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जयपुर में साहित्यिक महाकुंभ: आठ प्रतिष्ठित लेखकों को ‘शमशेर सम्मान’, सादगी और सृजन का संगम

मध्यप्रदेश के खंडवा स्थित साहित्यिक संस्था अनवरत संस्था द्वारा विगत तीन दशकों से निरंतर प्रदान किए जा रहे शमशेर सम्मान से आज देश के आठ प्रतिष्ठित रचनाकारों को सम्मानित किया गया। जयपुर के प्रौढ़ शिक्षण समिति के सभागार में आयोजित गरिमामय समारोह में साहित्य, कविता और आलोचना के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले रचनाकारों को यह सम्मान प्रदान किया गया।

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जयपुर में शनिवार को साहित्यकारों का बड़ा जमावड़ा देखने को मिला। मौका था 1994 से निरंतर प्रदान किए जा रहे 'शमशेर सम्मान' का। इस वर्ष, वर्ष 2021 से 2024 तक के बकाया और वर्तमान पुरस्कारों की श्रृंखला में ए. अरविंदाक्षन, रविभूषण, सवाईसिंह शेखावत, डॉ. भरत प्रसाद, असंगघोष, भालचंद्र जोशी, अनिल मिश्र और डॉ. दुर्गाप्रसाद गुप्त को सम्मानित किया गया।

बिना किसी 'पूंजीवादी चकाचौंध' के निरंतरता का प्रतीक

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वरिष्ठ कथाकार डॉ. जितेंद्र भाटिया ने इस सम्मान की प्रामाणिकता पर जोर देते हुए कहा:

  • निस्वार्थ प्रयास: इस सम्मान के पीछे न तो कोई पूंजीवादी प्रायोजन है और न ही कोई संस्थागत महत्वाकांक्षा। यह केवल संवेदनशील लेखन को रेखांकित करने की एक ईमानदार कोशिश है।
  • युवाओं को संदेश: डॉ. भाटिया ने युवा लेखकों को चेताया कि वे 'शॉर्टकट' और तात्कालिक प्रसिद्धि के पीछे भागने के बजाय रचनात्मक अनुशासन अपनाएं।

शमशेर: हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी का संगम

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रख्यात साहित्यकार डॉ. हेतु भारद्वाज ने शमशेर बहादुर सिंह के व्यक्तित्व के उन पहलुओं को छुआ जो आज की पीढ़ी के लिए अनछुए हैं।

  • बहुभाषी प्रतिभा: शमशेर न केवल हिंदी के पुरोधा थे, बल्कि उन्होंने उर्दू भाषा को जीवित रखने के लिए ऐतिहासिक प्रयास किए। वे अंग्रेजी में भी कविताएं लिखते थे।
  • काल से मुठभेड़: डॉ. हेतु ने शमशेर की प्रसिद्ध पंक्ति "काल तुझसे होड़ है मेरी" का उल्लेख करते हुए बताया कि उन्होंने अपने पूरे कालखंड की चेतना को अपनी कविताओं में समेटा।

बिंबों के सम्राट और प्रगतिशील चेतना

वरिष्ठ लेखकों ने शमशेर की काव्य कला पर गहराई से चर्चा की।

  • नवल के दुबे ने कहा कि शमशेर के बिंब इतने जीवंत हैं कि नई कविता में वैसी सघनता विरल है। उनके काव्य में साम्यवाद, प्रगतिवाद और प्रयोगवाद का अद्भुत समन्वय मिलता है।
  • रविभूषण ने शमशेर को प्रगतिशील कविता के ‘पंच महाभूतों’ में से एक बताते हुए कहा कि वे आज भी उतने ही जरूरी और समकालीन हैं जितने अपने समय में थे।

पुरस्कारों के अवमूल्यन के दौर में एक 'आश्वस्ति'

वरिष्ठ कथाकार भालचंद्र जोशी ने आज के दौर में पुरस्कारों की बाढ़ और उनकी गिरती साख पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जिस दौर में सम्मान देने की होड़ लगी है, वहां शमशेर सम्मान की निरंतरता और प्रतिबद्धता साहित्य जगत के लिए एक बड़ा भरोसा है।

खंडवा से जयपुर तक का सफर

संस्था के संयोजक प्रताप राव कदम ने भावुक होते हुए बताया कि 1994 में खंडवा जैसे छोटे शहर से शुरू हुआ यह सफर आज 50 से अधिक रचनाकारों को विभूषित कर चुका है। संसाधनों की कमी के बावजूद संस्था ने अपने साहित्यिक दायित्व को कभी झुकने नहीं दिया।

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