
पिछले सत्र में ‘बीवी की कसम’ तक पहुंची थी बहस, इस बार महोबा प्रकरण और सियासी समीकरण गरमा सकते हैं सदन का माहौल (फोटो सोर्स : WhatsApp News Group)
Jal Jeevan Mission Row May Heat Up UP Assembly Again: उत्तर प्रदेश विधानसभा का आगामी सत्र एक बार फिर जल जीवन मिशन को लेकर गरमाने के संकेत दे रहा है। पिछली बार इसी मुद्दे पर सदन में जल शक्ति मंत्री स्वतंत्रदेव सिंह और समाजवादी पार्टी के विधायक फहीम इरफान के बीच तीखी नोकझोंक हुई थी, जो “बीवी की कसम” जैसे निजी संदर्भ तक पहुंच गई थी। अब राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि इस बार मामला और व्यापक हो सकता है, क्योंकि विपक्ष के पास महोबा में कथित अनियमितताओं का मुद्दा भी है, जिसे लेकर भाजपा विधायक ब्रजभूषण राजपूत द्वारा सार्वजनिक सवाल उठाए जाने की घटना सुर्खियों में रही।
बीते विधानसभा सत्र में सपा विधायक फहीम इरफान ने जल जीवन मिशन के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल उठाए थे। उन्होंने दावा किया था कि कई स्थानों पर कम दबाव के कारण पानी की आपूर्ति प्रभावी नहीं है, पाइपलाइन बिछाने के बाद सड़कों की मरम्मत अधूरी है और कुछ जगहों पर टंकियों की गुणवत्ता को लेकर भी सवाल हैं।
मंत्री स्वतंत्रदेव सिंह ने इन आरोपों का आंकड़ों के साथ जवाब दिया और कहा कि राज्य में बड़े पैमाने पर वितरण प्रणाली बिछाई गई है और सड़कों की बहाली का काम भी किया गया है। बहस के दौरान मंत्री द्वारा दिया गया “कसम” वाला बयान सदन में तीखी प्रतिक्रिया का कारण बना। मामला राजनीतिक मर्यादा बनाम भावनात्मक आवेग की बहस तक जा पहुंचा था।
इस बार विपक्ष के पास महोबा जिले से जुड़ा मुद्दा है, जहां जल जीवन मिशन के कार्यों को लेकर कथित गड़बड़ियों की चर्चाएं रही हैं। स्थानीय स्तर पर हुए विरोध और भाजपा विधायक द्वारा ही उठाए गए सवालों ने इस मुद्दे को और संवेदनशील बना दिया है। हालांकि सरकार की ओर से अब तक यही रुख सामने आया है कि यदि कहीं भी शिकायत है तो उसकी जांच कराई जाएगी। लेकिन विपक्ष इस मुद्दे को “आंतरिक असंतोष” और “योजना के क्रियान्वयन की खामियों” के प्रतीक के रूप में पेश करने की तैयारी में दिख रहा है।
भाजपा के अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि स्वतंत्रदेव सिंह आम तौर पर टकराव की राजनीति से बचते रहे हैं। वे संगठन से निकले नेता माने जाते हैं और उनकी छवि संयमित तथा संवादशील नेता की रही है। यही कारण है कि विपक्ष के कई नेता भी व्यक्तिगत हमलों से अक्सर परहेज करते रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यही मुद्दा किसी और तेजतर्रार नेता से जुड़ा होता तो सदन में अधिक तीखा टकराव देखने को मिल सकता था। लेकिन स्वतंत्र देव की कार्यशैली बहस को अक्सर प्रशासनिक जवाबों तक सीमित रखने की रही है।
केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना जल जीवन मिशन का लक्ष्य हर ग्रामीण घर तक नल से जल पहुंचाना है। उत्तर प्रदेश में इस योजना का विस्तार व्यापक स्तर पर हुआ है। सरकार दावा करती है कि लाखों घरों तक कनेक्शन दिए गए हैं, पाइपलाइन नेटवर्क बिछाया गया है और वितरण प्रणाली मजबूत हुई है। वहीं विपक्ष का आरोप है कि कई जगहों पर गुणवत्ता, रखरखाव और ठेकेदारों की जवाबदेही को लेकर सवाल हैं। पाइपलाइन डालने के बाद सड़कों की स्थिति, जल दाब की कमी और स्थानीय निगरानी तंत्र पर भी चर्चा होती रही है। सच्चाई अक्सर इन दोनों के बीच कहीं होती है-जहां बड़े पैमाने पर काम हुआ है, वहीं कुछ स्थानों पर कमियां भी उजागर हुई हैं।
राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि हाल के महीनों में प्रदेश भाजपा के भीतर संगठनात्मक बदलावों ने भी समीकरणों को प्रभावित किया है। पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के बाद नेतृत्व की नई शैली और क्षेत्रीय संतुलन को लेकर अटकलें तेज हैं। स्वतंत्रदेव सिंह को कुर्मी समाज का प्रमुख चेहरा माना जाता रहा है। ऐसे में उनके हर कदम पर राजनीतिक नजरें रहती हैं। महोबा प्रकरण के बाद उनके लगातार क्षेत्रीय दौरे इस बात का संकेत माने जा रहे हैं कि वे जमीनी स्तर पर सक्रियता बढ़ाकर किसी भी राजनीतिक हमले का जवाब तैयार रखना चाहते हैं।
विभागीय स्तर पर भी वरिष्ठ अधिकारियों की सक्रियता बढ़ी है। सिंचाई और पेयजल से जुड़े प्रशासनिक अधिकारी फील्ड निरीक्षणों में जुटे हैं। माना जा रहा है कि सरकार चाहती है कि यदि सदन में कोई सवाल उठे तो ठोस तथ्यात्मक जवाब उपलब्ध हों। राजनीति के जानकार कहते हैं कि योजनाओं की सफलता केवल घोषणा से नहीं, बल्कि जमीनी गुणवत्ता से तय होती है और यही बिंदु अक्सर विपक्ष को हमला करने का अवसर देता है।
संकेत यही हैं कि मानसून या बजट सत्र के दौरान जल जीवन मिशन पर फिर चर्चा होगी। हालांकि यह बहस कितनी तीखी होगी, यह काफी हद तक सदन की कार्यवाही और नेतृत्व की रणनीति पर निर्भर करेगा। यदि विपक्ष इसे बड़े मुद्दे के रूप में उठाता है तो सरकार आंकड़ों और निरीक्षण रिपोर्टों के साथ जवाब देगी। वहीं यदि संवाद का स्वर संयमित रहा तो चर्चा नीति और क्रियान्वयन तक सीमित रह सकती है।
Published on:
09 Feb 2026 09:41 am
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