
ग्वालियर. साइबर अपराधों पर सख्ती के उद्देश्य से शुरू की गई ई-जीरो एफआइआर अब खुद सवालों के घेरे में है। थानों में दर्ज ठगी के मामलों में धाराओं का ऐसा चयन हो रहा है, जिससे साइबर ठगों को गिरफ्त से बचने का तकनीकी मौका मिल रहा है। पुलिस डिजिटल ठगी के मामलों में आइटी एक्ट की सख्त धारा 66-डी से परहेज कर रही है और उसकी जगह भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की अपेक्षाकृत कमजोर धाराएं लगाई जा रही हैं।
एक पुलिसकर्मी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि धारा 66-डी लगते ही केस की विवेचना निरीक्षक को करनी होती है। इसमें तकनीकी जांच, जवाबदेही अधिक होती है। थाना प्रभारी खुद विवेचना से बचने इसको एफआइआर में शामिल नहीं करते और केस हवलदार या एएसआइ को सौंप दिया जाता है। ऑनलाइन ठगी, फर्जी कॉल, निवेश के नाम पर धोखाधड़ी, एपीके फाइल भेजकर रकम ऐंठने जैसे मामलों में आईटी एक्ट की धारा 66-डी अनिवार्य है। इसके बावजूद कई थानों में दर्ज ई-जीरो एफआइआर में यह गायब है। इसका सीधा फायदा साइबर ठगों को मिल रहा है।
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने ग्वालियर से ई-जीरो एफआइआर की शुरुआत की थी, ताकि साइबर अपराधों पर त्वरित और सख्त कार्रवाई हो सके। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि धाराओं के चयन में की जा रही यह ‘हेराफेरी’ पूरे सिस्टम की मंशा पर सवाल खड़े कर रही है। यदि धारा 66-डी को जानबूझकर एफआइआर से दूर रखा जाता रहा, तो साइबर ठगों की गिरफ्त ढीली ही बनी रहेगी और ई-जीरो एफआइआर महज एक औपचारिक व्यवस्था बनकर रह जाएगी।
साइबर ठगी में धारा 66 डी लगाना आवश्यक है। इस धारा के साथ बीएनएस की धारा 318 (4), 319 (2) और 308 भी लगाई जा सकती हैं। नियम है कि विवेचना निरीक्षक और उससे उच्च अधिकारी करेंगे। इसका इस्तेमाल नहीं होना हैरानी की बात है।
Updated on:
04 Feb 2026 05:47 pm
Published on:
04 Feb 2026 05:44 pm
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