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गड़ीसर : करोड़ों के सौंदर्यीकरण में विरासत संरक्षण की अनदेखी

सोनार दुर्ग के साथ जैसलमेर की पहचान माने जाने वाले कलात्मक गड़ीसर सरोवर की छटा बढ़ाने वाली ऐतिहासिक छतरियां और पानी के मध्य में स्थित बंगली लंबे समय से बदहाली का दंश झेल रही हैं।

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सोनार दुर्ग के साथ जैसलमेर की पहचान माने जाने वाले कलात्मक गड़ीसर सरोवर की छटा बढ़ाने वाली ऐतिहासिक छतरियां और पानी के मध्य में स्थित बंगली लंबे समय से बदहाली का दंश झेल रही हैं। गड़ीसर की शोभा में चार चांद लगाने वाली छतरियां व बंगली आज जर्जर हालत में पहुंच चुकी हैं, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से सरोवर के सौंदर्यीकरण पर करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद इस विरासत की सुध लेने वाला कोई नजर नहीं आ रहा। गड़ीसर सरोवर केवल एक जलाशय नहीं, बल्कि जैसलमेर की स्थापत्य कला, लोक आस्था और इतिहास का जीवंत प्रतीक है। इसके चारों ओर बनी छतरियां और बीच की बंगली न केवल सौंदर्य को बढ़ाती थीं, बल्कि रियासतकालीन स्थापत्य की बारीक झलक भी पेश करती थीं। समय के साथ इन पर मौसम की मार, उपेक्षा और मरम्मत के अभाव ने गहरी चोट की है। कई छतरियों की छतों में दरारें पड़ चुकी हैं, पत्थरों की नक्काशी रंगत खो रही है और उसके सहित बंगली की दीवारें व सीढिय़ां भी जगह-जगह से कमजोर हो चुकी हैं।

हर जगह करम, यहां सितम

विडंबना यह है कि हाल के वर्षों में गड़ीसर सरोवर के नाम पर विभिन्न योजनाओं के तहत सौंदर्यीकरण, लाइटिंग, पाथवे, घाटों के नवीनीकरण और अन्य कार्यों पर करोड़ों रुपए की बड़ी राशि खर्च की जा रही है। बावजूद इसके, मूल ऐतिहासिक संरचनाओं के संरक्षण को प्राथमिकता में शामिल नहीं किया गया। नतीजतन, जो धरोहर सरोवर की आत्मा मानी जाती है, वह धीरे-धीरे दम तोड़ती जा रही है।

जिनकी जिम्मेदारी, वे उदासीन

गड़ीसर सरोवर के भीतरी हिस्से की देखभाल का जिम्मा राजस्थान सरकार के कला एवं संस्कृति विभाग के पास रहा है। यह विभाग छतरियों व बीच बंगली जैसी धरोहरों के संरक्षण के प्रति एकदम उदासीन ही रहा है। कई बार लोगों के साथ सरकारी तंत्र की तरफ से भी विभाग का ध्यान इस ओर आकृष्ट करवाया गया। समय रहते ध्यान नहीं दिए जाने से प्रतिवर्ष छतरियां व बंगली निरंतर क्षतिग्रस्त होती जा रही है।

विशेषज्ञ की राय

जैसलमेर के सामाजिक कार्यकर्ता चन्द्रशेखर थानवी कहते हैं कि यदि समय रहते इन छतरियों और बंगली का संरक्षण नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में इनका अस्तित्व ही खतरे में आ जाएगा। इससे न केवल जैसलमेर की सांस्कृतिक पहचान को नुकसान पहुंचेगा, बल्कि पर्यटन की दृष्टि से भी यह एक बड़ा झटका होगा। विदेशी और घरेलू सैलानी गड़ीसर सरोवर को उसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और कलात्मक सौंदर्य के कारण ही देखने आते हैं।