
26 साल बाद मिला इंसाफ (फोटो-एआई)
जोधपुर: राजस्थान उच्च न्यायालय ने 26 साल पुराने एक सड़क हादसे के मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए एक सात साल के बच्चे (अब वयस्क) को दिए जाने वाले मुआवजे की राशि को 1.06 लाख से बढ़ाकर 15.15 लाख कर दिया है। अदालत ने माना कि दो दशक पहले ट्रिब्यूनल द्वारा तय किया गया मुआवजा पीड़ित को हुई गंभीर शारीरिक क्षति और उसके जीवन भर के संघर्ष के सामने बेहद कम था।
मामले की जड़ें 12 मई, 1999 की एक दुखद घटना से जुड़ी हैं। जोधपुर में सात वर्षीय मुकेश एक ट्रक की चपेट में आ गया था। प्रत्यक्षदर्शियों और अदालती दस्तावेजों के अनुसार, ट्रक चालक पृथ्वी सिंह बड़ी लापरवाही और तेज गति से वाहन चला रहा था। इस जोरदार टक्कर ने न केवल मुकेश के शरीर को तोड़ दिया, बल्कि उसके बचपन को भी मलबे में बदल दिया।
हादसे के बाद मुकेश के शरीर पर आठ साधारण चोटों के अलावा कई गंभीर फ्रैक्चर हुए थे। दोनों पैरों की टिबिया और हड्डियों में फ्रैक्चर, फिबुला हड्डी में फ्रैक्चर, जांघ की हड्डी में फ्रैक्चर हुआ था। मुकेश को 54 दिनों तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा और लंबे समय तक उसका इलाज चला।
इस हादसे ने उसे 29% स्थायी विकलांगता के साथ जीने पर मजबूर कर दिया। मध्यमवर्गीय परिवार के लिए इलाज का खर्च और बच्चे का भविष्य एक बड़ी चुनौती बन गया था।
मुकेश के परिवार ने न्याय के लिए मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण, जोधपुर का दरवाजा खटखटाया। जनवरी 2004 में ट्रिब्यूनल ने मुकेश को 1,06,000 का मुआवजा देने का आदेश दिया। हालांकि, परिवार इस राशि से संतुष्ट नहीं था। उनका तर्क था कि यह मामूली रकम उस दर्द, भविष्य की कमाई की क्षमता में कमी और शादी की संभावनाओं पर पड़े असर की भरपाई के लिए पर्याप्त नहीं है।
इसके बाद मुकेश ने राजस्थान उच्च न्यायालय में अपील दायर की। यह कानूनी लड़ाई 2026 तक चली, जिसमें मुकेश के वकीलों श्रेयांश राठी और निशित शाह ने मजबूती से पक्ष रखा कि मुआवजे का निर्धारण आधुनिक कानूनी मानकों और महंगाई के अनुरूप होना चाहिए।
इस फैसले में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ सुप्रीम कोर्ट का 2025 का एक ऐतिहासिक फैसला रहा, हितेश नागजीभाई पटेल बनाम बाभाभाई नागजीभाई रबारी। दरअसल, पहले अदालतों में बच्चों को 'गैर-कमाऊ' सदस्य मानकर बहुत कम मुआवजा दिया जाता था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि किसी बच्चे की भविष्य की क्षमता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने आदेश दिया कि बच्चों के मुआवजे की गणना 'कुशल श्रमिक' की न्यूनतम मजदूरी के आधार पर की जानी चाहिए। इसी सिद्धांत को आधार बनाकर राजस्थान हाईकोर्ट ने मुकेश के मामले में मुआवजे की राशि का पुनर्मूल्यांकन किया।
अदालत ने यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को आदेश दिया है कि वह पहले से भुगतान किए गए 1.06 लाख के अलावा शेष 14,09,773 की अतिरिक्त राशि का भुगतान करे। सबसे राहत की बात यह है कि इस बढ़ी हुई राशि पर दावा याचिका दायर करने की तारीख से भुगतान होने तक 6 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से ब्याज भी देय होगा।
26 साल बाद आया यह फैसला न केवल मुकेश के लिए एक बड़ी राहत है, बल्कि यह कानून के क्रमिक विकास को भी दर्शाता है। 1999 में जो बच्चा सात साल का था, वह आज एक वयस्क है, जिसने अपना पूरा युवा काल इस शारीरिक अक्षमता और अदालती चक्करों में बिता दिया।
राजस्थान उच्च न्यायालय का यह निर्णय समाज को संदेश देता है कि दुर्घटना के मामलों में मुआवजा केवल 'खर्चा' नहीं है। बल्कि यह पीड़ित के सम्मान और उसके छीने गए भविष्य की एक छोटी सी भरपाई है। यह फैसला भविष्य में इसी तरह के हजारों बच्चों के लिए एक कानूनी मिसाल बनेगा।
| मद (Head) | मुआवजा राशि (₹) |
|---|---|
| स्थायी विकलांगता (Permanent Disability) | ₹2,63,900 |
| भविष्य की संभावनाएं (Future Prospects) | ₹1,78,899 |
| विवाह की संभावनाओं का नुकसान | ₹3,00,000 |
| जीवन की सुख-सुविधाओं का नुकसान | ₹2,00,000 |
| विशेष आहार और परिवहन | ₹1,00,000 |
| दर्द और मानसिक पीड़ा (Pain and Suffering) | ₹2,89,274 |
| भविष्य का चिकित्सा खर्च | ₹50,000 |
| अटेंडेंट (देखभाल) शुल्क | ₹16,200 |
| संपत्ति का नुकसान | ₹19,500 |
| कुल मुआवजा | ₹15,15,773 |
Updated on:
13 Feb 2026 08:30 pm
Published on:
13 Feb 2026 08:29 pm
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