
Sindhi samaj
कटनी. आजादी के 78 वर्ष बीत जाने के बाद भी कटनी शहर के माधवनगर क्षेत्र में निवासरत पश्चिमी पाकिस्तान (सिंध प्रांत) से आए करीब पांच हजार सिंधी परिवार आज भी अपनी ही जमीन के मालिक नहीं बन सके हैं। देश के बंटवारे के बाद जिन जमीनों पर इन परिवारों को पुनर्वास के तहत बसाया गया, उन्हें नजूल में दर्ज किए जाने के बावजूद प्रशासनिक लापरवाही और अफसरशाही की उदासीनता के चलते आज तक पट्टे जारी नहीं हो पाए हैं।
हर चुनाव में नेताओं द्वारा बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, मंचों से भरोसे दिलाए जाते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि ये विस्थापित परिवार सिर्फ वोट बैंक बनकर रह गए हैं। कटनी में इनकी दूसरी और तीसरी पीढ़ी जवान हो चुकी है, कई बुजुर्ग दुनिया छोड़ चुके हैं, मगर जमीन के मालिकाना हक का इंतजार आज भी अधूरा है। दशकों से अपने हक के लिए भटक रहे सिंधी परिवार आज भी प्रशासन की चौखट पर न्याय की उम्मीद लगाए बैठे हैं। सवाल यह है कि आखिर इन परिवारों का इंतजार कब खत्म होगा और उन्हें उनका वैधानिक अधिकार कब मिलेगा?
जानकारी के अनुसार तहसीलदार और एसडीएम स्तर पर जांच की प्रक्रिया वर्षों से अटकी हुई है। अब तक बड़ी संख्या में प्रकरण कलेक्ट्रेट तक भी नहीं पहुंच पाए हैं। यह समस्या एसडीएम एवं तहसीलदार कार्यालय कटनी, एसडीएम एवं तहसीलदार कार्यालय विजयराघवगढ़ दोनों ही स्तरों पर बनी हुई है। वर्तमान में लगभग 2 हजार 800 प्रकरण लंबित पड़े हैं, जिससे सिंधी समाज में गहरा आक्रोश और निराशा व्याप्त है। चौंकाने वाली बात यह है कि आरओ मीटिंग के दौरान कलेक्टर आशीष तिवारी द्वारा स्पष्ट निर्देश दिए जाने के बावजूद जमीनी स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई होती नहीं दिख रही है। अफसरों की सुस्ती और टालमटोल ने हजारों परिवारों के जीवन को अनिश्चितता में डाल दिया है।
शहर के छह वार्डों में फैले इन परिवारों ने पिछले डेढ़ साल में 4722 आवेदन जमा किए, लेकिन सिर्फ 300 को ही पट्टा मिला है। 1972 से 1984 के बीच 1,711 पट्टे बंटे थे, लेकिन उसके बाद से प्रक्रिया रुक गई। 2014-15 के सर्वे में सामने आया कि पुनर्वास की 4,331 प्लॉट्स में से 1,711 पट्टेदारों के पास हैं, 1,862 लोग रिक्त प्लॉट्स पर काबिज हैं, और 805 लोग बची जमीन पर रह रहे हैं। कुल 2,667 काबिजदार, फिर भी हक से वंचित हैं।
सरकार ने पिछले सालों में पुनर्वास की जमीन को नजूल में बदलकर धारणाधिकार योजना के तहत पट्टे देने की स्कीम शुरू की। 1 जून 2023 से 31 जुलाई 2023 तक आवेदन लिए गए। योजना के तहत 150 वर्गमीटर तक के आवासीय भूखंड के लिए 1 फीसदी प्रीमियम और वार्षिक भू-भाटक, 200 वर्गमीटर तक के लिए बाजार मूल्य के बराबर प्रीमियम, और व्यावसायिक भूखंड (20 वर्गमीटर तक) के लिए 5 फीसदी प्रीमियम तय किया गया, लेकिन अफसरों की सुस्ती से यह योजना धरी की धरी रह गई।
जानकारी के अनुसार आरसीएमएस में पट्टे के लिए 4722 आवेदन दर्ज किए गए। नजूल शाखा से 4064 प्रकरण तैयार हुए। जांच के बाद 2772 प्रकरण बने। आवेदनों में कुछ कमी के चलते 447 प्रकरण फिर वापस कर दिए गए। 1739 प्रकरण फिर जांच के लिए भेज दिए गए। इसी प्रकार विजयराघवगढ़ अनुभाग में 580 आवेदन हुए, नजूल शाखा में 560 प्रकरण पहुंचे। जांच के उपरांत 308 प्रकरण बचे। 122 में दस्तावेजों की कमी पूरी करने कह दिया गया और फिर से जांच के लिए 186 प्रकरण भेज दिए गए।
- 5303 प्रकरण दर्ज हुए आरसीएमएस पोर्टल पर
- 4624 प्रकरण नजूल शाखा में हुए प्रस्तुत
- 3080 प्रकरण जांच के बाद हुए तैयार
- 2891 प्रकरण में फिर से कराई जा रही जांच
- 400 प्रकरण में स्वीकृत हुए है पट्टे
- 2147 प्रकरण कर दिए गए हैं अस्वीकार
- 2547 प्रकरण का किया गया है निराकरण
सिंधी सेंट्रल पंचायत के अध्यक्ष वीरेंद्र तीर्थानी कहते हैं कि हमने सिंध में सब कुछ छोडकऱ भारत में शरण ली थी। पुनर्वास का वादा मिला, लेकिन 78 साल बाद भी हजारों परिवारों को मालिकाना हक नहीं मिला। शासन सोया पड़ा है। धारा अधिकारी के तहत भी पट्टे नहीं दिए जा रहे हैं। 1994 के बाद एक भी पट्टे नहीं मिले। धारणा अधिकार के तहत योजना बनाई, लेकिन सिर्फ छलावा किया जा रहा है। सीएम द्वारा कई बार घोषणाएं कीं और आश्वासन दिए गए, लेकिन समाधान नहीं हो रहा। 399 एकड़ जमीन पुनर्वास के तहत आरक्षित थी। इसको नजूल में परिवर्तित कर दिया गया। सुनवाई न होने से समाज के लोग हताश हो गए हैं।
धारणाधिकार के तहत नजूल भूमि पर प्रीमियम राशि व भू-भाटक के आधार पर पट्टा दिया जाना है। सिंधी समाज के द्वारा करीब 4064 आवेदन किए गए है, जिसमें आवेदनों की जांच जारी है। 2800 से अधिक प्रकरण में तहसीलदार व एसडीएम से जांच प्रतिवेदन मंगाए जा रहे हैं। जल्द ही और पट्टों के वितरण की प्रक्रिया पूरी कराई जाएगी।
Published on:
11 Jan 2026 11:40 am
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