
छत्तीसगढ़ के डॉ. राजाराम त्रिपाठी खेती में नई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते हैं (PC: http://drrajaramtripathi.com/)
ऐसे समय में जब लोग खेती-किसानी छोड़कर नौकरी करने के लिए शहरों की ओर भाग रहे हैं, एक शख्स जिसके पास स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में एक शानदार नौकरी थी और सुरक्षित भविष्य था। उसने नौकरी छोड़कर किसानी को चुना और वो कमाल कर दिखाया जिसका लोहा आज दुनिया मानती है। उनका नाम है, डॉक्टर राजाराम त्रिपाठी। दो बार PhD होल्डर त्रिपाठी को 6 बार देश के सर्वश्रेष्ठ किसान का अवॉर्ड मिल चुका है।
छत्तीसगढ़ के सबसे पिछड़े और संवेदनशील क्षेत्र के रूप में जाना जाने वाला बस्तर, यहां पर डॉ. राजाराम त्रिपाठी का जन्म हुआ। डॉ. त्रिपाठी के दादा जी के पास 30 एकड़ जमीन हुआ करती थी, जिस पर उनके पिता जी खेती करते थे। डॉ. त्रिपाठी का दिल भी खेती-किसानी में ही रमता था। मगर उनकी नौकरी SBI ग्रामीण बैंक में लगी। कुछ साल तक तक उन्होंने नौकरी की, लेकिन एक समय आया जब उन्होंने ठाना कि वो अपने दिल की सुनेंगे और खेती में ही कुछ करेंगे. उन्होंने बैंक के काम से इस्तीफा दिया। मगर उनका इस्तीफा एक साल तक स्वीकार ही नहीं किया गया। बाद में चेयरमैन ने उन्हें मिलने के लिया बुलाया और नौकरी छोड़कर खेती चुनने की वजह पूछी। उस वक्त उनके साथ उनकी पत्नी भी थीं। चेयरमैन ने उनकी पत्नी से जानना चाहा कि क्या आपको यह बात पता है? पत्नी ने जवाब दिया कि उन्हें पता है और वह इस फैसले में पति के साथ हैं।
चेयरमैन ने डॉ. त्रिपाठी से कहा कि 3-4 साल और नौकरी कर करके VRS ले लें, तो उन्होंने कहा कि ऐसा करना मुश्किल है, क्योंकि जब ऑफिस में रहते हैं तो दिल खेत में लगा रहता है, इसलिए फैसला किया कि नौकरी छोड़कर खेती कर लूं। डॉ. राजाराम की जिद को देखकर चेयरमैन ने इस्तीफा स्वीकार कर लिया।
उनके पास पारिवारिक 700 एकड़ की जमीन है। इस जमीन से होने वाली फसल बेचने के बाद उनका सालाना टर्नओवर 70 करोड़ रुपये तक पहुंच जाता है। सामूहिक खेती से करीब 1100 एकड़ पर औषधीय फसलें उगाते हैं। वो पुरानी परंपरागत तौर-तरीकों से खेती करने में विश्वास नहीं रखते, बल्कि नई टेक्नोलॉजी और जैविक पद्धति से खेती करते हैं। वो मानते हैं कि किसानों को अब चावल-गेहूं के अलावा दूसरी फसलों के बारे में भी सोचना चाहिए। राजाराम त्रिपाठी अपने पूरे इलाके में किसानों के लिए आदर्श है और उनका मार्गदर्शन करते हैं। उनके साथ आस-पास गांवों के करीब 20-25 हजार किसान जुड़े हुए हैं।
उन्होंने 'नेचुरल ग्रीनहाउस' बनाया, यह सस्ता है, एक एकड़ में सिर्फ 2 लाख रुपये, जबकि महंगा पॉलीहाउस 40 लाख का आता है। इससे एक एकड़ से सालाना 5 लाख से 2 करोड़ तक कमाई हो सकती है। इस मॉडल ने दुनिया भर में वाहवाही बटोरी। डॉ. त्रिपाठी ने हजारों एकड़ में फैले अपने खेतों पर दवा का छिड़काव करने के लिए हेलीकॉप्टर भी खरीदा है, जिसकी वजह से वो काफी मशहूर भी हुए कि एक किसान हेलीकॉप्टर भी खरीद सकता है। हालांकि वो मानते हैं कि इसको इतना आश्चर्य से नहीं देखना चाहिए क्योंकि ये हमारे देश के लिए नई बात है, मगर पश्चिमी देशों के किसान आमतौर पर हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल करते हैं।
