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सावधान! आपके लाडले की आंखों की रोशनी छीन रहा है मोबाइल: SMS अस्पताल की OPD में हर दिन पहुंच रहे 70 बच्चे

अगर आपका बच्चा मोबाइल के बिना खाना नहीं खाता या बात-बात पर चिड़चिड़ा होकर तोड़-फोड़ करने लगता है, तो सावधान हो जाइए।

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मनीष चतुर्वेदी

जयपुर। अगर आपका बच्चा मोबाइल के बिना खाना नहीं खाता या बात-बात पर चिड़चिड़ा होकर तोड़-फोड़ करने लगता है, तो सावधान हो जाइए। डिजिटल स्क्रीन की यह लत आपके नौनिहाल को अंधेरे की ओर धकेल रही है। सवाई मानसिंह अस्पताल में हर साल करीब 25 हजार बच्चे आंखों की गंभीर बीमारियों के साथ ओपीडी पहुंच रहे हैं। यहां हर दिन आई-ओपीडी में करीब 700 मरीज आ रहे हैं। इनमें से 10 फीसदी यानी लगभग 70 बच्चे आंखों की समस्याओं से जूझ रहे हैं। यह स्थिति तब है जब यह डेटा सिर्फ एक सरकारी अस्पताल का है। निजी अस्पतालों और अन्य जिलों के आंकड़े मिला दिए जाएं तो यह संख्या लाखों में पहुंच सकती है। हाल ही में कर्नाटक सरकार ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए मोबाइल के इस्तेमाल पर कड़े निर्देश जारी किए हैं। राजस्थान में भी अभिभावक संघ अब लामबंद होकर ऐसी ही मांग कर रहे हैं।

5 से 15 साल के बच्चों को ज्यादा खतरा


एसएमएस अस्पताल के नेत्ररोग विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. नगेंद्र सिंह शेखावत ने बताया कि मोबाइल की लत बीमारी नहीं, महामारी है। इसका सबसे बुरा असर 5 से 15 साल की उम्र के बच्चों पर पड़ रहा है। इस उम्र में आंखों का विकास हो रहा होता है, लेकिन घंटों स्क्रीन से निकलने वाली 'ब्लू लाइट' कॉर्निया और रेटिना को नुकसान पहुंचा रही है। छोटे बच्चे अब मैदान में खेलने के बजाय वर्चुअल गेम्स में उलझे हैं, जिससे उनकी शारीरिक और मानसिक सेहत दांव पर है।

मायोपिया से लेकर फोटोफोबिया तक बीमारियां


मोबाइल के अत्यधिक उपयोग से बच्चों में कई तरह की आंखों की बीमारियां बढ़ रही हैं। इनमें मायोपिया (नजदीक की नजर कमजोर होना), डिजिटल आई स्ट्रेन, ड्राई आई सिंड्रोम, आंखों में जलन, खुजली, धुंधला दिखना, सिरदर्द, फोटोफोबिया (रोशनी से परेशानी), आंखों का लाल होना और आंखों में पानी आना जैसी समस्याएं शामिल हैं।

चैट-जीपीटी और डिजिटल होमवर्क ने बढ़ाई मुसीबत


इस समस्या के लिए स्कूल प्रबंधन और आधुनिक शिक्षण पद्धति को भी जिम्मेदार माना जा रहा है। स्कूल से मिलने वाला होमवर्क अब डिजिटल हो गया है। उदाहरण के तौर पर, यदि शिक्षक 'नागालैंड की संस्कृति' पर लिखने को कहते हैं, तो बच्चा सीधे चैट-जीपीटी का सहारा लेता है। इससे स्क्रीन टाइम बढ़ गया है और बच्चों की मौलिक सोच खत्म हो रही है।

कर्नाटक में लगा बैन, राजस्थान में भी उठी मांग


बच्चों के भविष्य को देखते हुए कर्नाटक सरकार ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए मोबाइल के इस्तेमाल पर कड़े निर्देश जारी किए हैं। अब राजस्थान में भी अभिभावक संघ लामबंद हो रहा है। मांग उठ रही है कि प्रदेश में भी 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए मोबाइल और सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग पर कानूनी प्रतिबंध लगाया जाए।