
‘साइकिल पंचर’ बनाम ‘2022 की चोट’: यूपी बजट पर मौर्य-शिवपाल में जुबानी जंग, मायावती ने दी नसीहत (फोटो सोर्स : WhatsApp News Group)
War of Words Erupts in UP Over Budget 2026-27 as Maurya, Shivpal Spar: उत्तर प्रदेश के बजट 2026-27 को लेकर सियासत तेज हो गई है। सदन से लेकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) तक सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच बयानबाजी का दौर चल पड़ा है। डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य और समाजवादी पार्टी (सपा) के वरिष्ठ नेता शिवपाल सिंह यादव के बीच तीखी नोकझोंक ने राजनीतिक माहौल गरमा दिया है। वहीं, बसपा प्रमुख मायावती ने भी बजट पर प्रतिक्रिया देते हुए सरकार को क्रियान्वयन पर ध्यान देने की सलाह दी है। राज्य का बजट, जो सामान्यतः विकास योजनाओं और वित्तीय प्रावधानों का दस्तावेज माना जाता है, इस बार राजनीतिक हमलों का प्रमुख मंच बन गया है।
डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने बजट को “सबका साथ, सबका विकास” की सोच से तैयार बताया। उन्होंने विपक्ष पर तंज कसते हुए कहा कि यह बजट विकास का रोडमैप है, जिससे जनता को सीधा लाभ मिलेगा और विपक्ष की राजनीति कमजोर पड़ेगी। मौर्य ने सोशल मीडिया पर लिखा कि इस बजट ने विपक्ष की “साइकिल पंचर” कर दी है। उन्होंने दावा किया कि प्रदेश की जनता विकास कार्यों से संतुष्ट है और आने वाले चुनावों में भी भाजपा को समर्थन मिलेगा। उनके अनुसार 2027 से लेकर 2047 तक प्रदेश की राजनीति में भाजपा की मजबूत भूमिका रहेगी।
मौर्य के बयान के बाद सपा नेता शिवपाल सिंह यादव ने तीखा जवाब दिया। उन्होंने कहा कि सरकार को विपक्षी दलों की “साइकिल” की चिंता छोड़कर जनता की समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए। शिवपाल ने आरोप लगाया कि बजट में बड़े-बड़े वादे किए गए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर बेरोजगारी, महंगाई और स्वास्थ्य-शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं की स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। उन्होंने कहा कि जनता केवल घोषणाओं से प्रभावित नहीं होती, बल्कि असली काम देखती है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि जब जनता जवाब देती है तो बड़े-बड़े सिंहासन भी पंचर हो जाते हैं। उनका यह बयान राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है।
दोनों नेताओं की बयानबाज़ी में 2022 के विधानसभा चुनाव परिणामों और 2027 के चुनावी परिदृश्य की झलक भी दिखाई दी। मौर्य ने 2022 की जीत को जनता के भरोसे का प्रमाण बताया, जबकि शिवपाल ने संकेत दिया कि आगामी चुनावों में जनता का फैसला अलग हो सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि बजट बहस के बहाने दल अपने-अपने समर्थकों को संदेश दे रहे हैं और चुनावी तैयारी की दिशा में राजनीतिक माहौल बना रहे हैं।
बसपा प्रमुख मायावती ने अपेक्षाकृत संतुलित प्रतिक्रिया दी। उन्होंने बजट को “लोकलुभावन” बताते हुए कहा कि केवल घोषणाएं पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि पिछले वर्षों के प्रावधानों के वास्तविक क्रियान्वयन का डेटा भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
मायावती ने स्थायी रोजगार, एससी/एसटी और ओबीसी आरक्षण, तथा बैकलॉग भर्तियों को प्राथमिकता देने की मांग की। उनका कहना था कि बजट का असली मूल्यांकन तब होगा जब योजनाएं धरातल पर उतरेंगी।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि बजट अब केवल वित्तीय प्रबंधन का दस्तावेज़ नहीं रह गया, बल्कि यह राजनीतिक विमर्श का अहम हथियार बन चुका है। सत्ता पक्ष इसे विकास का रोडमैप बताता है, जबकि विपक्ष इसे वादों की बरसात कहकर सवाल उठाता है।
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच आम नागरिक महंगाई, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी समस्याओं के समाधान की अपेक्षा कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अंततः बजट की सफलता का पैमाना यही होगा कि योजनाएं कितनी प्रभावी ढंग से लागू होती हैं।
इस पूरी बहस में सोशल मीडिया प्रमुख मंच बनकर उभरा है। नेताओं के बयान तेजी से वायरल हो रहे हैं और समर्थकों के बीच बहस तेज हो रही है। इससे राजनीतिक संवाद का स्वर और अधिक तीखा हो गया है।
Published on:
12 Feb 2026 12:16 pm
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