राजाराम त्रिपाठी सामान्य फसलों की खेती नहीं करते हैं, बल्कि उन चीजों की खेती करते हैं, जिनकी विदेशों में बड़ी डिमांड होती है और जिनकी वैल्यू काफी ज्यादा मिलती है। डॉ. त्रिपाठी मुख्य रूप से दो महंगी फसलें उगाते हैं, काली मिर्च और सफेद मूसली। इसे काला सोना और सफेद सोना कहा जाता है क्योंकि अच्छी क्वालिटी की काली मिर्च करीब 1,200 रुपये प्रतिकिलो के भाव बिकती है, जबकि सफेद मूसली की कीमत 2,200 रुपये से भी ज्यादा है। इन फसलों से उनकी बहुत कमाई हुई। उनका नाम विदेशो तक पहुचा। उनकी फसलें अमेरिका, जापान और कई अरब देशों में बहुत पसंद की जाती हैं। राजाराम बताते हैं कि हम काली मिर्ची की खेती करते हैं, इसकी पैदावार तीसरे साल से होती है। 4-5 लाख रुपए एकड़ मिल जाता है।
वो कहते हैं कि हमारी काली मिर्च की क्वालिटी केरल से आने वाली काली मिर्च से कहीं बेहतर है। हमने हमारी काली मिर्च को सिलेक्शन प्रोसेस से डेवलप किया है, इससे हमें दूसरों की तुलना में चार गुना ज्यादा प्रोडक्शन मिलता है। ये किसी चमत्कार से कम नहीं, जिसे हमने कर दिखाया है। काली मिर्च की खेती वन टाइम इन्वेस्टमेंट है। इसके पौधे एक बार लगाने के बाद यह 100 साल तक फसल देते हैं। इसके अलावा, वो ऑस्ट्रेलियन बबूल के पेड़ लगाते हैं। वो बताते हैं कि एक एकड़ में ऑस्ट्रेलियन बबूल की खेती पर 2 लाख का खर्च आता है। 10 साल के बाद इन पेड़ों की लकड़ियां दो से ढाई करोड़ रुपये में बिकती हैं।
किसानों की सबसे बड़ी समस्या उनके द्वारा उत्पादित उत्पादों के लिए उचित बाजार का अभाव है। डॉ. त्रिपाठी ने इस दिशा में सराहनीय कार्य किया है और किसानों का एक ऑनलाइन समूह विकसित किया है, जिसे सेंट्रल हर्बल एग्रो मार्केटिंग फेडरेशन (CHAMF) कहा जाता है। इस संगठन से 80 हजार से अधिक जैविक किसान जुड़े हुए हैं, जो विपणन में एक-दूसरे के साथ सहयोग करते हैं। इसके माध्यम से किसानों को अपनी फसलों का उचित मूल्य और बाजार दोनों मिल रहे हैं।
किसानों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि उनकी फसल को सही दाम और अच्छा बाजार नहीं मिलता। डॉ. राजाराम त्रिपाठी ने इस समस्या को हल करने के लिए किसानों का एक बड़ा समूह बनाया, जिसका नाम है सेंट्रल हर्बल एग्रो मार्केटिंग फेडरेशन (CHAMF)। यह एक गैर-लाभकारी संगठन है, जहां हजारों जैविक किसान जुड़े हुए हैं। ये किसान एक-दूसरे की मदद करते हैं और अपनी फसलों की बिक्री साथ मिलकर करते हैं। CHAMF की वजह से किसानों को अपनी फसल का सही दाम मिलता है और अच्छा बाजार भी। इससे किसानों की आय बढ़ी है और वे मजबूत बने हैं।
Updated on:
11 Jan 2026 02:23 pm
Published on:
11 Jan 2026 02:22 pm
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