
योगी सरकार का विजन-तकनीक से आमजन तक सुलभ, बेहतर और समयबद्ध स्वास्थ्य सेवाएं (फोटो सोर्स : WhatsApp News Group)
Digital Health Yogi Government: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की दूरदर्शी सोच और स्पष्ट नीति के चलते उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में एक नई क्रांति की ओर अग्रसर है। देश की सबसे बड़ी आबादी वाले राज्य में अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ( AI ) को स्वास्थ्य व्यवस्था का अहम हिस्सा बनाया जा रहा है। 24 करोड़ की आबादी, विशाल ग्रामीण क्षेत्र और मातृ-शिशु स्वास्थ्य से लेकर गैर-संचारी रोगों तक फैली चुनौतियों के बीच योगी सरकार ने तकनीक को समाधान के रूप में अपनाया है। इसका उद्देश्य न केवल इलाज की गुणवत्ता में सुधार करना है, बल्कि आम नागरिक तक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच को अधिक सरल, सुलभ और समयबद्ध बनाना भी है।
योगी सरकार का मानना है कि भविष्य की स्वास्थ्य व्यवस्था तकनीक आधारित होगी। इसी सोच के तहत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को स्वास्थ्य क्षेत्र में एक सशक्त सहायक उपकरण के रूप में विकसित किया जा रहा है। AI न केवल रोगों की पहचान और इलाज में डॉक्टरों की मदद कर रहा है, बल्कि नीति निर्माण, निगरानी और संसाधनों के बेहतर उपयोग में भी अहम भूमिका निभा रहा है। प्रदेश सरकार के प्रयासों से यह साफ हो गया है कि मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और फ्रंटलाइन हेल्थ वर्कर्स के समर्पण से एआई को जमीनी स्तर पर सफलतापूर्वक लागू किया जा सकता है।
अपर मुख्य सचिव स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा अमित कुमार घोष के अनुसार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का स्पष्ट विजन है कि तकनीक का उपयोग केवल शहरी क्षेत्रों तक सीमित न रहे, बल्कि गांव-गांव तक बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाई जाएं। पिछले पौने नौ वर्षों में प्रदेश में स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने के साथ-साथ डिजिटल प्लेटफॉर्म को भी प्राथमिकता दी गई है। उत्तर प्रदेश में करीब 10 लाख फ्रंटलाइन हेल्थ वर्कर्स आशा, एएनएम, नर्स और डॉक्टर, ग्रामीण और शहरी इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ बने हुए हैं। इन्हीं के कार्य को सरल और प्रभावी बनाने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म को एआई से जोड़ा जा रहा है।
प्रदेश में पहले से सक्रिय हेल्थ मैनेजमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम (HMIS), रिप्रोडक्टिव एंड चाइल्ड हेल्थ (RCH) पोर्टल, टीबी नियंत्रण के लिए निक्षय पोर्टल और टेलीमेडिसिन सेवा ई-संजीवनी अब केवल डाटा संग्रह तक सीमित नहीं हैं। ये प्लेटफॉर्म नीति निर्माण, निगरानी और त्वरित निर्णय लेने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। इन्हीं प्लेटफॉर्म से मिलने वाला गुणवत्तापूर्ण डाटा एआई आधारित समाधानों के लिए मजबूत आधार तैयार कर रहा है। इससे रोगों के ट्रेंड, जोखिम वाले क्षेत्रों और जरूरतमंद आबादी की पहचान पहले से कहीं अधिक सटीक तरीके से हो पा रही है।
