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गरीबी की राख से उठे सपनों के परचम, संघर्ष की धूप में तपकर बनी सफलता की कहानी

कहते हैं, गरीबी अभिशाप नहीं होती, वह कभी-कभी इंसान को वह दृष्टि दे जाती है जिससे वह अपने सपनों को साफ-साफ देख पाता है। जिन घरों में सुविधाएं नहीं होतीं, वहां अक्सर संकल्प जन्म लेता है। यही संकल्प संघर्ष बनता है और संघर्ष, सफलता की सीढ़ी। छतरपुर के दो ऐसे ही बेटों की कहानियां आज […]

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दीक्षांत समारोह

कहते हैं, गरीबी अभिशाप नहीं होती, वह कभी-कभी इंसान को वह दृष्टि दे जाती है जिससे वह अपने सपनों को साफ-साफ देख पाता है। जिन घरों में सुविधाएं नहीं होतीं, वहां अक्सर संकल्प जन्म लेता है। यही संकल्प संघर्ष बनता है और संघर्ष, सफलता की सीढ़ी। छतरपुर के दो ऐसे ही बेटों की कहानियां आज प्रेरणा बनकर सामने आई हैं, जिन्होंने अभाव, जिम्मेदारियों और कठिन रास्तों के बावजूद शिक्षा को अपना हथियार बनाया और समाज के लिए मिसाल कायम की।

पिता के संघर्ष से मिली दिशा, पढ़ाई को बनाया जीवन का मार्ग

प्रोफेसर बृजेश कुमार प्रजापति की कहानी

चंदला विधानसभा क्षेत्र के छोटे से गांव गौरिहार में जन्मे बृजेश कुमार प्रजापति का बचपन सीमित संसाधनों में बीता। घर की आर्थिक स्थिति कमजोर थी, लेकिन पिता एसके प्रजापति के संघर्ष ने उनके भीतर आत्मबल भर दिया। सरकारी स्कूल से बारहवीं तक की पढ़ाई करने वाले बृजेश ने तय कर लिया था कि हालात चाहे जैसे हों, मंजिल शिक्षा से ही मिलेगी।

महाराजा कॉलेज से स्नातक और हिंदी विषय में पोस्ट ग्रेजुएशन के दौरान ही उन्होंने यूजीसी नेट क्वालिफाई किया। यह वह दौर था जब साधन कम और सपने बड़े थे। सिविल सेवा की तैयारी के लिए इलाहाबाद गए, जहां 2008 में पीएससी परीक्षा उत्तीर्ण कर असिस्टेंट प्रोफेसर बने। वर्ष 2012 से गर्ल्स कॉलेज में सेवा देते हुए उन्होंने शोध को नहीं छोड़ा और आज महाराजा छत्रसाल बुंदेलखंड विश्वविद्यालय से हिंदी में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। वे मानते हैं कि पिता का संघर्ष और गुरुजनों का मार्गदर्शन ही उनकी सबसे बड़ी पूंजी रहा।

साइकिल, खेत और कोचिंग के बीच बुनी सफलता की कहानी

भौतिक शास्त्र शिक्षक शैलेंद्र चौबे का संघर्ष

बमीठा क्षेत्र के पहाड़ी गांव से निकले शैलेंद्र चौबे की कहानी परिश्रम की मिसाल है। गांव में आठवीं तक ही स्कूल था। आगे की पढ़ाई के लिए रोज रास्ते बदले, गांव बदले, लेकिन हौसला नहीं बदला। घर की आर्थिक स्थिति ऐसी थी कि पढ़ाई के साथ कमाई जरूरी थी।महाराजा कॉलेज में स्नातक करते समय उन्होंने गंज क्षेत्र में बच्चों को कोचिंग पढ़ानी शुरू की। रोज गांव से 8 किलोमीटर साइकिल चलाकर आते, कोचिंग पढ़ाते, कॉलेज जाते, फिर शाम को दोबारा बच्चों को पढ़ाकर अंधेरे में गांव लौटते। इस सबके बीच पिता के साथ खेतों में काम करना भी उनकी दिनचर्या का हिस्सा था।आज वही शैलेंद्र चौबे एमएड में गोल्ड मेडल प्राप्त कर चुके हैं और भौतिक शास्त्र के शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। उनका कहना है कि संघर्ष ने उन्हें वह सिखाया जो किसी पाठ्यपुस्तक में नहीं मिलता।