
राज कुमार सिंह, वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक - हर सत्र के बाद जारी किए जाने वाले कामकाज के आंकड़ों से इतर याद नहीं पड़ता कि हाल के वर्षों में संसद का कोई सत्र बिना व्यवधान सुचारू चल पाया हो। इससे विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के सदन की साख बढ़ती तो हरगिज नहीं। जारी बजट सत्र में जो कुछ हो रहा है, वह हमारे राजनीतिक दलों के संसदीय आचरण पर गंभीर सवाल खड़े करता है। बहुदलीय लोकतंत्र में राजनीतिक मतभेद संसद में भी परिलक्षित होना स्वाभाविक है, लेकिन उसमें संसदीय गरिमा और परंपराओं की लक्ष्मण रेखा लांघना स्वीकार्य नहीं हो सकता। संसद के अंदर और बाहर की राजनीति के तर्कों और तेवरों के बीच अंतर मिटना सकारात्मक संकेत नहीं है। धरना-प्रदर्शन-नारेबाजी सदन से बाहर स्वीकार्य राजनीतिक औजार हैं, पर सदन में आसन पर कागज फाड़कर उछालना तो स्वीकार्य नहीं हो सकता, जिसके चलते विपक्ष के आठ सांसदों को सत्र की शेष अवधि के लिए निलंबित कर दिया गया। बेशक लगातार बढ़ती राजनीतिक कटुता के लिए किसी एक दल को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन पाक-साफ भी कोई नहीं नजर आता।
संसद का बजट सत्र राष्ट्रपति के अभिभाषण से शुरू होने की परंपरा है। व्यापक चर्चा और उस पर प्रधानमंत्री के जवाब के बाद धन्यवाद प्रस्ताव पारित होता है, लेकिन इस बार लोकसभा में ऐसा नहीं हुआ। 2004 के बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि प्रधानमंत्री के जवाब के बिना ही पांच फरवरी को ध्वनि मत से धन्यवाद प्रस्ताव पारित करना पड़ा। हालांकि उसी दिन राज्यसभा में प्रधानमंत्री ने जवाब दिया। दरअसल इस बार अभिभाषण पर चर्चा का जवाब प्रधानमंत्री को चार फरवरी की शाम पांच बजे देना था, लेकिन चर्चा के दौरान नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को अपनी बात कहने का मौका न मिलने के जवाब में विपक्षी हंगामे के चलते सदन स्थगित करना पड़ा। विपक्ष का संदेश था कि अगर उसके नेता को नहीं बोलने दिया गया तो वह भी सदन के नेता यानी प्रधानमंत्री को नहीं बोलने देंगे, पर इस टकरावपूर्ण राजनीति से दांव पर संसद की साख लग रही है।
संसद में राष्ट्रपति और विधानमंडलों में राज्यपाल क्रमश: केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से मंजूर अभिभाषण ही पढ़ते हैं। इनमें सरकारों के कामकाम की प्रशंसा करते हुए भविष्य की रूपरेखा बताई जाती है। अभिभाषण में उल्लेखित सभी बिंदुओं पर सदन में चर्चा हो सकती है, लेकिन उसकी कुछ प्रकियाएं-परंपराएं हैं। जब परस्पर अविश्वास और कटुता चरम पर हो, तो तकरार के लिए मुद्दों की कमी नहीं रहती, लेकिन संसद के बजट सत्र में सत्तापक्ष और विपक्ष में जारी तकरार के मूल नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा चर्चा में पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की प्रकाशनाधीन पुस्तक 'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी' के कुछ अंशों का उल्लेख कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश है। तीन फरवरी को लोकसभा में राहुल गांधी को पुस्तक के अंश पढऩे से रोकने के लिए तर्क दिया गया था कि जो पुस्तक अभी तक प्रकाशित ही नहीं हुई, उसका हवाला संसदीय चर्चा में नहीं दिया जा सकता। अगले दिन राहुल पुस्तक की प्रति लेकर संसद पहुंच गए और प्रधानमंत्री को भेंट करने का इरादा जताया तो धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा का प्रधानमंत्री द्वारा शाम पांच बजे के लिए तय जवाब के बिना ही हंगामे के बीच सदन स्थगित हो गया।
प्रधानमंत्री के जवाब बिना ही धन्यवाद प्रस्ताव पारित होने की स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण इसलिए भी है कि इससे बचा जा सकता था। तनातनी बढ़ाने के बजाय स्पीकर की मध्यस्थता से दोनों ही पक्षों को मध्य मार्ग निकालना चाहिए था। राहुल गांधी को पुस्तक का जिक्र किए बिना ही सदन में चीनी सामरिक चुनौती पर मोदी सरकार की जवाबी रणनीति पर सवालिया निशान लगाते हुए बाहर प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रधानमंत्री को कठघरे में खड़ा करने के लिए समझाया जा सकता था। दरअसल दोनों ही पक्षों में समन्वय के बजाय टकराव की राजनीति पसंद करने वाले लोग ज्यादा मुखर और प्रभावी नजर आते हैं। चार फरवरी को कुछ पुस्तकों के आधार पर निशिकांत दुबे की टिप्पणियों के बजाय दोनों पक्षों में संसदीय हित में समझदारी की कोशिश की जाती तो शायद धन्यवाद प्रस्ताव पर प्रधानमंत्री लोकसभा में जवाब दे पाते।
सदन में राज्यसभा के नेता जगत प्रकाश नड्डा और विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे की टिप्पणियां बताती हैं कि संसदीय लोकतंत्र के आधार माने जाने वाले सत्तापक्ष और विपक्ष के परस्पर संबंध कितने रसातल में चले गए हैं। राहुल गांधी नेता प्रतिपक्ष के रूप में अपने अधिकारों के प्रति अक्सर संवेदनशील नजर आते हैं, पर उस भूमिका में उनके देश के प्रति दायित्वों की चिंता कौन करेगा? माना कि संसद की कार्यवाही चलाने की जिम्मेदारी मुख्यत: सत्तापक्ष की मानी जाती है, लेकिन तेजी से बदलती विश्व व्यवस्था में सामरिक ही नहीं, भू-राजनीतिक और आर्थिक चुनौतियों के भंवर से देश को पार ले जाने की जिम्मेदारी सामूहिक है। सत्तापक्ष पर सवाल और आरोप उछालकर ही विपक्ष अपनी इस जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता। निश्चय ही ऐसी भूमिकाओं के लिए निर्वाह के लिए इन सभी विषयों की गहरी समझ के साथ ही धैर्य व दूरदर्शिता की जरूरत होती है। चुनावी सफलता पर केंद्रित आज में जीने वाली राजनीति देश बनाना तो दूर, उसे ठीक से चला भी नहीं सकती। इतनी व्यावहारिक समझ जरूरी है कि न तो विपक्ष देश का प्रधानमंत्री चुन सकता है और न ही सत्तापक्ष, प्रतिपक्ष का नेता। इसलिए सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेतृत्व को विघ्नसंतोषियों को दरकिनार कर सीधे संवाद व संपर्क से अहम मुद्दों पर सहमति और समन्वय की राह निकालनी चाहिए।
Published on:
06 Feb 2026 03:30 pm
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