
आरयूएचएस कॉलेज। फोटो: पत्रिका
‘एलर्जीनियस 2.0’ के मंच से एलर्जिक रोगों के प्रभावी उपचार और प्रशिक्षण का संकल्प
जयपुर। देश में एलर्जिक रोग तेजी से गंभीर स्वास्थ्य चुनौती के रूप में उभर रहे हैं। वर्तमान में भारत की लगभग एक-तिहाई जनसंख्या किसी न किसी एलर्जी से प्रभावित है। इसी बढ़ते रोग-भार को दृष्टिगत रखते हुए राजस्थान यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज़ (आरयूएचएस), जयपुर में 24 एवं 25 जनवरी को “एलर्जीनियस 2.0 – एलर्जी चिकित्सा में प्रगति” विषय पर एक उन्नत शैक्षणिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
इस कार्यक्रम का उद्देश्य एलर्जिक राइनाइटिस, दमा, खाद्य एलर्जी तथा औषधि एलर्जी जैसे रोगों के वैज्ञानिक एवं मानकीकृत उपचार को सुदृढ़ करना था। कार्यक्रम का नेतृत्व डॉ. मोहनीश ग्रोवर, डॉ. गौरव गुप्ता एवं डॉ. राघव मेहता ने किया, जबकि आयोजन सचिव के रूप में डॉ. रश्मि अग्रवाल, डॉ. आशिमा सक्सेना एवं डॉ. अनुपम कनोड़िया ने महत्वपूर्ण योगदान दिया।
कार्यक्रम के दौरान आरयूएचएस के माननीय कुलपति डॉ. प्रमोद येवले ने एलर्जीनियस 2.0 की शैक्षणिक गुणवत्ता की सराहना करते हुए विश्वविद्यालय परिसर में अत्याधुनिक एलर्जी चिकित्सालय की स्थापना की घोषणा की। उन्होंने बताया कि यह चिकित्सालय आगामी एक माह के भीतर प्रारंभ किया जाएगा, जहां एलर्जिक रोगों का वैज्ञानिक निदान, समुचित उपचार एवं नियमित अनुवर्ती देखभाल की समर्पित व्यवस्था होगी। यह सुविधा एलर्जी से पीड़ित रोगियों के लिए बड़ी राहत सिद्ध होगी।
कार्यक्रम के संरक्षक डॉ. विनोद जोशी ने एलर्जी चिकित्सा में दक्ष मानव संसाधन विकसित करने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि ऐसे शैक्षणिक प्रयास बढ़ते एलर्जिक रोगों और प्रशिक्षित चिकित्सकों की कमी के बीच की दूरी को कम करने में सहायक हैं। आरयूएचएस के अधीक्षक डॉ. अनिल गुप्ता ने अंतर्विभागीय समन्वय, व्यावहारिक प्रशिक्षण और सतत चिकित्सा शिक्षा के महत्व को बताया। सम्मेलन में मलेशिया, सिंगापुर, थाईलैंड एवं ब्रिटेन से आए अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने एलर्जी निदान और उपचार से संबंधित नवीन शोध एवं वैश्विक अनुभव साझा किए। साथ ही देश के विभिन्न राज्यों से आए विशेषज्ञों ने भारतीय परिस्थितियों में एलर्जी प्रबंधन पर सार्थक विमर्श किया। शैक्षणिक सत्रों में एलर्जी परीक्षण विधियां, त्वचा परीक्षण, श्वसन क्षमता परीक्षण, औषधीय उपचार, शल्य चिकित्सा की भूमिका तथा एलर्जी से जुड़ी भ्रांतियों पर विस्तृत चर्चा की गई। व्यावहारिक प्रशिक्षण सत्रों ने चिकित्सकों की निदान क्षमता और आत्मविश्वास को सुदृढ़ किया।
Published on:
25 Jan 2026 02:58 pm
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