
जडेरुआ खुर्द में मौजूद है पुलिस की जमीन, रिट पिटीशन को फिर से सुनवाई में लाने के लिए दायर की थी याचिका
हाईकोर्ट की एकल पीठ ने राज्य शासन की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें जडेरुआ खुर्द मौजे (गोला का मंदिर क्षेत्र) में मौजूद पुलिस विभाग की 14 बीघा जमीन रिट पिटीशन को री स्टोर करने की मांग की थी। कोर्ट ने पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि जब विभाग स्वयं अपने अधिकारियों को लेकर वास्तविक दंड देने के बजाय केवल औपचारिक और अस्थायी प्रकृति की सजाएं देने की प्रवृत्ति अपनाए हुए है, तो ऐसे मामलों में देरी की क्षमा (कंडोनेशन) का लाभ नहीं दिया जा सकता। एमसीसी दायर करने में 222 दिन की देरी को माफ नहीं किया है।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से यह बताया गया कि 12 जनवरी 2026 को पुलिस महानिदेशक ने संबंधित अधिकारी पर निंदा (सेंशर) का दंड लगाया गया है। हालांकि, राज्य के वकील ने यह भी स्वीकार किया कि जबलपुर पीठ के एक पूर्व निर्णय के अनुसार निंदा की अवधि मात्र एक वर्ष की होती है। अर्थात एक वर्ष के बाद अधिकारी को सभी लाभ स्वतः मिल जाते हैं। शासन ने की ओर से कहा गया कि जमीन की कीमत करीब 100 करोड़ रुपए है। यह सरकारी जमीन है। हाईकोर्ट ने इस तथ्य को गंभीरता से लेते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि जानबूझकर इस प्रकार की हल्की सज़ा दी गई, ताकि संबंधित अधिकारी एक वर्ष बाद सभी लाभ हासिल कर सके और किसी प्रकार का वास्तविक दंड प्रभावी न हो। विभाग अपने तरीकों और साधनों को सुधारने के लिए तैयार नहीं है और न ही वह अपने अधिकारियों को न्यायालयी कार्यवाहियों के प्रति सचेत बनाने में रुचि दिखा रहा है। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे आदेश पारित करने की कोशिश की जा रही है, जिनका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना प्रतीत होता है कि किसी भी पुलिस अधिकारी को ठोस दंड न मिले।
क्या है मामला
दरअसल जड़ेरुआ खुर्द में पुलिस की विभाग के 15 सर्वे नंबर की 14 बीघा जमीन है। इस जमीन के पुराने खसरों में पुलिस विभाग दर्ज है। 14 बीघा जमीन पर रामसेवक ने दावा पेश किया। रामसेवक ने जमीन पर एक पक्षीय डिक्री हासिल कर ली। जब शासन को एक पक्षीय डिक्री की जानकारी मिली तो न्यायालय में आवेदन लगाया, लेकिन जिला कोर्ट से राहत नहीं मिल सकी। इसके बाद शासन ने 2007 में हाईकोर्ट में याचिका दायर की। तर्क दिया कि प्रदेश में सरकार बदलने के बाद शासकीय अधिवक्ताओं का बदलाव हुआ। इस बदलाव के चलते जानकारी नहीं सकी। शासन की बेशकीमती जमीन है। 2007 से याचिका लंबित थी। 2008 में रामसेवक का निधन हो गया, लेकिन पुलिस ने उसके वारिशों को याचिका में पार्टी नहीं बनाया। मृत व्यक्ति के खिलाफ केस नहीं चल सकता है। रिट अपील खारिज हो गई थी। पत्रिका में खबर प्रकाशित होने के बाद मामला संज्ञान में आया। अक्टूबर में एमसीसी दायर की, लेकिन कोर्ट ने जिम्मेदार अधिकारी के खिलाफ क्या कार्रवाई की। इसकी जानकारी मांगी। जिम्मेदार अधिकारी जांच कर कार्रवाई का भरोसा दिया। इसके बाद जिम्मेदार अधिकारी को परनिंदा की सजा दी गई। इस पर कोर्ट ने नाराजगी जताई।
इन सर्वे नंबर की बेसकीमती जमीन
सर्वे क्रमांक हेक्टेयर में
100 6 विस्वा
104 15 विस्वा
105 6 विस्वा
122 6 विस्वा
123 1.2 बीघा
126 11 विस्वा
133 1.3 बीघा
141 8 विस्वा
144 4.8 बीघा
145 6.16 बीघा
145 15 विस्वा
171 19 विस्वा
योग 14 बीघा
Published on:
15 Jan 2026 11:21 am
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