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जयपुर, May 14, 2026

सूरत की कपड़ा फैक्टरियों से मुक्त कराए 91 बाल मजदूर, 86 बाल मजदूर राजस्थान के

Gujarat Rajasthan Police Action: गुजरात के सूरत में राजस्थान और गुजरात पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में सूरत की तीन कपड़ा फैक्टरियों से 91 बाल मजदूर मुक्त कराए गए। इनमें 86 बच्चे राजस्थान के हैं, जबकि बाकी उत्तर प्रदेश, झारखंड और बिहार के हैं।

91 Child Labourers Rescued BY Gujarat Rajasthan Police

91 Child Labourers Rescued BY Gujarat Rajasthan Police

जयपुर. राजस्थान और गुजरात पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में बड़ा खुलासा हुआ है। गुजरात के सूरत की कपड़ा फैक्टरियों से 91 बाल मजदूरों को मुक्त कराया गया हैं जिसमें 86 बाल मजदूर राजस्थान के हैं। राजस्थान स्थित गैर सरकारी संगठन गायत्री सेवा संस्थान (जीएसएस) के निदेशक डॉ. शैलेंद्र पंड्या ने बताया कि सरकार, प्रशासन एवं नागरिक समाज संगठनों की छापे की एक साझा कार्रवाई में सूरत की तीन कपड़ा फैक्टरियों से 91 बाल मजदूरों को मुक्त कराया गया।

सात से 14 वर्ष के हैं बच्चे

मुक्त कराए गए इन बच्चों की आयु सात से 14 वर्ष के बीच हैं। भनक लगते ही सभी फैक्टरी मालिक मौके से फरार हो गए।

अधिकांश बच्चे राजस्थान के जनजातीय इलाकों से

ज्यादातर बच्चे राजस्थान के जनजातीय इलाकों के हैं जबकि तीन उत्तर प्रदेश के और एक-एक बच्चे झारखंड एवं बिहार के हैं। इन सभी को बाल कल्याण समिति सूरत के समक्ष पेश किया गया और कानूनी कार्रवाई की जा रही है।

आठ और दस साल के दो भाई भी

मुक्त कराए गए बच्चों में आठ और दस साल के दो भाई भी थे जिन्हें राजस्थान के उदयपुर जिले से लाया गया था।

कार्रवाई में ये शामिल

जीएसएस की छानबीन के आधार पर हुई छापे की इस कार्रवाई में जीएसएस सहित राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर), एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट, राजस्थान के 22 पुलिस अफसर, सूरत के पूना थाने के अफसरों के साथ एसोसिएशन फॉर वालंटरी एक्शन (एवीए) भी शामिल था।

महीने भर से कर रहे थे फैक्टरियों की निगरानी

उन्होंने बताया कि जीएसएस महीने भर से सूरत की इस कपड़ा फैक्टरियों की निगरानी कर रहा था और छानबीन में यहां बड़ी संख्या में बाल मजदूरों की मौजूदगी की पुष्टि के बाद उसने एनसीपीसीआर को इसकी जानकारी दी।

बच्चों ने भी पुलिस को दिए नए सुराग

मुक्त कराए बच्चों ने फिर पुलिस को सुराग दिए और उन्हें उन जगहों का पता बताया जहां बाल मजदूरी कराई जा रही थी। उन्होंने बताया कि बच्चे हमें एक इमारत के पास ले गए जो बाहर से बंद थी लेकिन अंदर बच्चे काम कर रहे थे। हम जब अंदर गए तो पाया कि वहां सात साल तक के बच्चों से काम कराया जा रहा था। सभी बच्चे घबराए हुए और बदहवासी की हालत में थे और 12 घंटे की शिफ्ट में काम करने के बाद थके हुए थे।

एक बच्चे के पास तो पहनने को कपड़े भी नहीं

डॉ. पंड्या ने बताया कि आठ साल के एक बच्चे के पास पहनने को शर्ट तक नहीं थी। वह दूसरे बच्चों के पीछे छिप गया और उनसे पूछ रहा था कि क्या कोई थोड़ी देर के लिए अपनी शर्ट उसे दे सकता है। उन्होंने पुलिस की तारीफ करते हुए कहा कि पुलिस और सभी हितधारकों की त्वरित कार्रवाई और मामले को गंभीरता से लेने के कारण ही इतनी बड़ी संख्या में बच्चों को मुक्त करा पाना संभव हो पाया।

इमारत के दरवाजे बाहर से बंद

प्रारंभिक जांच से पता चला है कि इन बाल दुर्व्यापारियों और फैक्टरी मालिकों ने संदेह से बचने के लिए तमाम तरीके अपना रखे थे। छोटे बच्चों को बिल्कुल सुबह यहां लाया जाता था और फिर इमारत के दरवाजे बाहर से बंद कर दिए जाते थे। शाम को सात बजे काम की शिफ्ट खत्म हो जाने के बाद ही दरवाजे खोले जाते थे।

छोटे बच्चों ने बताया कि उन्हें घुमाने के नाम पर यहां लाया गया

इन सभी बच्चों को आस-पास की कालोनियों में बहुत ही दयनीय और अमानवीय हालत में रखा जाता था। एक छोटे से कमरे में 10 से 12 बच्चे रहते थे, जहां बुनियादी सुविधाओं के नाम पर कुछ भी नहीं था। पूछताछ के दौरान कुछ बच्चों ने बताया कि उनके माता-पिता को पता था कि उन्हें मजदूरी के लिए यहां लाया गया है। ज्यादातर छोटे बच्चों ने बताया कि उन्हें घुमाने के नाम पर यहां लाया गया था और उन्हें कतई अंदाजा नहीं था कि यहां उनसे मजदूरी कराई जाएगी। यह भी पता चला कि कुछ बच्चे इन कपड़ा इकाइयों में तीन-चार साल से काम कर रहे थे जबकि बाकियों को हाल ही में यहां लाया गया था।

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