संत हजरत शेख अलाउद्दीन अंसारी (लाडले मशाइक) और 15वीं शताब्दी के हिंदू संत राघव चैतन्य से जुड़ी हुई है। ऐतिहासिक रूप से दोनों संतों के अवशेष इसी परिसर में हैं और लंबे समय से हिंदू व मुस्लिम दोनों समुदाय यहां पूजा-अर्चना करते आए हैं।

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Kalburgi Dargah

कलबुर्गी दरगाह

कर्नाटक हाई कोर्ट ने महाशिवरात्रि के अवसर पर हिंदू पक्ष को बड़ी राहत देते हुए एक दरगाह परिसर में स्थित शिवलिंग की पूजा की अनुमति दे दी है। यह फैसला हिंदू समुदाय के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि यह विवादित स्थल पर धार्मिक अधिकारों को मान्यता देता है। कोर्ट ने सिद्ध रामैया हीरेमठ की याचिका पर सुनवाई करते हुए 15 फरवरी को महाशिवरात्रि के दिन सीमित संख्या में भक्तों को राघव चैतन्य शिवलिंग की पूजा करने की इजाजत दी है। पूजा भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच दरगाह के अंदर ही होगी।

लंबे समय से हिंदू और मुस्लिम करते आए हैं पूजा-अर्चना

यह मामला कर्नाटक के कलबुर्गी जिले के आलन्द टाउन (अलंद) स्थित लाडले मशाइक (या लाडले मशक) दरगाह से जुड़ा है। दरगाह 14वीं शताब्दी के सूफी संत हजरत शेख अलाउद्दीन अंसारी (लाडले मशाइक) और 15वीं शताब्दी के हिंदू संत राघव चैतन्य से जुड़ी हुई है। ऐतिहासिक रूप से दोनों संतों के अवशेष इसी परिसर में हैं और लंबे समय से हिंदू व मुस्लिम दोनों समुदाय यहां पूजा-अर्चना करते आए हैं। परिसर में मौजूद राघव चैतन्य शिवलिंग को हिंदू भक्त शिवलिंग मानते हैं, जबकि दरगाह कमेटी इसे धार्मिक स्थल का हिस्सा बताती है।

2022 में पैदा हुआ सांप्रदायिक तनाव

विवाद 2022 में तब बढ़ा जब कुछ असामाजिक तत्वों ने कथित तौर पर शिवलिंग पर अपमानजनक कार्य किया, जिससे सांप्रदायिक तनाव पैदा हुआ। इसके बाद हिंदू संगठनों ने पूजा के अधिकार की मांग की। पिछले साल 2025 में भी कर्नाटक हाई कोर्ट ने महाशिवरात्रि पर 15 हिंदू सदस्यों को पूजा की अनुमति दी थी, जो भारी पुलिस सुरक्षा में संपन्न हुई और कोई अनहोनी नहीं हुई। इस साल भी कोर्ट ने इसी आधार पर फैसला सुनाया है। याचिकाकर्ता सिद्ध रामैया हीरेमठ ने राज्य सरकार और पुलिस को निर्देश देने की मांग की थी कि भक्तों को पूजा करने और सुरक्षा प्रदान की जाए।

दरगाह कमेटी में सुप्रीम कोर्ट में दायर की याचिका

दरगाह कमेटी ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की, जिसमें पूजा पर रोक और परिसर के धार्मिक चरित्र को बदलने की कोशिशों को रोकने की मांग की गई। कमेटी का कहना था कि यह एक सुनियोजित पैटर्न है, जिससे दरगाह की पहचान प्रभावित हो रही है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया और कहा कि ऐसी हर याचिका सीधे सुप्रीम कोर्ट में आने से हाई कोर्ट की उपयोगिता पर सवाल उठेगा।

हिंदू पक्ष में खुशी की लहर

कोर्ट के इस फैसले से हिंदू पक्ष में खुशी की लहर है। इसे महाशिवरात्रि पर धार्मिक स्वतंत्रता की जीत के रूप में देखा जा रहा है। पिछले साल की तरह इस बार भी पूजा सीमित लोगों (15 के आसपास) तक ही होगी और सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए जाएंगे। दोनों समुदायों के बीच शांति बनाए रखने के लिए प्रशासन सतर्क है।