छतरपुर, Jun 05, 2026

आदिम जाति कल्याण विभाग
आदिम जाति कल्याण विभाग के छात्रावासों से एक बेहद गंभीर और चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां बच्चों के हक पर खुलेआम डाका डाला जा रहा है। अप्रेल व मई के महीने में भीषण गर्मी की छुट्टियों के कारण जब जिले के अधिकांश छात्रावासों में छात्र-छात्राओं की संख्या पूरी तरह शून्य थी, तब विभागीय अधिकारियों और अधीक्षकों की मिलीभगत से कागजों पर फर्जी उपस्थिति दर्ज कर ली गई। इसके बाद राशन सामग्री और अन्य सरकारी सुविधाओं के नाम पर लाखों रुपये के फर्जी बिल भी पास करा लिए गए। इस पूरे मामले का भंडाफोड़ होने के एक महीने बाद भी जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारियों ने अब तक कोई ठोस जांच शुरू नहीं की है, जिससे विभाग की पूरी कार्यप्रणाली और मंशा पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
इस घोटाले का खुलासा तब हुआ जब अप्रेल माह में शहर के लगभग एक दर्जन छात्रावासों की जमीनी स्तर पर पड़ताल की गई। वहां मौजूद स्थानीय कर्मचारियों ने साफ शब्दों में स्वीकार किया था कि भयंकर गर्मी के कारण कोई भी विद्यार्थी हॉस्टल में नहीं रुका है और न ही वहां कोई भोजन बनाया जा रहा है। लेकिन इसके ठीक विपरीत, संबंधित हॉस्टल अधीक्षकों ने अपने रिकॉर्ड में 50 प्रतिशत से अधिक बच्चों की नियमित उपस्थिति दिखाई और हर दिन भोजन बनने का झूठा दावा ठोक दिया ताकि सरकारी बजट को ठिकाने लगाया जा सके।
1. महोबा रोड स्थित शासकीय सीनियर कन्या छात्रावास क्रमांक 3 एवं 4- इस छात्रावास की कमान अधीक्षिका दीपशिखा तिवारी के हाथों में है। जांच के दौरान यहां एक भी छात्रा मौजूद नहीं पाई गई और उपस्थिति पूरी तरह शून्य मिली। खुद अधीक्षिका भी मौके से नदारद थीं। कर्मचारियों ने बताया कि वे पिछले चार दिनों से छुट्टी पर हैं। हालांकि, जब अधीक्षिका से फोन पर संपर्क किया गया, तो उन्होंने बड़े आराम से दावा कर दिया कि छात्राएं रोज आ रही हैं और उनके लिए भोजन भी नियमित रूप से तैयार हो रहा है।
2. उत्कृष्ट सीनियर बालिका छात्रावास- इस परिसर में दो अलग-अलग छात्रावासों का संचालन किया जाता है, लेकिन मौके पर मुख्य द्वार पर ताला लटका हुआ मिला और पूरा परिसर पूरी तरह खाली था, जिससे साफ है कि यहां कोई छात्र मौजूद नहीं था।
3. शासकीय जूनियर कन्या छात्रावास क्रमांक 1 एवं 2- इस सरकारी छात्रावास की स्थिति भी बाकी हॉस्टलों जैसी ही पायी गई, जहां बच्चे न होने के बावजूद कागजों पर राशन का पूरा खर्च जारी रखा गया।
सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, आदिम जाति कल्याण विभाग के भीतर यह भ्रष्टाचार कोई नया नहीं है। छात्रावासों में फर्जी हाजिरी चढ़वाने और फर्जी बिलों को बिना किसी अड़चन के पास कराने के बदले में लंबे समय से अवैध वसूली का धंधा फल-फूल रहा है। आरोप है कि विभाग के कुछ चहेते अधीक्षकों को ऊपरी संरक्षण देने के बदले में हर महीने मोटी रकम वसूली जाती है। पिछले साल भी लगभग एक दर्जन से ज्यादा अधीक्षकों ने एकजुट होकर जिला प्रशासन को एक ज्ञापन सौंपा था और इस पूरी भ्रष्ट व्यवस्था की शिकायत दर्ज कराई थी, लेकिन सुधार होने के बजाय धांधली और अनियमितताएं और ज्यादा बढ़ गईं।
मामला उजागर होने के तुरंत बाद आदिम जाति कल्याण विभाग के जिला संयोजक ने बड़े-बड़े आश्वासन दिए थे कि सभी छात्रावासों का भौतिक सत्यापन कराया जाएगा और वहां लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली जाएगी। परंतु एक पूरा महीना बीत जाने के बाद भी न तो किसी कर्मचारी के बयान लिए गए और न ही सीसीटीवी कैमरों की जांच की गई। अधिकारियों की यह चुप्पी और टालमटोल की नीति अब सीधे तौर पर जिला संयोजक की भूमिका को भी संदेह के दायरे में लाती है। सवाल यह उठता है कि अगर सब कुछ नियमों के तहत हुआ था, तो प्रशासन निष्पक्ष जांच कराने से कतरा क्यों रहा है?जिला संयोजक का आधिकारिक बयानइस पूरे मामले पर जब आदिम जाति कल्याण विभाग के जिला संयोजक मनोज अहिरवार से बात की गई, तो उन्होंने जांच न होने का ठीकरा तकनीकी खराबी पर फोड़ दिया। उन्होंने कहा कि विभाग का ऑनलाइन पोर्टल नहीं चलने के कारण अब तक इस पूरे मामले की जांच शुरू नहीं की जा सकी है। जैसे ही पोर्टल दोबारा सुचारू रूप से शुरू होगा, मामले की पूरी गंभीरता के साथ विस्तृत जांच कराई जाएगी और यदि कोई भी गड़बड़ी या वित्तीय अनियमितता पाई जाती है, तो दोषियों के खिलाफ कड़ी दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।
Published on: 05 Jun 2026 11:00 am

कोई कमेंट नहीं है।
पहले कमेंट करने वाले बनें।