अपर मुख्य सचिव ने बताया कि उत्तर प्रदेश ने डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर को स्वास्थ्य सुधार का केंद्रीय स्तंभ बनाया है। ई-संजीवनी के माध्यम से टेलीमेडिसिन नेटवर्क का व्यापक विस्तार किया गया है। आज उत्तर प्रदेश पूरे देश में सबसे अधिक टेली कंसल्टेशन देने वाला राज्य बन चुका है। यह नेटवर्क अब एआई आधारित क्लिनिकल डिसीजन सपोर्ट सिस्टम (CDSS) को अपनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और टेलीमेडिसिन सेवाओं में यह सिस्टम डॉक्टरों को इलाज से जुड़े निर्णय लेने में मदद करता है। मरीज के लक्षण, पूर्व चिकित्सा इतिहास और उपलब्ध डाटा के आधार पर एआई संभावित इलाज विकल्प सुझाता है, जिससे निर्णय अधिक सटीक और प्रभावी हो पाते हैं।
सीएम योगी का स्पष्ट मत है कि एआई डॉक्टर की जगह नहीं ले सकता, बल्कि उसे और सशक्त बनाता है। इसी सोच के तहत प्रदेश में एआई को एक सहायक उपकरण के रूप में अपनाया गया है। इससे अधिक मरीजों वाले अस्पतालों में डॉक्टरों पर पड़ने वाला दबाव कम हो रहा है और इलाज की गुणवत्ता में सुधार देखने को मिल रहा है।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की महानिदेशक डॉ. पिंकी जोवल के अनुसार उत्तर प्रदेश में टीबी उन्मूलन योगी सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है। निक्षय पोर्टल के साथ एआई आधारित विश्लेषणात्मक टूल्स को जोड़कर उन इलाकों और मरीज समूहों की पहचान की जा रही है, जहां टीबी का जोखिम अधिक है। एआई आधारित मैपिंग और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली डॉक्टरों को यह अनुमान लगाने में मदद कर रही है कि किन क्षेत्रों में अतिरिक्त संसाधनों और गहन निगरानी की जरूरत है। इससे टीबी के मामलों की पहचान पहले ही चरण में हो पा रही है, जो “रोकथाम ही सबसे बेहतर इलाज” के मुख्यमंत्री के विजन को साकार करता है।
प्रदेश सरकार का एक अन्य प्रमुख लक्ष्य मातृ एवं शिशु मृत्यु दर को कम करना है। एआई आधारित उपकरण उच्च जोखिम वाली गर्भावस्थाओं की पहचान, समय पर रेफरल और नवजात देखभाल में मदद कर रहे हैं। फ्रंटलाइन वर्कर्स को डिजिटल संकेत मिलते हैं, जिससे वे समय रहते जरूरी कदम उठा पाती हैं। इससे जटिल मामलों में देरी कम हो रही है और मां व बच्चे दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा रही है।
प्रदेश में डायबिटीज और उच्च रक्तचाप जैसे गैर-संचारी रोग तेजी से बढ़ रहे हैं। एनएफएचएस-5 के अनुसार देश में लगभग 6.5 प्रतिशत वयस्क मधुमेह से ग्रस्त हैं। उत्तर प्रदेश में एआई सामुदायिक स्तर पर स्क्रीनिंग और शुरुआती पहचान को सशक्त बना रहा है। डायबिटिक रेटिनोपैथी की पहचान के लिए रेटिनल इमेज विश्लेषण जैसे पायलट प्रोजेक्ट्स ने यह साबित किया है कि एआई से स्क्रीनिंग की पहुंच बढ़ाई जा सकती है और रेफरल सिस्टम को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।
प्रदेश में अपनाया जा रहा एआई मॉडल पूरी तरह मानव-केंद्रित है। आशा, एएनएम, नर्स और डॉक्टरों के अनुभव को ध्यान में रखकर तकनीक विकसित की जा रही है। शुरुआती पायलट प्रोजेक्ट्स से यह स्पष्ट हुआ है कि जब एआई समाधान जमीनी जरूरतों के अनुरूप होते हैं, तो उन्हें आसानी से अपनाया जाता है। इससे शोध संस्थानों, तकनीकी कंपनियों और डोनर एजेंसियों के बीच सहयोग बढ़ा है और स्वास्थ्य नवाचार को नई गति मिली है।
योगी सरकार प्रदेश को एआई के क्षेत्र में एक मॉडल स्टेट के रूप में विकसित करने की दिशा में लगातार काम कर रही है। इसका उद्देश्य यह है कि उत्तर प्रदेश में अपनाए गए सफल मॉडल से देश के अन्य राज्य भी सीख ले सकें। इसके लिए स्वास्थ्य में नैतिक और समावेशी AI पर राष्ट्रीय दृष्टिकोण, डाटा गुणवत्ता को मजबूत करना, एआई समाधानों की वैधता के लिए स्पष्ट ढांचा और क्षमता निर्माण पर विशेष जोर दिया जा रहा है।
Published on:
12 Jan 2026 03:00 am
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