
पवित्र नंदा राजजात यात्रा का फाइल फोटो
Nanda Rajjat Yatra 2026: हिमालय के महाकुंभ के नाम से जानी जाने वाली नंदा राजजात एशिया की सबसे कठिन धार्मिक यात्रा मानी जाती है। मां नंदा देवी के सम्मान में हर 12 साल में एक बार उत्तराखंड में नंदा राजजात यात्रा का आयोजन होता है। हिमालय में 280 किमी की इस पवित्र यात्रा में कुमाऊं और गढ़वाल दोनों मंडलों के श्रद्धालु भाग लेते हैं। इस यात्रा का नेतृत्व चार सिंह वाली भेड़ (चौसिंग्या खाडू) करता है। मान्यता है कि चार सिंह वाली खाड़ू 12 साल में एक ही बार पैदा होती है। बता दें कि इससे पहले नंदा राजजात यात्रा साल 2014 में निकली थी। अब इस साल नंदा राजजात यात्रा निकालने की तैयारी चल रही थी। नंदा देवी राजजात समिति ने सितंबर 2026 में उच्च हिमालयी क्षेत्रों में बर्फबारी की आशंका और श्रद्धालुओं की सुरक्षा को देखते हुए इस साल यात्रा स्थगित करने का ऐलान किया था। ये ऐलान कल ही किया गया था। इससे हड़कंप मच गया था। इसी को लेकर आज 484 गांवों की महापंचायत बुलाई गई थी। महापंचायत ने यात्रा एक साल के लिए स्थगित करने का कड़ा विरोध जताया। महापंचायत में निर्णय लिया गया कि राजजात इसी साल होगी। महापंचायत के दौरान मां नंदा देवी सिद्धपीठ मंदिर कुरुड़ आयोजन समिति का गठन भी किया गया, जिसमें कर्नल (सेनि) हरेंद्र सिंह रावत को अध्यक्ष चुना गया। निर्णय लिया गया कि आगामी 23 जनवरी को वसंत पंचमी पर बड़ी जात का मुहूर्त निकाला जाएगा और जात भव्य रूप से संचालित की जाएगी।
नंदा राजजात यात्रा इस साल के लिए स्थगित करने का कारण समिति ने सितंबर में होने वाली बर्फबारी और श्रद्धालुओं की सुरक्षा बताया था। बताया जा रहा हैकि कुरूड़ और नौटी से नंदा राजजात व नंदाजात के शुभारंभ को लेकर हाल में उत्पन्न मतभेदों के चलते आयोजन को टालने का फैसला लिया गया था। हालांकि समिति पदाधिकारियों ने स्पष्ट किया कि यह फैसला यात्रियों की सुविधा और सुरक्षा को प्राथमिकता में रखते हुए ही लिया गया है। इधर आज महापंचायत ने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार इसी साल ही नंदा राजजात यात्रा निकालने का निर्णय लिया।
यात्रा देवी नंदा को उनके मायके से विदाई देने का उत्सव है जिसे हिमालय का महाकुंभ भी कहा जाता है। चमोली के नौटी गांव से शुरू होने वाली 19 से 22 दिन तक चलने वाली ये यात्रा हिमालय के होमकुंड (रूपकुंड के पास) में समाप्त होती है। ये यात्रा करीब 19 दिन में 280 किमी पैदल चलती है। यात्रा के रास्ते बेहद दुरूह होते हैं। चौसिंघिया खाड़ू का अंतिम पड़ाव हिमालय का होमकुंड होता है। यहीं से यात्रा का समापन हो जाता है। उसके बाद चौसिंघिया को पूजा अर्चना की सामग्री के साथ हिमालय में कैलाश पर्वत की ओर विदा कर दिया जाता है। उसी के साथ ही चौसिंघिया मां नंदादेवी के संदेशवाहक के रूप में रहस्मय तरीके से गायब हो जाता है।
Updated on:
19 Jan 2026 07:43 pm
Published on:
19 Jan 2026 06:42 pm
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