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‘पब्लिक मनी’ पर ढिलाई नहीं: सहकारी बैंक की याचिका खारिज की, दंड की राशि करनी होगी जमा

हाईकोर्ट की एकल पीठ ने शिवपुरी जिला केंद्रीय सहकारी बैंक की वह याचिका खारिज कर दी है, जिसमें बैंक ने आरबीआई द्वारा लगाए गए दंडात्मक ब्याज (पेनल इंटरेस्ट) को माफ करने और वसूली की कार्रवाई रद्द करने की मांग की थी। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वैधानिक अनुपालन में लगातार चूक करने वाले बैंक को […]

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कोर्ट ने आरबीआई की कार्रवाई सही ठहराई, 1.68 करोड़ का लगाया था दंड

कोर्ट ने आरबीआई की कार्रवाई सही ठहराई, 1.68 करोड़ का लगाया था दंड

हाईकोर्ट की एकल पीठ ने शिवपुरी जिला केंद्रीय सहकारी बैंक की वह याचिका खारिज कर दी है, जिसमें बैंक ने आरबीआई द्वारा लगाए गए दंडात्मक ब्याज (पेनल इंटरेस्ट) को माफ करने और वसूली की कार्रवाई रद्द करने की मांग की थी। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वैधानिक अनुपालन में लगातार चूक करने वाले बैंक को छूट देना न तो अधिकार है और न ही नियामक विवेक का दुरुपयोग कहा जा सकता है। मामला सार्वजनिक धन से जुड़ा है। बैंक के अधिकारियों की लापरवाही, सिस्टम की कमजोरी या आंतरिक धोखाधड़ी को आधार बनाकर दंडात्मक ब्याज से छूट नहीं दी जा सकती।

मामला वर्ष 2021–22 का है, जब याचिकाकर्ता बैंक वैधानिक तरलता अनुपात (एसएलआर) और नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर) बनाए रखने में विफल रहा। आरबीआई ने 2021 में बैंक पर दंड लगाया था। इस दंड को आरबीआइ ने माफ करने का आवेदन 2 जून 2022 को खारिज कर दिया गया था। इसी आदेश को बैंक ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। बैंक का तर्क था कि कोविड-19 के कारण आर्थिक संकट व आंतरिक धोखाधड़ी/गबन (करीब 80.56 करोड़ रुपये) के चलते एसएलआर–सीआरआर बनाए रखने में कठिनाई आई। साथ ही, बैंकिंग विनियमन अधिनियम की धाराओं 18(1-बी) और 24(8) के तहत आरबीआई को दंडात्मक ब्याज माफ करने का विवेकाधिकार है, इसलिए उसके आवेदन पर कारणयुक्त आदेश दिया जाना चाहिए था।

आरबीआई ने जवाब दिया कि एसएलआर–सीआरआर बनाए रखना वैधानिक दायित्व है, और चूक होने पर दंडात्मक ब्याज लगाना कानूनन अधिकार। माफी कोई अधिकार नहीं है। इसके अलावा, याचिका लंबित रहते भी बैंक लगातार चूक करता रहा, जिसके लिए अलग-अलग अवधियों में अतिरिक्त दंड लगाए गए। अदालत के समक्ष प्रस्तुत विवरण के अनुसार, फरवरी 2022 से जून 2023 तक कई महीनों में सीआरआर/एसएलआर न रखने पर कुल 1.68 करोड़ रुपए से अधिक का दंड लगाया गया। यह निरंतर और लगातार गैर-अनुपालन” बैंक के आचरण को दर्शाता है।

न्यायालय ने कहा कि आरबीआई एक वैधानिक नियामक है, जिसकी भूमिका देश की वित्तीय स्थिरता की रक्षा करना है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कोर्ट ने माना कि ऐसे मामलों में नियामक के विवेक में हस्तक्षेप तभी होगा जब निर्णय मनमाना, दुर्भावनापूर्ण या कानूनविरुद्ध होजो यहां साबित नहीं हुआ। साथ ही, धारा 18(1-बी) व 24(8) में माफी का विवेकाधिकार है, अनिवार्यता नहीं; अतः हर अस्वीकृति में कारण लिखना आवश्यक नहीं, विशेषकर जब रिकॉर्ड से पर्याप्त कारण स्पष्ट हों।