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‘जाति प्रमाण-पत्र’ जांच में लापरवाही पर हाईकोर्ट सख्त, राज्य से मांगी रिपोर्ट

MP News: प्रकरण में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अरविंद सिंह यादव तथा राज्य की ओर से शासकीय अधिवक्ता बृजेश कुमार त्यागी ने पक्ष रखा।

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High Court प्रतिकात्मक फोटो (Photo Source - Patrika)

High Court प्रतिकात्मक फोटो (Photo Source - Patrika)

MP News: जाति प्रमाण-पत्र की जांच से जुड़े एक पुराने मामले में निर्देशों की अवहेलना पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट, ग्वालियर खंडपीठ ने सख्त रुख अपनाया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि पूर्व में दिए गए आदेशों के बावजूद अब तक हाई लेवल स्क्रूटनी कमेटी का कोई निर्णय रिकॉर्ड पर प्रस्तुत नहीं किया गया है, जो गंभीर लापरवाही को दर्शाता है।

यह टिप्पणी न्यायमूर्ति मिलिंद रमेश फड़के ने डब्ल्यूपी क्रमांक 29170/2025 (राजविंदर कौर बनाम मध्य प्रदेश राज्य एवं अन्य) की सुनवाई के दौरान 4 फरवरी 2026 को की। प्रकरण में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अरविंद सिंह यादव तथा राज्य की ओर से शासकीय अधिवक्ता बृजेश कुमार त्यागी ने पक्ष रखा।

स्पष्ट निर्देश दिए गए थे…

अदालत ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि इससे पहले वर्ष 2015 में दायर एक याचिका (डब्ल्यूपी क्रमांक 3357/2015) में 27 सितंबर 2019 को स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि याचिकाकर्ता की जाति प्रमाण-पत्र एवं जांच रिपोर्ट को 15 दिनों के भीतर हाई लेवल स्क्रूटनी कमेटी के समक्ष भेजा जाए। यह कमेटी सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले माधुरी पाटिल अतिरिक्त आयुक्त, आदिवासी विकास के निर्देशों के तहत गठित है, जिसे प्रमाण-पत्र की प्रामाणिकता की जांच कर तत्काल निर्णय लेना था।

कोई महत्व नहीं रखने वाला' बताया..

हाईकोर्ट ने पाया कि राज्य द्वारा जो रिकॉर्ड प्रस्तुत किया गया है, उसमें हाई लेवल स्क्रूटनी कमेटी के किसी आदेश का उल्लेख नहीं है। इसके बजाय 15 अक्टूबर 2015 की पुरानी रिपोर्ट के आधार पर निर्णय लिया गया, जिसे अदालत ने अपने पूर्व आदेशों के आलोक में 'कोई महत्व नहीं रखने वाला' बताया।

इस स्थिति को गंभीर मानते हुए हाईकोर्ट ने शासकीय अधिवक्ता को निर्देश दिया है कि वे अगली सुनवाई की तारीख तक हाई लेवल स्क्रूटनी कमेटी द्वारा पारित आदेश को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करें। मामले की अगली सुनवाई एक सप्ताह बाद सूचीबद्ध की गई है।