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Swami Vivekananda Jayanti: खेतड़ी के राजा ने ‘स्वामी विवेकानंद’ से किया था ये अनुरोध, कई बार आए थे राजस्थान

Swami Vivekananda's Original Name: स्वामी विवेकानंद का नाम भारतीय इतिहास में हमेशा अमर रहेगा, लेकिन क्या आप जानते हैं कि उनके नाम बदलने की दिलचस्प कहानी राजस्थान से जुड़ी है?

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Swami Vivekanand

Photo: Patrika

National Youth Day 2026: स्वामी विवेकानंद का नाम भारतीय समाज और संस्कृति में हमेशा अमर रहेगा लेकिन क्या आप जानते हैं कि उनके नाम को बदलने की एक दिलचस्प कहानी राजस्थान से जुड़ी है। स्वामी विवेकानंद के नाम में बदलाव करने का श्रेय राजस्थान के खेतड़ी के राजा अजित सिंह को जाता है।

राजा अजित सिंह ने किया था विशेष अनुरोध

स्वामी विवेकानंद का नाम पहले नरेंद्रनाथ था, और वे एक समय में 'विविदिषानंद' या 'सच्चिदानंद' जैसे नामों से भी प्रसिद्ध थे। लेकिन राजस्थान के शेखावटी अंचल के खेतड़ी के राजा अजित सिंह ने स्वामी विवेकानंद से एक विशेष अनुरोध किया। राजा ने उनसे कहा कि वे अपने नाम में बदलाव करें और 'विवेकानंद' नाम अपनाएं। स्वामी जी ने इसे सहर्ष स्वीकार किया और अपने जीवन का यह नया नाम धारण किया।

स्वामी विवेकानंद ने 21 अप्रैल 1893 को अपनी दूसरी बार खेतड़ी यात्रा के दौरान राजा अजित सिंह से मुलाकात की थी। इससे पहले वे 7 अगस्त 1891 से लेकर 27 अक्टूबर 1891 तक खेतड़ी में रह चुके थे। स्वामी जी की शिकागो यात्रा से पहले ये उनका खेतड़ी दौरा था। इस यात्रा के दौरान उनके नाम में परिवर्तन के साथ राजा अजित सिंह ने उन्हें उनकी पोशाक, पगड़ी और शिकागो यात्रा के लिए टिकट भी दिया था।

राजस्थान से था स्वामी विवेकानंद का गहरा नाता

स्वामी विवेकानंद का राजस्थान के कई प्रमुख स्थानों से गहरा जुड़ाव रहा। उन्होंने कई बार राजस्थान के विभिन्न हिस्सों का दौरा किया। वे दिल्ली से दो बार अलवर गए। पहले 1891 में और फिर 1897 में। इसके साथ ही तीन बार 1891, 1893 और 1897 में वे जयपुर में भी आए। जयपुर से स्वामी जी किशनगढ़ और अजमेर गए, जहां वे 1891 में चार दिन रुके थे।

विवेकानंद स्वामी माउंट आबू में 1891 में 91 दिन रहे और वहां उन्होंने खेतड़ी के राजा अजित सिंह से मुलाकात की थी। जिसके बाद स्वामी विवेकानंद ने खेतड़ी में 1891, 1893 और 1897 में कुल 109 दिन बिताए थे। ये उनका सबसे पसंदीदा स्थान था। 1897 में स्वामी विवेकानंद जोधपुर भी गए थे और वहां के राजा प्रताप सिंह के अतिथि के रूप में 10 दिन रहे।

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