
using bottled water.
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शहर में नल से पानी आता है, टंकियों से सप्लाई होती है, जगह.जगह सैंपलिंग कर नगर पालिका शुद्ध पेयजल का दावा भी करती है, लेकिन हकीकत यह है कि आमजन का भरोसा अब नल के पानी से उठता जा रहा है। कोई बोतलबंद पानी खरीद रहा है तो कोई अपने घरों में आरओ लगवाने को मजबूर है। पानी जैसी बुनियादी जरूरत को लेकर शहर में एक अजीब.सी असमंजस की स्थिति बन गई है।
नगर में लगभग 50 किलोमीटर लंबी जलापूर्ति लाइन बिछी है और 7 हजार से अधिक नल कनेक्शनदिए जा चुके हैं। सैकड़ों सार्वजनिक नल लगे हुए है। नर्मदा से जल लेकर ट्रीटमेंट के बाद शहर में सप्लाई की जाती है। नगर पालिका का कहना है कि मानकों के अनुसार पानी को फि ल्टर कर घर-घर पहुंचाया जा रहा है। इसके लिए समय.समय पर विभिन्न इलाकों से पानी के सैंपल लिए जाते हैं और रिपोर्ट के आधार पर जल को सुरक्षित बताया जाता है। बावजूद इसके लोगों का भरोसा इस व्यवस्था पर पूरी तरह कायम नहीं हो पा रहा।
शहर के कई मोहल्लों में लोग मानते हैं कि नल का पानी देखने में भले साफ हो, लेकिन कई बार उसका स्वाद और गंध संदेह पैदा करती है। कहीं पाइपलाइन पुरानी है, तो कहीं लीकेज और गंदे नालों के पास से गुजरती लाइनें चिंता बढ़ाती हैं। यही कारण है कि मध्यम और निम्न.मध्यम वर्ग के परिवार भी अब आरओ या वाटर फिल्टर को जरूरत मानने लगे हैं। जिनके पास यह सुविधा नहीं है, वे रोजमर्रा के उपयोग के लिए बोतलबंद पानी पर निर्भर हो रहे हैं।
बाजारों, कार्यालयों, निजी संस्थानों और आयोजनों में बोतलबंद पानी की खपत लगातार बढ़ रही है। छोटे दुकानदार से लेकर बड़े कारोबारी तकए सभी ग्राहकों को बोतल बंद पानी ही उपलब्ध कराते हैं। यह स्थिति तब है, जब शहर में जलप्रदाय पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। जानकारी के अनुसार नगर पालिका की जलप्रदाय शाखा का वार्षिक बजट लगभग 7 करोड़ 18 लाख रुपए है। इसके बावजूद जलकर से होने वाली आय महज 1 करोड़ 20 लाख रुपए के आसपास सिमटकर रह जाती है। यानी पानी की आपूर्ति पर भारी खर्च और उससे मिलने वाला राजस्व, दोनों के बीच बड़ा अंतर है।
नगर पालिका का तर्क है कि शुद्ध पानी उपलब्ध कराना उसकी जिम्मेदारी है और इसके लिए संसाधनों की कमी नहीं आने दी जा रही। जल शोधन संयंत्र से लेकर वितरण व्यवस्था तक लगातार सुधार किए जा रहे हैं। वहीं अधिकारी यह भी स्वीकारते हैं कि उपभोक्ताओं में जागरूकता की कमी है। जलकर समय पर न चुकाने और अवैध कनेक्शनों के कारण भी व्यवस्था पर दबाव बढ़ता है।
दूसरी ओर नागरिकों का कहना है कि अगर पानी पूरी तरह सुरक्षित और भरोसेमंद हो तो उन्हें अतिरिक्त खर्च क्यों करना पड़े,आरओ लगवाने में हजारों रुपए खर्च होते हैं और बोतलबंद पानी पर रोजाना अलग से रकम जाती है। इस दोहरी मार से जहां लोगों बजट प्रभावित हो रहा है। वहीं पर्यावरण की दृष्टि से भी प्लास्टिक की बोतलों का बढ़ता उपयोग नई समस्या खड़ी कर रहा है।
कुल मिलाकर शहर की पानी की कहानी सवालों से घिरी हुई है। एक तरफ नर्मदा के अमृत जल और शुद्धता के दावे हैं, तो दूसरी तरफ लोगों की आदतों में आया बदलाव हकीकत बयां करता है। जब तक नल के पानी पर लोगों का भरोसा पूरी तरह बहाल नहीं होता। तब तक बोतलबंद पानी और आरओ का चलन यूं ही बढ़ता रहेगा। यह स्थिति न सिर्फ व्यवस्था के लिए चुनौती है, बल्कि यह सोचने पर भी मजबूर करती है कि आखिर पानी जैसी बुनियादी सुविधा पर विश्वास की यह दरार क्यों गहराती जा रही है।
वर्जन
सरकारी एजेंसियों द्वारा पानी की शुद्धता के मानकों का पूरा ध्यान रखा जाता है। बोतलबंद पानी का प्रचलन शहरी क्षेत्रों में ही अधिक दिखाई पड़ता है। इसकी अपेक्षा ग्रामीण क्षेत्रों में इसका कम उपयोग होता है।
आरएस ठाकुर,ईई पीएचई
वर्जन
लोग आम तौर पर पेयजल के रूप में उस पानी का उपयोग करना पसंद करते हुए जिसे लेकर उनके मन में उपयोग किए जाने वाले पानी की शुद्धता का विश्वास हो।चूंकि सार्वजनिक कार्यक्रमों या बाजारों में इसकी शुद्धता पर लोग भरोसा नहीं करते हैं,इसलिए बोतलबंद पानी का उपयोग करते हैं। लोग इस बात पर ध्यान नहीं देते कि जिस पैक्ड वाटर का वे उपयोग कर रहे हैं उसका ब्रांड कैसा है। उनकी नजर में पैक्ड वाटर शुद्ध ही होता है।
डा राहुल नेमा आरएमओ जिला अस्पताल
शहर में बोतलबंद पानी की अनुमानित खपत का आंकड़ा
शहर बोतलबंद पानी के ब्रांड -12
शहर में बोतलबंद पानी के डिस्ट्रीब्यूटर-12-15
शहर में बोतल बंद पानी के विक्रेता-250 से अधिक
शहर में बोतलबंद पानी की खपत रोजाना-5 हजार बोतल
शहर में पैक्ड केन वाटर सप्लायर-8-10
शहर में पैक्ड केन रोजाना खपत-1000
शहर में घरों में लगे आरओ- 30-40 प्रतिशत घरों में
Published on:
21 Jan 2026 04:00 pm

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