
श्रीलंका के जाफना में आयोजित सम्मेलन में प्रो. लक्ष्मी अय्यर की लिखी पुस्तक का विमोचन करते अतिथि।
मानव मूल्यों, नैतिकता और सामाजिक समरसता पर अंतरराष्ट्रीय मंच पर हुआ प्रभावी विमर्श
मानव मूल्यों और गरिमा पर वैश्विक विमर्श को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से आयोजित अंतरराष्ट्रीय तिरुक्कुरल सम्मेलन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ, जिसमें प्रोफेसर के. लक्ष्मी अय्यर द्वारा प्रस्तुत शोध-पत्र को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विद्वानों और शोधकर्ताओं की सराहना प्राप्त हुई। यह सम्मेलन इंटरनेशनल तिरुक्कुरल फाउंडेशन (आईटीएफ), मॉरीशस तथा ववुनिया विश्वविद्यालय, श्रीलंका के संयुक्त तत्वावधान में जाफना स्थित तमिल सांस्कृतिक केंद्र एवं ववुनिया विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित किया गया। सम्मेलन के दौरान विभिन्न देशों से आए विद्वानों, शोधकर्ताओं और शिक्षाविदों ने मानव मूल्यों, सांस्कृतिक परंपराओं तथा समाज में नैतिकता की भूमिका पर अपने विचार प्रस्तुत किए। सम्मेलन की वैज्ञानिक समिति द्वारा प्रो. अय्यर के शोध-पत्र तिरुवल्लुवर तथा संत कवि वेमना और कबीर के साहित्य में मानवीय मूल्यों का तुलनात्मक अध्ययन को प्रस्तुति के लिए चयनित किया गया, जिसमें भारतीय संत साहित्य और तिरुक्कुरल के माध्यम से मानव जीवन में नैतिकता, समानता और सामाजिक समरसता के संदेश का तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया, जिसे वर्तमान वैश्विक संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक माना गया।
शोध के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान
आयोजकों ने कहा कि ऐसे शोध तिरुक्कुरल के वैश्विक महत्व को स्थापित करने के साथ-साथ विभिन्न संस्कृतियों में मौजूद समान मानवीय मूल्यों को भी उजागर करते हैं। सम्मेलन के आयोजन सचिव डॉ. आर. नवीनिथकुमार ने इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विचारों के आदान-प्रदान का महत्वपूर्ण मंच बताया तथा भविष्य में भी ऐसे अकादमिक संवाद जारी रखने की आवश्यकता पर बल दिया गया। प्रो. के. लक्ष्मी अय्यर वर्तमान में सबरगामुवा विश्वविद्यालय, श्रीलंका में विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में भी सेवाएं दे रही हैं। साथ ही वे हिन्दी और दक्षिण भारतीय भाषाओं के बीच साहित्यिक एवं अकादमिक संवाद को सशक्त बनाने वाली प्रमुख विदुषियों में गिनी जाती हैं। राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग की आचार्य तथा मानवीकी एवं भाषा स्कूल की पूर्व अधिष्ठाता के रूप में उन्होंने लगभग 24 वर्षों से अधिक के अपने अध्यापन काल में स्नातक एवं स्नातकोत्तर स्तर पर हजारों विद्यार्थियों को शिक्षित किया तथा शोध के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया।
राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में 125 से अधिक शोधपत्र प्रकाशित
तुलनात्मक साहित्य और लोक साहित्य उनके प्रमुख अध्ययन क्षेत्र रहे हैं। अब तक उनकी 13 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें हिन्दी, तमिल और अनूदित कृतियां शामिल हैं। राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में उनके 125 से अधिक शोधपत्र प्रकाशित हो चुके हैं, जबकि तमिल और तेलुगु भाषाओं में भी उनका अकादमिक लेखन उपलब्ध है। डॉ. अय्यर ने अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में अध्यक्ष, वक्ता और प्रतिभागी के रूप में सक्रिया भूमिका निभाई है। उन्होंने अब तक 20 एम.फिल. तथा चार पीएचडी शोधार्थियों का मार्गदर्शन किया है, जबकि कई शोधार्थी वर्तमान में उनके निर्देशन में कार्यरत हैं। उनके नेतृत्व में कई राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों और कार्यशालाओं का सफल आयोजन भी किया गया है।
14 से अधिक प्रतिष्ठित पुरस्कार और सम्मान
साहित्य, शिक्षा और भाषा विकास में योगदान के लिए उन्हें देशभर की विभिन्न संस्थाओं द्वारा 14 से अधिक प्रतिष्ठित पुरस्कार और सम्मान प्रदान किए जा चुके हैं। हिन्दी रत्न पुरस्कार, साहित्य सेवी सम्मान, तेलुगु साहित्य पुरस्कार तथा हिन्दी भाषा भूषण जैसी मानद उपाधियां उनके बहुमुखी योगदान की पुष्टि करती हैं। डॉ. लक्ष्मी अय्यर की विद्वता और बहुभाषी योगदान ने हिन्दी तथा दक्षिण भारतीय भाषाओं के बीच संवाद को सशक्त बनाया है, जिससे भारतीय भाषाई और सांस्कृतिक समन्वय को नई दिशा मिल रही है तथा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारतीय मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा भी सुदृढ़ हो रही है।
Published on:
05 Feb 2026 05:58 pm
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