
जीवाजी विश्वविद्यालय के गालव सभागार में आयोजित हुआ दो दिवसीय सेमिनार
ग्वालियर. खेलों में भारतीय चिंतन और परंपराओं को केंद्र में रखकर शोध और विमर्श की स्पष्ट दिशा तय करने की आवश्यकता है। यह बात एलएनआईपीई (लक्ष्मीबाई राष्ट्रीय शारीरिक शिक्षा संस्थान) ग्वालियर की कुलगुरु डॉ. कल्पना शर्मा ने दो दिवसीय राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी के समापन अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में कही।
डॉ. शर्मा ने कहा कि यदि लक्ष्य पहले से निर्धारित हों और निरंतर प्रयास किए जाएं, तो खेल और शोध—दोनों क्षेत्रों को नई दिशा और पहचान मिल सकती है। उन्होंने भारतीय खेल दर्शन को अकादमिक शोध से जोड़ने पर विशेष जोर दिया।
मुख्य वक्ता डॉ. दिनेश सिंह कुशवाह, प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य, क्रीड़ा भारती ने कहा कि भारत में खेलों का संबंध सृष्टि के आरंभ से हर युग में रहा है। उन्होंने कहा कि तीरंदाजी, घुड़सवारी, रस्साकशी जैसे खेल भारतीय परंपरा का अभिन्न हिस्सा हैं, जो केवल शारीरिक नहीं बल्कि सामाजिक और नैतिक मूल्यों का भी विकास करते हैं। डॉ. कुशवाह ने कहा कि खेल हमें केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि संगठित रूप से एकजुट रहना सिखाते हैं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डॉ. कुमार रत्नम, अतिरिक्त संचालक, उच्च शिक्षा, ग्वालियर-चंबल संभाग ने कहा कि पारंपरिक खेल हमारी सांस्कृतिक पहचान हैं, जिन्हें संरक्षित और प्रोत्साहित करना समय की मांग है।
पहले तकनीकी सत्र में डॉ. अनुराग पाठक, डॉ. विजय मोघे, डॉ. सोमेश पूनिया और कनिष्का शुक्ला ने खेल, शिक्षा और शोध से जुड़े विषयों पर अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए।
संगोष्ठी के दौरान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व करने वाले खिलाड़ियों को सम्मानित किया गया।
पारितोष शर्मा (कराटे), दीपा वर्मा (वॉलीबॉल), कुमारी निशा (बॉक्सिंग) और राहुल यादव (फुटबॉल) को स्मृति चिन्ह प्रदान कर सम्मानित किया गया।
Updated on:
19 Jan 2026 09:04 pm
Published on:
19 Jan 2026 08:53 pm
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